नए भारत के विराट नेतृत्व के पक्ष में बिहार का जनादेश

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  • स्थायित्व के साथ सुरक्षित भारत के निर्माण का आधार है बिहार का चुनाव परिणाम
  • विपक्ष की हिंदूविरोधी अग्निधर्मा राजनीति को बिहार के लोगों ने नकार दिया

आचार्य संजय तिवारी

बिहार के चुनाव परिणाम आ चुके। जनादेश की आंधी में भारत विरोधी जुमलों का नामोनिशान मिट गया। बिहार की जनता ने साफ संदेश दे दिया कि ज्ञान और संस्कृति की धरती पर अपशब्दों, गलियों, संस्कृति पर आघात और सनातन विरोधी साजिशकर्ताओं के लिए अब कोई जगह नहीं है। बिहार ने नए भारत के विराट नेतृत्व में गजब की आस्था व्यक्त किया है। नरेंद्र मोदी पर भरोसा, अमित शाह की रणनीति और NDA के सभी दलों में अद्भुत सामंजस्य ने भारत की राष्ट्रीय राजनीति को भी स्थायित्व प्रदान किया है। पूरे चुनाव प्रबंधन की रणनीति के शिल्पी अमित शाह की दूरगामी दृष्टि है जिसने इस एक चुनाव के माध्यम से ही केंद्र की सरकार को भी बहुत सलीके से और मजबूत बना दिया है। गाहे बगाहे केंद्र सरकार की अस्थिरता के सपने देखने वालों की अब नींद जरूर टूट जाएगी। चुनाव आयोग समेत देश की लगभग सभी संवैधानिक संस्थाओं को बार बार कठघरे में खड़ा कर लोगो को भटकाने की राहुल गांधी की योजना को भी इस परिणाम ने ध्वस्त कर दिया है। इस चुनाव में मोदी और नीतीश को लेकर महिलाओं ने जो उत्साह दिखाया वह अभूतपूर्व कहा जाएगा।

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वास्तव में बिहार चुनाव की अवधि और इसके परिणाम की गहराई को देखने से कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आ रहे हैं। यह चुनाव वास्तव में एक लिटमस परीक्षण ही था जिसकी वास्तविकताओं को भी सामने लाने में डर लग रहा था। इंडी गठबंधन की धमकी और भाषा ने अनेक सर्वे एजेंसियों को वास्तविकता परोसने नहीं दिया। सब डरे हुए थे। जब बिहार में चुनाव प्रचार शुरू हुआ था तब वोट चोरी के आरोपों के साथ अत्यंत उपद्रवी अंदाज में कांग्रेस और राजद ने अभियान चलाया। राहुल गांधी की आक्रामकता से अब सभी परिचित हैं। उन लोगों को यह लग रहा था कि बिहार के नौजवान उनकी आक्रामकता और शैली के प्रभाव में जरूर आएंगे और नेपाल की जेन जेड क्रांति जैसा कुछ हो जाएगा। बिहार में दक्षिण के उन नेताओं के साथ मंच सजाए गए जो बाकायदा अपने राज्य में हिंदुत्व उन्मूलन अभियान चला रहे हैं।

यहां एक और महत्वपूर्ण घटना हुई। बिहार का बेटा बनकर प्रशांत किशोर का चुनावी शंखनाद और जन जागरण। उनकी घोषणा थी कि इस बार नीतीश कुमार की पार्टी जद यू 25 से भी कम सीटों में सिमट जाएगी। यदि 25 से ज्यादा सीटें जद यू को मिलीं तो मैं राजनीति छोड़ दूंगा। बिहार चुनाव से पहले तक तक अलग अलग राजनीतिक दलों के लिए चुनावी रणनीति की दुकान चलाने वाले प्रशांत किशोर को लगा था कि बिहार के वास्तविक मुद्दों को उभार कर, जंगल राज को दोहराने का डर दिखा कर जनता को वह अपने पक्ष में कर लेंगे। इसी सपने के साथ उन्होंने सभी 243 सीटों पर जनसुराज के प्रत्याशी खड़े कर दिए। प्रशांत किशोर की बातों और उनके मुद्दों से जनता आकर्षित तो हुई लेकिन जनता को इसके लिए प्रशांत किशोर की पार्टी पर भरोसा नहीं हुआ।

