दो टूक : बिहार की जनता ने नीतीश के पलटने के मंसूबों पर लगाया पलीता

Nitish Kumar 2

राजेश श्रीवास्तव

बिहार चुनाव परिणाम आ चुके हैं और इस चुनाव में सबसे अहम बात यह है कि इस बार बिहार की जनता ने ऐसा जनादेश दिया कि नीतीश कुमार के पलटने के मंसूबों पर ही पलीता लगा दिया है। जनादेश का संदेश मानें तो बिहार की जनता ने नीतीश को वोट तो मुट्ठी भर कर दिया लेकिन NDA  में रहने को मजबूर कर दिया। अगर इस चुनाव में भाजपा नीतीश को मुख्यमंत्री ने बनाये तो नीतीश बाहर न जाने को मजबूर हैं। अगर नीतीश को छोड़कर भाजपा सरकार बनाना चाहे तो उसके पास 12० का आंकड़ा ही रहेगा। भाजपा तो दो विधायकों की जुगत करके 122 का जादुई आंकड़ा हासिल कर सकती है।

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लेकिन अगर नीतीश महागठबंधन में जाते हैं तो उनके पास 117 का आंकड़ा रहेगा, ऐसे में राजद के सामने पांच विधायकों को तोड़ पाना आज की तारीख में बड़ी मुश्किल है। लेकिन इससे पहले के हर चुनाव परिणाम में यही होता था कि नीतीश के पास भले ही सीटें कम होती थीं लेकिन उनके बिना सरकार बनती नहीं दिखती थी। इसी के चलते चाहे राजग हो या राजद दोनो नीतीश को मुख्यमंत्री बनाने की शर्त पर तत्काल राजी हो जाते थे। जिसका खामियाजा यह होता था कि नीतीश पिछले 20 सालों से लगातार मुख्यमंत्री पद पर काबिज थे। लेकिन इस चुनाव परिणाम में नीतीश किसी के साथ जाकर अपने लिए मुख्मयंत्री पद का दबाव बनाने की स्थिति में नहीं है। सूत्रों की मानें तो इसीलिए इस बार NDA में अभी भी नीतीश के नाम पर सहमति नहीं बन पायी है।
जानकारी के मुताबिक भाजपा हाईकमान नीतीश को यह समझाने पर लगा है कि इस बार भाजपा को बड़ा भाई बनने दें पिछली बार अधिक सीटें आनें के बाद भी हमने नीतीश को मुख्यमंत्री बना दिया था। लेकिन इस बार नीतीश हमारी सरकार बनायें और बिहार में पहली बार भाजपा का मुख्मयंत्री बनाने का सपना पूरा हो सके।

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सूत्रों की मानें तो नीतीश इस पर अभी सहमत नहीं हैं। लेकिन नीतीश अब कहीं जाने के मूड में नहीं दिखेंगे क्योंकि हर व्यक्ति अपनी जाती हुई पारी में अच्छी विरासत छोड़कर जाना चाहता है। वो जानते हैं कि उन्हें काम करने के लिए जो आर्थिक मदद चाहिए होगी वो केंद्र में मोदी सरकार से ही होनी है। 15 साल पहले वो प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी के लिए विपक्ष से नरेंद्र मोदी के बराबरी के प्रतियोगी थे, लेकिन अब उन्होंने अपनी भूमिका डिफ़ाइन कर ली है। एक बात तो तय है कि अब नीतीश कुमार जब चाहेंगे तभी रिटायर होंगे। चुनाव से पहले इस तरह के कयास लगाए जा रहे थे कि अगर बीजेपी को JDU से अधिक सीटें मिलीं तो हो सकता है कि बीजेपी पार्टी से कोई चेहरा सीएम पद के लिए आगे करे और नीतीश फिर मुख्यमंत्री न बन सकें।

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लेकिन रणनीतिकारों की मानें तो जहां तक बीजेपी की बात है तो वो नीतीश की छवि को समझती है और नीतीश के पद से जाने के बाद की स्थिति में उस छवि को अपने साथ लेकर चलेगी। नीतीश को महिला वोटरों का बड़ा समर्थन है और महिलाओं के वोट के चक्कर में बीजेपी अपनी छवि ये नहीं रखना चाहेगी कि बीजेपी ने उन्हें धोखा दिया। बीजेपी अब इस तरह का रिस्क लेने की स्थिति में नहीं होगी। भले ही सीएम के चेहरे के लिए बीजेपी ने सीधे तौर पर नीतीश का नाम नहीं लिया, लेकिन वो बार-बार कहते रहे कि नीतीश के नेतृत्व में चुनाव लड़ रहे हैं। मुझे लगता है कि नीतीश कुमार खुद को तब कंफ़र्टेबल महसूस करते जब बीजेपी का स्ट्राइक रेट इस चुनाव में थोड़ा कमज़ोर होता।

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नीतीश पलटना भी चाहें तो महागठबंधन के पास वो आंकड़े नहीं हैं कि वो उनके सहारे सत्ता पर काबिज़ हो सकें। जहां तक बीजेपी की बात है तो वो सरप्राइज़ देती है। हो सकता है अभी नहीं लेकिन आने वाले वक्त में वो अपना सीएम चेहरा आगे बढ़ाना शुरू करें और कुुछ समय तक नीतीश को मौका दें और कुछ समय बाद अपना मुख्यमंत्री बनवा दे। क्योंकि भाजपा के सामने बिहार के बाद अब बड़ा टारगेट बंगाल है । भाजपा के लिए बंगाल भी बड़ी चुनौती है। ऐसे में भाजपा ऐसा कोई संदेश नहीं देना चाहती जिससे यह लगे कि भाजपा अपने सहयोगियों को झटका देती है, इसीलिए भाजपा बंगाल चुनाव तक नीतीश को हटा कर कोई जोखिम नहीं लेना चाहेगी। बीजेपी ने 89 सीटें और जेडीयू ने 85 सीटें जीतीं और एक तरह से पूरा चुनाव क्लीन स्वीप कर लिया। वहीं महागठबंधन के सभी दलों की सीटें मिलकर 50 का आंकड़ा भी नहीं छू सकीं। आरजेडी मात्र 25 सीटें ही जीत सकी।

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चुनाव संपन्न होने के बाद कई सवाल उठ रहे हैं, क्या JDU के पास साइड बदलने के विकल्प अब ख़त्म हो गए हैं? क्या महिलाओं को लुभाना अब एक फ़ॉर्मूला बन गया है? तेजस्वी यादव बिहार के लोगों को आश्वस्त क्यों नहीं कर पा रहे हैं? इस जीत के राष्ट्रीय स्तर पर क्या मायने हैं? सवाल ये भी हैं कि प्रशांत किशोर की कोशिशों में कहां कमी रह गई? क्या नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बनेंगे और अगर बने तो क्या अपना कार्यकाल पूरा कर पाएंगे? इसके साथ सवाल यह भी है कि प्रधानमंत्री मोदी आख़रि अपना करिश्मा कैसे क़ायम रख पा रहे हैं? राहुल गांधी के लिए इस हार के क्या मायने होंगे? इस चुनाव में उन्हें NDA की वापसी तो नज़र आ रही थी, लेकिन इस तरह के क्लीन स्वीप की उम्मीद उन्हें नहीं थी । सवाल बहुत हैं और सभी के जवाब मिलने में कुछ वक्त तो लगेगा।

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