“सुदामा” ब्राह्मण की परिभाषा

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आचार्य संजय तिवारी

आचार्य सुदामा। भगवान श्रीकृष्ण के मित्र। सहपाठी। कृष्ण को शॉप से सुरक्षित करने वाला बाल सखा जिसने सृष्टि के विधान की सुरक्षा के लिए चोर बन जाने में ही भलाई समझी। कृष्ण की सुरक्षा आवश्यक थी। सुदामा क्या वास्तव में एक दरिद्र और असहाय ब्राह्मण थे ?
सुदामा वस्तुतः आचार्य सुदामा थे। सुदामा का पूरा प्रसंग केवल द्वारकाधीश के दरबार का ही पढ़ने को मिलता है। गुरु गृह में कृष्ण और सुदामा के अध्ययन के समय का भी केवल चने वाला प्रसंग ही मिलता है। ग्रंथों का अनुशीलन बहुत शोध मांगता है। अनेक संदर्भों की गहन व्याख्या में यह अनुभव होता है कि यदि सुदामा ने अपनी भूमिका को न निभाया होता तो श्रीकृष्ण स्वरूप का विधि प्रपंच ही बाधित हो जाता। विष्णु अवतार कृष्ण की वह क्षमता नष्ट हो जाती जो उन्हें जगद्गुरु योगेश्वर भगवान बना रही थी। विधाता ने कृष्ण की ऐसी सुरक्षा के लिए एक विधि की खोज शुरू की तो एक त्याग पुरुष की छवि पर रुके और सुदामा का सृजन करना पड़ा। सांदीपनी आश्रम में यदि सुदामा सहपाठी नहीं बनते तो कृष्ण का वस्तुनिष्ठ व्यापक निर्माण असंभव था। जैसे माता कैकेई ने श्रीराम को निर्मित किया, ब्राह्मण सुदामा ने उससे भी अधिक कंटक पथ अपनाया और कृष्ण के भगवत पथ को सुरक्षित किया।

कृष्ण की समस्त भगवत लीलाओं के संपन्न होने के बाद सुदामा द्वारिका आए। यह कथा सभी को मालूम है। सुदामा को पता ही नही चला। सुदामा सो चुके थे किंतु कृष्ण अपनी ही सोंचों में मगन उनके पाँव दबाते हुए बचपन की बातें करते चले जा रहे थे, कि तभी रुक्मिणी ने उनके कंधे पर हाथ रखा। कृष्ण ने चौंक कर पहले उन्हे देखा और फिर सुदामा को, फिर उनका आशय समझ कर वहाँ से उठ कर अपने कक्ष में चले आये।
कृष्ण की ऐसी मगन अवस्था देखकर रुक्मिणी ने पूछा, “स्वामी आज आपका व्यवहार बहुत ही विचित्र प्रतीत हो रहा है।
आप, जो इस संसार के बड़े से बड़े सम्राट के द्वारका आने पर उनसे तनिक भी प्रभावित नही होते हैं, वो अपने मित्र के आगमन की सूचना पर इतने भावविव्हल हो गए कि भोजन छोड़कर नंगे पाँव उन्हे लेने के लिए भागते चले गए। आप, जिनको कोई भी दुख, कष्ट या चुनौती कभी रुला नही पाई, यहाँ तक कि जो गोकुल छोड़ते समय मैया यशोदा के अश्रु देखकर भी नही रोये, वे अपने मित्र के जीर्ण शीर्ण, घावों से भरे पाँवों को देखकर इतने भावुक हो गए कि अपने अश्रुओं से ही उनके पाँवों को धो दिया।
कूटनीति, राजनीति और ज्ञान के शिखर पुरुष आप, अपने मित्र को देखकर इतने मगन हो गए कि बिना कुछ भी विचार किये उन्हे समस्त त्रिलोक की संपदा एवं समृद्धि देने जा रहे थे।”

