वाइट-कॉलर आतंकवाद: राष्ट्र के भीतर पनपता अदृश्य खतरा

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शाश्वत तिवारी
शाश्वत तिवारी

देश के भीतर हो रही शिक्षा, प्रतिष्ठा और आतंक की खतरनाक जुगलबंदी पर रक्षामंत्री राजनाथ सिंह द्वारा ‘वाइट-कॉलर आतंकवाद’ को लेकर व्यक्त की गई चिंता केवल एक राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि भारत की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था के लिए गंभीर चेतावनी है। उदयपुर में दिए गए उनके वक्तव्य ने एक ऐसे खतरे की ओर ध्यान खींचा है, जो अब बंदूकधारी या जंगलों में छिपे आतंकियों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि शहरों, अस्पतालों, प्रयोगशालाओं, कॉर्पोरेट दफ्तरों और शिक्षण संस्थानों के भीतर चुपचाप पनप रहा है। दिल्ली में हालिया बम विस्फोट की घटना, जिसमें आरोपी एक शिक्षित डॉक्टर बताया गया, इस सच्चाई को और भी भयावह बना देती है कि आतंक का नया चेहरा पढ़ा-लिखा, पेशेवर और सामाजिक रूप से सम्मानित हो सकता है। परंपरागत रूप से ‘वाइट-कॉलर क्राइम’ शब्द का प्रयोग आर्थिक अपराधों, जैसे घोटाले, टैक्स चोरी, कॉर्पोरेट फ्रॉड के लिए किया जाता रहा है। लेकिन वाइट-कॉलर आतंकवाद उससे कहीं अधिक खतरनाक अवधारणा है। यह वह स्थिति है, जब अत्यंत शिक्षित, तकनीकी रूप से दक्ष, सामाजिक रूप से प्रतिष्ठित व्यक्ति आतंकवादी गतिविधियों, साजिशों या हिंसक राष्ट्रविरोधी कृत्यों में संलिप्त पाए जाते हैं।

यह आतंकवाद इसलिए खतरनाक है क्यों कि यह पहचान में नहीं आता। यह सिस्टम के भीतर रहकर सिस्टम पर हमला करता है और यह कानून व समाज, दोनों की आंखों में धूल झोंकता है। 21वीं सदी में आतंकवाद केवल सीमा पार से आने वाला खतरा नहीं रह गया है। अब यह कट्टर विचारधाराओं, डिजिटल नेटवर्क, अकादमिक कट्टरता, बौद्धिक उग्रवाद के रूप में सामने आ रहा है। पहले आतंकवादी की पहचान हथियार, संदिग्ध गतिविधि, चरमपंथी संगठन से होती थी। आज पहचान धुंधली है, वह कोई डॉक्टर हो सकता है, इंजीनियर, प्रोफेसर, वैज्ञानिक या आईटी विशेषज्ञ इनमें से कोई भी हो सकता हैं। यह मान्यता लंबे समय तक रही कि शिक्षा, व्यक्ति को उदार और जिम्मेदार बनाती है। लेकिन हालिया घटनाएं बताती हैं कि शिक्षा अगर मूल्यहीन हो, तो वह हथियार बन जाती है। उच्च शिक्षा, अगर नैतिकता से रहित हो, अगर राष्ट्रबोध से कटी हो, अगर सामाजिक जिम्मेदारी से शून्य हो, तो वही शिक्षा आतंक की प्रयोगशाला बन सकती है।