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उभरे हुए ये मुद्दे लहलहाती फसल बन कर NDA की खलिहान की फसल बन गए। 20 वर्ष पुराने जंगलराज की कहानियों ने बिहार के युवाओं और महिलाओं को विकल्प तलाशने पर विवश कर दिया। परिणाम यह हुआ कि जनता के सामने सबसे विश्वसनीय चेहरे के रूप में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही नजर आए। रणनीति के साथ मगध की धरती पर गृहमंत्री अमित शाह ने मैदान में अपनी संतुलित और सुदृढ़ सेना उतार दी। भाजपा, जद यू के अलावा चिराग पासवान, जीतनराम मांझी और भूपेंद्र कुशवाहा जैसे बिहारी नेतृत्व को साझा सेना देकर सामने रखा। प्रबंधन में सी आर पाटिल के साथ केशव मौर्य की टीम लगा दी।

प्रधानमंत्री और गृहमंत्री ने बिहार को सांस्कृतिक धरातल पर मथा। लोक पर्व छठ को वैश्विक सम्मान देते और दिलाते हुए बिहार में विकास के नए आयाम दिखाए। महिलाओं के लिए अलग से भी नई योजनाएं लाई गईं। नीतीश कुमार के नेतृत्व पर भरोसा जताया। इंडी गठबंधन को उन्हीं के कारनामों से खूब घेरा। लालू प्रसाद यादव के परिवार में हुए विघटन ने बिहार में नया माहौल बना दिया। तेजस्वी के मुकाबले तेजप्रताप यादव एक सहज, सरल और संवेदनशील नेता के रूप में उभरे। अमित शाह जी की रणनीति ने भाजपा को अकेले इतना सक्षम बना दिया कि नीतीश बाबू के बिना भी वह सरकार बना सकते हैं। यह अलग बात है कि भाजपा ऐसा नहीं करेगी। हां, यह जरूर हुआ कि अब नीतीश कुमार जी कभी भी भाजपा नीत केंद्र सरकार को हिला भी नहीं सकेंगे। बिहार के परिणाम ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार को बहुत मजबूत कर दिया है। भाजपा के बिहार प्रभारी और केंद्रीय शिक्षांत्री धर्मेंद्र प्रधान कहते हैं कि जनता ने पिछले 20 साल के काम, पिछले साढ़े 11 साल की प्रधानमंत्री की नीतियों और जंगल राज तथा कुशासन के इतिहास को परखा और तुलना करने के बाद हम पर फिर से भरोसा जताया है।

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यहां यह लिखना बहुत समीचीन लगता है कि बिहार के विकास मॉडल के ब्रांड एंबेसडर स्वयं तेजस्वी यादव उसी रात बन गए थे जिस रात पटना में लोकनायक ब्रिज या कहें कि मरीन ड्राइव पर डांस करते नजर आए। दरअसल तेजस्वी यह समझ ही नहीं सके कि उनके पिता के कार्यकाल वाले दौर से निकल चुके बिहार के 20 वर्षों के विकास का ही परिणाम है कि वे आधी रात को बिल्कुल निडर होकर यह डांस कर रहे हैं। उनका यह डांस स्वयं नीतीश कुमार के विकास के मॉडल का प्रचार कर गया। ऊपर से प्रशांत किशोर द्वारा लालू के बिहार के जंगल राज की घर घर पहुंची कहानी को NDA के प्रचार अभियान ने ऐसी तीव्रता दी कि बिहार का हर युवा 20 साल पहले वाले बिहार की कहानी नेट पर सर्च करने लगा।

एक और बात। सोशल मीडिया और कुछ यूट्यूबरों ने इंडी गठबंधन के पक्ष में राहुल और तेजस्वी की जोड़ी के लिए खूब अभियान चलाया लेकिन उसे जो लाइक और कमेंट मिले वे वोटों में तब्दील नहीं हो सके। अभी उत्तर प्रदेश में भाजपा के साथ गलबहियों में समाए ओमप्रकाश राजभर ने तो यहां तक ऐलान कर दिया कि बिहार में नीतीश सरकार जा रही है। केंद्र से लेकर प्रदेशों तक के सभी बडे नेता एक लड़के ( तेजस्वी यादव) के पीछे लग गए हैं। राजभर वैसे भी टिप्पणियों के लिए जाने जाते हैं लेकिन इस बार उन्होंने सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह को ही निशाना बना लिया। देखना यह दिलचस्प होगा कि उत्तर प्रदेश में राजभर की मुक्ति कब तक हो पाती है।

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