मनोज श्रीवास्तव
लखनऊ। प्रदेश के जिस जिले से यशस्वी मुख्यमंत्री मिला हो और वहीं से लोकप्रिय जनप्रतिनिधि प्रदेश अध्यक्ष के रूप में मिल जाये तो कार्यकर्ताओं व समर्थकों में दुगना खुशी सड़कों पर उमड़ पड़ती है। मैं गोरखपुर गया, लेकिन गोरखपुर में ऐसा नहीं दिखा। उल्टे कार्यकर्ता सन्नाटे में हैं। कोई खुल कर अपना मन्तव्य नहीं व्यक्त करने को तैयार है। मुख्यमंत्री के इर्द-गिर्द घूमने वाले सांगठनिक मर्यादा में अपनी कुढ़न खुल कर व्यक्त नहीं कर पा रहे हैं। तो नवनिर्वाचित प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति से प्रसन्न लोग खुल कर उमंगोत्सव जैसा माहौल नहीं कर पा रहे हैं। स्थानीय भाजपा नेता बोले कि एक योगी आदित्यनाथ को रोकने के लिये टीम गुजरात ने गोरखपुर को सैफई बना दिया। महराजगंज के सांसद पंकज चौधरी व बांसगांव के सांसद कमलेश पासवान को मोदी मंत्रिमंडल में शामिल कर दो-दो केंद्रीय मंत्री दिया। इससे पहले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कोप का शिकार बन जनता की अदालत से खारिज हुये शिवप्रताप शुक्ल को राज्यसभा में भेज कर केंद्रीय मंत्री बनाया गया था। वर्तमान में शिव प्रताप शुक्ला हिमांचल प्रदेश के राज्यपाल हैं। वह जितना शिमला में बैठ कर संविधान की रक्षा कर रहे हैं, उससे ज्यादा ताकत से गोरखपुर को देखते हैं।

जब शुक्ला योगी की लोकप्रियता को चुनौती नहीं दे पाये तो कभी गोरखनाथ मंदिर और गोरक्षपीठाधीश्वर के तत्कालीन उत्तराधिकारी व वर्तमान में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बल पर निर्दल चुनाव लड़ कर शिवप्रताप शुक्ल को बुरी तरह पराजित करने वाले डॉ राधामोहन दास अग्रवाल को राज्यसभा में भेज दिया। यही नहीं आश्चर्यजनक तरीके से डॉ अग्रवाल को ताकत देने के लिये उन्हें पार्टी का राष्ट्रीय महामंत्री बना दिया गया। सदन में उन्होंने अपनी उपस्थिति को सिद्ध किया है। लेकिन उसके बाद भी कार्यकर्ताओं को लेकर गोरखपुर में योगी के दबदबे पर कोई असर नहीं पड़ा। बांसगांव के सांसद कमलेश पासवान और महराजगंज के सांसद पंकज चौधरी को केंद्रीय राज्यमंत्री बना दिया। कहा तो यह भी जाता है कि योगी आदित्यनाथ के सामने इनका कद बढ़ाने के लिये प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बिना कार्यक्रम के इनके घर चले गये थे। लेकिन तब तक यह कोई कमाल नहीं दिखा सके थे जब तक केवल केंद्रीय मंत्री थे। संघर्षशील पिता के राजनैतिक वारिश कमलेश पासवान लोकप्रिय नेता हैं। लेकिन वह जबरी विवाद के आदी नहीं हैं, इस लिये सब कुछ ठीक है। बहुत बड़े वर्ग का उन्हें समर्थन हैं। हर दिन सैकड़ों लोगों की चिकित्सा सेवा, थाना-कचहरी, रेलवे-शिक्षा के क्षेत्र में उनके अलग-अलग प्रतिनिधि जन सेवा को साकार करते हैं। उनके सिस्टम से लगे लोगों को यही निर्देश है कि व्यवहार को प्राथमिकता, अनावश्यक विवाद से बचें। यही उनकी ताकत और पहचान बन गयी।

गोरखपुर के बहुत से कार्यकर्ता दिल्ली जाकर नये प्रदेश अध्यक्ष के कदम से कदम मिला कर कदमताल करने की कोशिश में हैं, लेकिन अभी वह तनाव पैदा करने वाले किसी माहौल को धार नहीं दे पाये हैं। पंकज चौधरी की प्रदेश अध्यक्ष के रूप में पहली गोरखपुर यात्रा पर सबकी निगाह है। सूत्रों की मानें तो ऐसे भी कार्यकर्ता बड़ी संख्या में सक्रिय हैं जिन्हें बार-बार यह संदेश करवाया जाता था कि मुख्यमंत्री के इस कार्यक्रम में आपको नहीं रहना है। जो लोग पिसान पोत कर भंडारी बन योगी के नाम पर गोरखपुर में अपना फरमान चलाये अब वहां के राजनैतिक सामंजस्य का माहौल उनके बस