दहशतगर्त डॉक्टरों से दहली दिल्ली, दिल में हिंदुस्तान तो कैसे बन रहे फिदायीन…

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  • भारतीय मुसलमानों में देश के लिए नफरत या सीमा पार से आने वाले आतंक का पनाहगार आखिर कौन!
भौमेंद्र शुक्ल
भौमेंद्र शुक्ल

‘सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा…’, ‘गंगा-जमुनी तहजीब’, ‘हिंदू-मुस्लिम, सिक्ख-ईसाई आपस में सब भाई-भाई’ ये सारे गाने/ कहावतें गुनगुनाने वाले एक बार फिर सोच में डूब गए हैं..दिल्ली की घटना के बाद वे सोचने लगे है कि बचपन से सो सुना-पढ़ा क्या वो कहीं अटक या भटक चुका है। बीते सोमवार की तो बात है जब मालूम पड़ा कि देश के दिल दिल्ली को दहशत से भरने वाले चारों डॉक्टर मुसलमान ही निकले हैं। डॉ. मुजम्मिल शकील, डॉ. अदील राथर, डॉ. शाहीन शाहीद और डॉ. मोहम्मद उमर। ये चारों के चारों डॉक्टर और चारों के चारों मुसलमान। अक्सर लोग कहते हैं कि आतंकियों की कोई जाति और कोई मजहब नहीं होता , कोई दुबे, तिवारी, पांडेय, उपाध्याय और मिश्रा देश में आतंक फैलाता नहीं मिला। कोई सिंह, सूर्यवंशी, रघुवंशी देश में दहशत नहीं फैला रहा है। आखिर क्या बात है कि जब भी देश में आतंकी हमले होते हैं तो सबसे पहला नाम केवल और केवल मुसलमानों का ही आता है। आखिर क्यों? …सवाल चुभता जरूर है पर लाजिमी है..।

अल्लामा इकबाल भी मुसलमान थे, लेकिन उनका दिल अपने देश हिन्दुस्तान के लिए धड़कता था। उन्होंने लिखा ‘मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना, हिंदी हैं, हम वतन हैं हिंदोस्तां हमारा ’ पर क्या बात है कि इसी हिन्दुस्तान में साल 2000 से लेकर आज तक जितने भी हमले दिल्ली पर हुए उसमें मुस्लिम युवाओं का नाम ही क्यों आ रहा है? मरने वालों को अगर जन्नत भी नसीब हुयी होगी तो वे वहां भी वो खून के आंसू ही बहा रहे होंगे। क्या उनका दिल देश के लाखों मुसलमानों को कोस नहीं रहा होगा? ये सारे सवाल केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह के बयान से जुड़े हुए हैं। उन्होंने सीधा आरोप मढ़ा कि देश में जब भी आतंकी हमला होता है, उसमें मुसलमान ही आतंकी होते हैं। उन्होंने दो टूक लहजे में कहा- जो लोग कहते हैं कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता, मैं पूछना चाहता हूं कि पकड़े गए सभी आतंकवादी मुस्लिम धर्म से क्यों हैं? इसे हमेशा धर्म से जोड़ा जाता है, जैसे पहलगाम (आतंकी हमला) में हुआ।

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हालांकि उनके सवाल का जवाब जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने दिया। उन्होंने भी सवाल किया- गांधी को किसने मारा? इंदिरा-राजीव को किसने मारा? लेकिन उन्होंने कतई यह नहीं कहा कि जो आतंकी पकड़े जा रहे हैं वो मुसलमान नहीं हैं, यानी कहीं न कहीं कुछ ठीक नहीं है। राजनेता अपने वोट के लिए, अपने राज के लिए कुछ भी करें, लेकिन ये सौ फीसदी कहा जा सकता है कि जो यवक फिदायीन बन रहे हैं वो तो नेता कतई नहीं है। हकीकत तो यह है कि उन्हें कोई नेता अपना उल्लू साधने के लिए भड़का रहा होगा, कोई तो होगा जो उनका ब्रेनवॉश कर रहा है। कोई तो है जो उन्हें जीने से ज्यादा मरने के फायदे गिना रहा होगा। मैंने भी कहीं पढ़ा था- मरने के बाद जन्नत मिलती है और वहां 72 हूरें भी मिलती हैं। क्या किसी मुल्ला, मौलाना या मौलवी ने जन्नत देखी है, जवाब होगा नहीं। आप पढ़ लिखकर डॉक्टर बनें और देश सेवा में खुद को झोंक देते तो यहां भी आपको जन्नत आंखों से दिखती। आपके धर्म में बहु-विवाह किया जा सकता है। एक हूर (पत्नी) से मन नहीं भरता तो दो-चार और कर लेते। क्या फर्क पड़ता? आपने खुद को आत्मघाती हमले में दफन कर लिया, उस ख्वाब के लिए जो सही में होगा या नहीं। फिदायीन बनना आपको धर्म सिखाता है जा मजहब। कुरान के किसी सूरे में लिखा है क्या? अकेले मर जाओ, सौ-डेढ़ सौ बेगुनाहों की जान लेकर मरो।