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कृष्ण ने अपनी उसी आमोदित अवस्था में कहा, “वह मेरे बालपन का मित्र है रुक्मिणी।”
“परंतु उन्होंने तो बचपन में आपसे छुपाकर वो चने भी खाये थे जो गुरुमाता ने उन्हे आपसे बाँटकर खाने को कहे थे? अब ऐसे मित्र के लिए इतनी भावुकता क्यों?”, सत्यभामा ने भी अपनी जिज्ञासा रखी।
कृष्ण मुस्कुराये, ” सुदामा ने तो वह कार्य किया है सत्यभामा, कि समस्त सृष्टि को उसका आभार मानना चाहिए। वो चने उसने इसलिए नही खाये थे कि उसे भूँख लगी थी बल्कि उसने इसलिए खाये थे क्योंकि वो नही चाहता था कि उसका मित्र कृष्ण दरिद्रता देखे।
उसे ज्ञात था कि वे चने आश्रम में चोर छोड़कर गए थे, और उसे यह भी ज्ञात था कि उन चोरों ने वे चने एक ब्राह्मणी के गृह से चुराए थे। उसे यह भी ज्ञात था कि उस ब्राह्मणी ने यह श्राप दिया था कि जो भी उन चनों को खायेगा, वह जीवन पर्यंत दरिद्र ही रहेगा।
सुदामा ने वे चने इसलिए मुझसे छुपा कर खाये ताकि मैं सुखी रहूँ। वो मुझसे ईश्वर का कोई अंश समझता था, तो उसने वे चने इसलिए खाये क्योंकि उसे लगा कि यदि ईश्वर ही दरिद्र हो जायेगा तो संपूर्ण सृष्टि ही दरिद्र हो जायेगी। सुदामा ने संपूर्ण सृष्टि के कल्याण के लिए स्वय का दरिद्र होना स्वीकार किया।”

“इतना बड़ा त्याग!”, रुक्मिणी के मुख से स्वतः ही निकला।

” मेरा मित्र ब्राह्मण है रुक्मिणी, और ब्राह्मण ज्ञानी और त्यागी ही होते हैं। उनमें जनकल्याण की भावना कूट कूट कर भरी होती है। इक्का दुक्का अपवादों को यदि छोड़ दिया जाए तो ब्राह्मण ऐसे ही होते हैं।

अब तुम ही बताओ ऐसे मित्र के लिए ह्रदय में प्रेम नही तो फिर क्या उत्पन्न होगा प्रिये? गोकुल छोड़ते हुए मैं इसलिए नही रोया था क्योंकि यदि मैं रोता तो मेरी मैया तो प्राण ही छोड़ देती। परंतु मेरे मित्र के ऐसे पाँव देखकर, उनमें ऐसे घावों
को देखकर मेरा ह्रदय भर आया रुक्मिणी। उसके पाँवों में ऐसे घाव और जीवन में उसकी ऐसी दशा मात्र इसलिए हुई क्योंकि वह अपने इस मित्र का भला चाहता था। पता है रुक्मिणी, परिवार को छोड़कर किसी और ने कभी इस कृष्ण का इतना भला नही चाहा। लोग बाग तो मुझसे उनका भला करने की अपेक्षा रखते हैं। बस सुदामा जैसे मित्र ही होते हैं जो अपने मित्र के सुख के लिए स्वेच्छा से दरिद्रता एवं कष्ट का आवरण ओढ़ लेते हैं। ऐसे मित्र दुर्लभ होते हैं और न जाने किन पुण्यों के फलस्वरूप मिलते हैं। अब ऐसे मित्र को यदि त्रिलोक की समस्त संपदा भी दे दी जाए तो भी कम होगा।”, कृष्ण अपने भावुकता से भर्राये हुए स्वर में बोले।
इधर कक्ष में समस्त रानियों के नेत्र सजल थे और उधर कक्ष के बाहर खड़े सुदामा के नेत्रों से गंगा यमुना बह रही थीं।

सुदामा केवल एक दरिद्र ब्राह्मण नहीं हैं, वह साक्षात स्वरूप हैं, यही सृष्टि का ब्राह्मण है। ब्राह्मण अर्थात धर्मनिष्ठ, तपोनिष्ठ, ब्रह्मनिष्ठ, त्याग और तेज जिसमें सृष्टि स्वयं को सृजित करने की ऊर्जा पाती है।

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