का नहीं रह गया है। सामाजिक जीवन में उतरने वाले राजनैतिक कार्यकर्ता का पहला शर्त सम्मान से ही आरंभ होता है। बहुत दिन बाद गोरखपुर में ऐसा हुआ है कि जिसे जो मिला है वह वही वापस करने की तैयारी में है। कल्पनाओं में बहुत कुछ है, हकीकत का सबको बेसब्री से इंतजार है। सोमवार को गोरखपुर के एक नेता इतने उड़ान पर थे कि हर 15 मिनट पर अपनी बात शायरी में ही कह रहे थे, “अब हवायें ही करेंगी रोशनी का फैसला, जिस दिये में तेल होगा वह दिया रह जायेगा”, सितम भी सहना दुआ भी देना, गया बेबसी का वह जमाना, अगर है हिम्मत गिराओ बिजली, बना रहा हूँ मैं आशियाना”।
प्रदेश अध्यक्ष होते ही पंकज चौधरी ने अपने पहले उद्बोधन में कहा कि “कार्यकताओं के लिये लड़ूंगा, सुनूंगा और मरूंगा”। केंद्र और राज्य में डबल इंजन वाली आपकी ही सरकार है। थाने-तहसील-अस्पताल के कार्यप्रणाली की हकीकत जान कर उसमें गुणात्मक सुधार के लिये कुछ सार्थक प्रयास करेंगे या वैसे ही लड़ेंगे, सुनेंगे और मरेंगे। फिलहाल सत्ताधारी दल में उसके प्रदेश अध्यक्ष को इसकी जरूरत अमूमन होता नहीं। आक्रामक छवि के लिये विख्यात मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उससे पहले ही कह दिया था कि सरकार संगठन के साथ बेहतर ताल मेल बिठा कर चलायेंगे। उसके बाद भी, क्या पंकज चौधरी पहले से ही लड़ने का मन बना कर आये हैं। शायद योगी आदित्यनाथ बाद में बोले होते तो बिना उत्तर दिये मंच से न उतरे होते। केंद्रीय नेताओं के आशीर्वाद के अलावा पंकज चौधरी के पास लोकल लेबल पर सबसे बड़े जो डायनामाइट हैं वह हैं पूर्व प्रदेश अध्यक्ष डॉ रमापति राम त्रिपाठी, उनकी ठंढी चाल भी सामने वाले को घायल कर देती है। लेकिन वह भी योगी आदित्यनाथ के खिलाफ मोर्चा खोल कर थक चुके हैं। जितना मैं जान पाया हूँ पंकज चौधरी किसी के कहने पर कुएं कूदने वाले नहीं हैं। दूसरे डॉ राधामोहन दास अग्रवाल अकेले ही सबको साधने की क्षमता रखते हैं। उन्होंने अपनी ही सरकार में गोरखपुर के नये ड्रेनेज सिस्टम पर अधिकारियों को चेताया वह नहीं माने, विषय विधानसभा में उठाया, जनकल्याण के किसी भी मुद्दे, जिसको लेकर आगे बढ़े पीछे नहीं हटे। यह उनका राजनैतिक चरित्र बन चुका है।
अधिकारियों को निर्णय बदलना पड़ा, उन्हें फिर से वही करना पड़ा जो डॉ राधामोहन अग्रवाल ने कहा था।उनके निधि से बनने वाली शहर में स्थानीय सड़कों को वह पचास साला सड़क कहते थे। स्थानीय लोगों को बुला कर कहते थे आपकी सड़क बन रही है। खड़े होकर बनवाइये, कुछ खराब होगा तो आप भी जिम्मेदार होंगे। जब नगर निगम-नगर पालिका की सड़कें न्यूनतम समय में ध्वस्त होने की गारंटी से बनते हों तब कोई ऐसी सड़कों को बनाने का दावा करता हो यह उनके ईमानदारी और संघोंन्मुखी छवि को स्थापित करने में मील का पत्थर बनी। बच्चों के विख्यात डॉ से देश की राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय होने के बाद आज भी गोरखपुर आने पर निःशुल्क अपने मरीजों को देखने का खबर अखबार, चैनल से देते हैं। पीड़ितों की सेवा उनकी पहली प्राथमिकता है। फिलहाल योगी आदित्यनाथ कुछ करें या न करें उनसे ललकार के लड़ने वालों को चारित्रिक और आर्थिक विंदु पर खुद को पहले साबित करना पड़ेगा। जिन्हें लग रहा कि हम योगी का कुछ बिगाड़ सकते हैं, उनका समूह भी चोरी-छिपे ही चिढ़ाने वाली खुशी व्यक्त कर पा रहा है। आने वाले कुछ दिन भाजपा में गोरखपुर और प्रदेश की राजनीति में अपने-अपने हिसाब से देखने वालों के लिये बहुत कुछ देने को तैयार है। हर किसी के लिये यही ” देखते रहिये-प्रतीक्षा करिये”।
