यशपाल: साहित्य को क्रांति का हथियार बनाने वाले लेखक

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वरुण कुमार

यशपाल का नाम केवल एक कथाकार के रूप में नहीं, बल्कि एक क्रांतिकारी विचारक और समाज-परिवर्तन के प्रबल पक्षधर के रूप में अंकित है। उनके लिए साहित्य कोई आत्ममुग्ध कलात्मक अभ्यास नहीं था, बल्कि अपने विचारों को व्यापक जन-समुदाय तक पहुंचाने का सशक्त माध्यम था। यह दृष्टिकोण उन्हें अपने समकालीनों से अलग और विशिष्ट बनाता है।
यशपाल की साहित्यिकता का निर्माण विद्रोह और क्रांति की जिस चेतना से हुआ था, वह उनके समस्त लेखन का केंद्रीय भाव बनी रही। भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद और हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन से जुड़े एक सक्रिय क्रांतिकारी के रूप में उन्होंने जो अनुभव अर्जित किए, वे उनकी रचनाओं में जीवंत रूप से प्रतिफलित हुए। जेल की यातनाएं, साथियों की शहादत और स्वतंत्रता संग्राम के उथल-पुथल भरे दिनों ने उनकी लेखनी को धार दी।

जेल से रिहा होने के बाद ही यशपाल ने लेखन शुरू किया, साहित्य को भारतीय समाज में व्याप्त बुराइयों को दूर करने के एक माध्यम के रूप में देखते हुए। मार्क्सवाद उनकी पसंदीदा विचारधारा बन गया; उन्होंने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी को एचएसआरए का उत्तराधिकारी माना, हालाँकि वे न तो उसमें और न ही किसी अन्य राजनीतिक दल में शामिल हुए। उनकी पहली रचना, पिंजरे की उड़ान, एक उल्लेखनीय सफलता थी। उन्होंने अपनी खुद की पत्रिका, विप्लव (प्रलय) स्थापित करने से पहले, हिंदी भाषा की पत्रिका कर्मयोगी के लिए कुछ समय तक काम किया, जो 1941 में बंद होने तक हिंदी और उर्दू में प्रकाशित हुई। बंद करना आवश्यक हो गया क्योंकि सरकार, जिसने विप्लव को राजद्रोही माना, ने 13,000 रुपये की सुरक्षा की मांग की; 1947 में भारत को स्वतंत्रता मिलने के बाद पत्रिका को फिर से शुरू किया गया। 1941 में, उन्होंने विप्लव कार्यालय नामक एक प्रकाशन गृह की स्थापना की और 1944 में साथी प्रेस नामक एक प्रिंटिंग प्रेस की स्थापना की।

यशपाल की अगली पुस्तकें – दादा कामरेड (कॉमरेड, द बिग ब्रदर) और देशद्रोही (देशद्रोही) – दोनों काल्पनिक रचनाएँ थीं जिनमें कम्युनिस्ट पार्टी केंद्रीय विषय थी। उस समय और भारतीय स्वतंत्रता के बीच अन्य निबंध, उपन्यास और लघु कथाएँ प्रकाशित हुईं और इनसे यह धारणा बनी कि वह एक आंदोलनकारी थे। उनकी गिरफ्तारी पर सार्वजनिक आक्रोश फैल गया और सरकार को अपमानजनक तरीके से पीछे हटना पड़ा, हालाँकि वे उन्हें छह महीने की अवधि के लिए लखनऊ से प्रतिबंधित करने में सफल रहे और इस तरह विप्लव को अंततः बंद कर दिया गया । उनकी आत्मकथा, सिंहावलोकन (एक शेर की नज़र या एक पिछड़ी नज़र) , 1951-55 के बीच तीन खंडों में प्रकाशित हुई थी और इसे भारत में स्वतंत्रता के लिए सशस्त्र संघर्ष के विस्तृत विवरण के साथ-साथ उनके अपने प्रारंभिक जीवन की जानकारी के लिए भी जाना जाता है।

यशपाल की क्रांतिकारी चेतना हर प्रकार की यथास्थिति पर प्रश्न खड़ा करती थी। चाहे वह सामाजिक रूढ़ियां हों, धार्मिक आडंबर हों, आर्थिक शोषण हो या राजनीतिक पाखंड – उनकी पैनी दृष्टि हर जगह व्यवस्था की विसंगतियों को पकड़ती थी। उनके उपन्यास ‘दादा कॉमरेड’ में क्रांतिकारी आंदोलन का जीवंत चित्रण है तो ‘झूठा सच’ में विभाजन की त्रासदी और मानवीय पीड़ा का मार्मिक वर्णन।स्त्री-मुक्ति के प्रश्न पर यशपाल ने अपने समय से बहुत आगे जाकर सोचा। ‘दिव्या’, ‘देशद्रोही’ और अन्य रचनाओं में स्त्री पात्र केवल भोग्या या अबला नहीं हैं, बल्कि विद्रोही चेतना से संपन्न स्वतंत्र व्यक्तित्व हैं। उन्होंने पितृसत्तात्मक समाज की जकड़नों को बेबाकी से चुनौती दी।यशपाल का महत्व इस बात में भी है कि उन्होंने साहित्य को जनता की भाषा में लिखा। उनकी भाषा सरल, सहज और प्रवाहमय है। वे जनसाधारण से सीधे संवाद करते हैं, उन्हें जागरूक करते हैं और सोचने के लिए विवश करते हैं। उनके यहां साहित्य का अभिजात्य नहीं, जनपक्षधरता है।

आज जब समाज में फिर से यथास्थिति को बनाए रखने की शक्तियां सक्रिय हैं, जब असमानता और अन्याय के नए रूप सामने आ रहे हैं, तब यशपाल की क्रांतिकारी चेतना और प्रासंगिक हो जाती है। उनका साहित्य हमें याद दिलाता है कि लेखक केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि समाज का चिंतक और परिवर्तन का वाहक भी होता है। यशपाल ने साहित्य को जीवन से और जीवन को संघर्ष से जोड़ा – यही उनकी सबसे बड़ी देन है। यशपाल हिन्दी के अतिशय शक्तिशाली तथा प्राणवान साहित्यकार थे। अपने दृष्टिकोण को व्यक्त करने के लिए उन्होंने साहित्य का माध्यम अपनाया था। लेकिन उनका साहित्य-शिल्प इतना ज़ोरदार है कि विचारों की अभिव्यक्ति में उनकी साहत्यिकता कहीं पर भी क्षीण नहीं हो पाई है। यशपाल जी का सन् 26 दिसंबर, 1976 ई. में निधन हो गया।

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