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तुर्की लेखक हारुन याह्या कहते हैं कि इस्लाम धर्म किसी भी तरह से आतंक का समर्थन नहीं करता। इसके विपरीत इस्लाम में आतंक (निर्दोष लोगों की हत्या) एक महापाप है। अब ये सही है तो बार-बार, लगातार फिदायीन हमले में मुस्लिम लड़के ही क्यों निर्दोषों की हत्या कर रहे हैं। इससे बड़ा सवाल यह है क्या भारत के मुसलमान हिंदुस्तान में सुखी नहीं है? यदि हैं तो आखिर कौन हैं जो उनका ब्रेनवॉश कर रहा है? क्या जिहादी ग्रुप ISIS और अलकायदा जैसे लोगों का नेटवर्क देश में फैल रहा है? आखिर कौन है उनका रहनुमा… क्यों देश में दहशत फैलाने का मंसूबा पालने वालों का सिर कलम उसी धर्म के लोग नहीं करते?
अब थोड़ी सी घटना की जिक्र, दिल्ली के भीड़भाड़ वाले इलाके लालकिला मेट्रो स्टेशन के पास एक आई-10 कार तीन घंटे बाद पार्किंग से निकलकर आई। थोड़ी देर बार उसमें जोर का धमाका हुआ। धमाका इतना तेज था कि आसपास के कई दुकानों की दीवारें फट गईं। कई लोगों के चीथड़े उड़ गए। कई कारों के परखच्चे हवा में दिखाई पड़े। कांच के कुछ टुकड़े मंदिर की दीवारों से भी टकराए। चारों ओर हाहाकार मच गया। लोग घबराकर इधर-उधर भागने लगे, सबके चेहरों पर दहशत का आलम था। लेकिन कोई बता सकता है क्या? वहां कोई मुसलमान नहीं था। लालकिला के आसपास मुसलमानों की दुकानें हैं। फुटपाथ पर वो ज्यादातर अपनी दुकानें चलाते हैं। क्या उनके घर का कोई आहत नहीं हुआ होगा? चेहरे पर गम इस कदर नुमायां था कि देखकर आंखे खुद-ब-खुद भर आ रही थीं।

दिल्ली पुलिस कमिश्नर सतीश गोलचा कहते हैं इस धमाके से आस-पास की गाड़ियों को भी क्षति पहुंची है। सूचना मिलते ही दिल्ली पुलिस, FSL, NIA और NSG की टीमें घटनास्थल पर पहुंचीं। धमाके की जांच की जा रही है और जल्दी ही इसका आकलन करके इसके बारे में बताया जाएगा। सवाल यहां भी- विस्फोट कैसे हुआ? गाड़ी में बम था, या फिदायीन, कहीं पेट्रोल की टंकी तो नहीं फटी और मामला इतना बड़ा हो गया। दूसरा सवाल, क्या यह आतंकी हमला था या अचानक हुआ हादसा। तीसरा सवाल कार का मालिक कौन था और कौन गाड़ी चला रहा था? इसके अलावा आखिरी सवाल- आखिर कौन था इस हमले के निशाने पर…। क्या फरीदाबाद में दिन में पकड़े गए 360 किलो अमोनियम ऩाइट्रेट वालों का इन हमलावरों से कोई सम्बन्ध था? एक पुलिस अधिकारी कहते हैं कि जब साढ़े तीन कुंतल माल पकड़ा गया और 50 कुंतल RDX भी धरा गया, इससे उसका आका पगला गया होगा और जल्दबाजी में इतनी बड़ी घटना हो गई होगी। वहीं फ़ोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी के अधिकारी मोहम्मद वाहिद कहते हैं कि घटनास्थल से इकट्ठा करके सैम्पल लैब भेजे जा रहे हैं। सैम्पल परीक्षण के बाद ही हम किसी नतीजे पर पहुंच पाएंगे।

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फिर लौटते हैं अपने मुद्दों पर… आखिर क्या कारण है कि हिंदू मंदिरों को सेना और बंदूकों के साये में रखना पड़ता है। उसके बाद भी ये नापाक हरकतें कर देते हैं। अभी तक कोई मस्जिद ऐसी नहीं दिखी, जहां बंदूकधारी रखवाली के लिए तैनात हों। देश में बड़ी-बड़ी घटनाएं होती हैं। सरकारें खेद प्रकट करके अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाती हैं। सेक्यूलर पार्टियां चुप्पी ऐसे साधते हैं, जैसे उनका दामाद इस प्रकरण का मुख्य आरोपी हो। क्या दुनिया से हिंदुओं का नामोनिशान मिटाने के लिए ये घटनाएं रची जा रही हैं। सच भी तो है। रूस के कुछ हिस्सों को मुसलमानों ने अलग बांट लिया। दुनिया का कोई मुसलमान नहीं चाहता है कि इजरायल का अस्तित्व बचे। अफगानिस्तान में हिंदू नहीं बचा है। पाकिस्तान में हिंदू नदारद हो गया। बांग्लादेश में मुसलमानों ने हिंदू लड़कियों और महिलाओं के साथ हैवानियत का नंगा नाच किया। अब वहां भी हिंदू न के बराबर बचे हैं। दहशतगर्दी के दम पर कश्मीर घाटी को हिंदू मुक्त करा लिया। दिल्ली की घटना हिंदुओं के प्रति नफरत की घटना है या फिर दहशत फैलाने की एक आम कोशिश। इसका जवाब केंद्रीय एजेंसियां देंगी या समाज, एक बार सोचने की जरूरत है। केवल हिंदू संकट में नहीं है पूरा हिंदुस्तान संकट में है। हालात चिंता भरे है, लेकिन कोई जवाब नहीं मांगेगा। आखिरकार हम घुटनों पर जो हैं…।

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