पिछले दिनों दिल्ली में हुए बम विस्फोट के मामले में लखनऊ की एक डॉक्टर का नाम सामने आना, कई बड़े सवाल खड़े करता है। क्या हमारी इंटेलिजेंस प्रोफाइलिंग अधूरी है? क्या हम अब भी अपराधी को केवल उसकी सामाजिक पहचान से आंकते हैं? क्या पेशेवर प्रतिष्ठा कानून से ऊपर हो गई है? दिल्ली की यह घटना स्पष्ट करती है कि आतंकवाद अब ‘हाशिए के लोग’ नहीं, बल्कि ‘मुख्यधारा के चेहरे’ भी अपना रहा है। जानकारों की राय में, कुछ लोग अत्यधिक पढ़े-लिखे होते हुए भी, कट्टर विचारधाराओं के शिकार हो जाते हैं, स्वयं को ‘विशेष सत्य’ का वाहक मानने लगते हैं। वो मानते है कि, अत्यधिक शिक्षा कभी-कभी व्यक्ति को कानून से ऊपर, समाज से अलग और नैतिक नियंत्रण से मुक्त मानने की भ्रांति में डाल देती है। वहीं, दूसरी ओर ये भी साफ हैं कि आज कट्टरता किताबों से नहीं, बल्कि ऑनलाइन फोरम, डार्क वेब और एन्क्रिप्टेड चैट से फैल रही है। पेशेवर संस्थानों में नैतिक प्रशिक्षण की कमी, मानसिक स्वास्थ्य की अनदेखी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती। वाइट-कॉलर आतंकवादी सिस्टम को जानते हैं। कमजोरियों की पहचान करते हुए वो तकनीक का दुरुपयोग करते हैं। वे साइबर आतंक, जैविक हथियार, रासायनिक विस्फोट और स्लीपर सेल जैसे खतरों को जन्म दे सकते हैं। यह आतंकवाद सीमा से नहीं, भीतर से हमला करता है, जो आज कानून व्यवस्था के सामने नई चुनौती बन के सामने खड़ा हुआ हैं।

भारत की कानून व्यवस्था अब तक पारंपरिक अपराधों के लिए प्रशिक्षित रही है, लेकिन वाइट-कॉलर आतंकवाद के लिए, अब एक नया दृष्टिकोण चाहिए। प्रोफाइलिंग केवल आर्थिक नहीं, वैचारिक भी हो, इंटेलिजेंस नेटवर्क शिक्षा और पेशेवर संस्थानों तक पहुंचे। संदिग्ध गतिविधि की परिभाषा बदले समाज की भूमिका यह केवल सरकार की लड़ाई नहीं है। सभी भारतीय परिवारों को सतर्क होना होगा, अब समाज आ गया है कि शिक्षकों को सिर्फ पाठ्यक्रम नहीं, मूल्य भी सिखाने होंगे। मीडिया को सनसनी नहीं, समझ पैदा करनी होगी। समाज को यह समझना होगा कि अत्यधिक कट्टरता, चाहे वह कितनी भी शिक्षित क्यों न हो, खतरनाक है। शिक्षा व्यवस्था में सुधार की जरूरत आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। नैतिक शिक्षा को अनिवार्य करने की संवैधानिक मूल्यों पर आधारित पाठ्यक्रम की आलोचनात्मक सोच, न कि कट्टर सोच की शिक्षा का उद्देश्य सिर्फ नौकरी नहीं, बल्कि जिम्मेदार नागरिक बनाना होना चाहिए। वाइट-कॉलर आतंकवाद पर राजनाथ सिंह की चिंता, इस बात का संकेत है कि सरकार खतरे को पहचान रही है, लेकिन पहचान के साथ कठोर और दूरदर्शी नीति भी जरूरी है। आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई, केवल हथियारों से नहीं, बल्कि विचारों से लड़ी जाती है। वाइट-कॉलर आतंकवाद भारत के लिए अदृश्य, जटिल और अत्यंत खतरनाक चुनौती है। यह चुनौती हमें याद दिलाती है कि डिग्री, देशभक्ति की गारंटी नहीं होती। जब तक शिक्षा मूल्यवान नहीं होगी, कानून सख्त और निष्पक्ष नहीं होगा और समाज जागरूक व सतर्क नहीं होगा, तब तक यह खतरा और गहराता जाएगा। अब समय है आंखें खोलने का, भ्रम तोड़ने का और यह स्वीकार करने का कि आतंक का चेहरा बदल चुका है।

(लेखक जानेमाने स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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