IT क्षेत्र में आत्मनिर्भरता दूर नहीं…H-1B वीजा नीति डिजिटल संप्रभुता पर पुनर्विचार की चेतावनी

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लखनऊ। प्रत्येक H-1B  वीजा पर एक लाख डॉलर शुल्क लगाने के अमेरिका के हालिया निर्णय ने भारत के आईटी उद्योग को तगड़ा झटका दिया है। दशकों से हमारा सेवा क्षेत्र अमेरिकी मांग पर चल रहा है। भारत के 283 अरब डॉलर के आईटी राजस्व का करीब 57 फीसदी हिस्सा आज अमेरिका से जुड़ा हुआ है। इस एक नीति के बदलाव से दिख गया है कि हमारी निर्भरता कमजोरी के स्तर तक बढ़ चुकी है। दूसरी तरफ, भारत सरकार और उसके सार्वजनिक उपक्रम हर वर्ष ओरेकल डाटाबेस, माइक्रोसॉफ्ट विंडोज, एसएपी ईआरपी, रेड हैट सर्वर जैसे विदेशी सॉफ्टवेयर लाइसेंसों पर बीस से पच्चीस हजार करोड़ रुपये खर्च करते हैं। ये कोई एक बार का खर्च नहीं है, ये अनुबंध आधारित नियमित अंतराल पर होने वाले खर्चे हैं, जिनसे राष्ट्रीय संसाधनों पर लगातार दबाव पड़ता रहता है।

अब जरा इन दो स्थितियों को जोड़ कर देखें कि एक ओर अमेरिका अपने प्रवेश द्वार को सख्त बना रहा है, तो दूसरी ओर भारत विदेशी सॉफ्टवेयरों पर अरबों खर्च कर रहा है। निष्कर्ष स्पष्ट है। एच-1बी सिर्फ वीजा की समस्या नहीं है, बल्कि यह डिजिटल संप्रभुता पर पुनर्विचार करने के लिए एक चेतावनी है। हम जानते हैं, भारत जब अपना खुद का रास्ता चुनता है, तो क्या होता है। आधार दुनिया का सबसे बड़ा बायोमेट्रिक पहचान प्लेटफॉर्म बन गया। UPI  वैश्विक स्तर पर सबसे उन्नत डिजिटल भुगतान प्रणालियों में से एक बन चुकी है। इंडिया स्टैक ने ओपन डिजिटल रेल बनाई, जिसका अब दुनिया अध्ययन और अनुकरण करती है। इन सबका का निर्माण बिना किसी आयात के भारतीय इंजीनियरों ने अपनी धरती पर भारतीय संसाधनों से किया। तो फिर, हमारे मंत्रालय, स्कूल और सेनाएं विदेशी सॉफ्टवेयर पर क्यों चल रही हैं?

दिशा बदलने की राजकोषीय गुंजाइश पहले से ही मौजूद है। 2025-26 के आम बजट में केंद्रीय व्यय 50.65 लाख करोड़ रुपये होने का अनुमान है। रक्षा, रेलवे, स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि, शहरी मामलों और संचार जैसे बड़े मंत्रालयों के भीतर एक मामूली पुन: आवंटन भी भारी आईटी मांग पैदा कर सकता है। तीन वर्षों में ये मंत्रालय अकेले 6.5 लाख करोड़ रुपये डिजिटल बुनियादी ढांचे में लगा सकते हैं। भारतीय प्लेटफॉर्म पर पुनर्निर्देशित विदेशी लाइसेंसों के प्रवाह में 67,500 करोड़ रुपये और राज्य एवं सार्वजनिक उपक्रमों के खर्च को जोड़ दें, तो यह राशि आसानी से दो लाख करोड़ रुपये को पार कर जाती है। 1.4 लाख करोड़ रुपये के समर्पित राष्ट्रीय डिजिटल और एआई नवाचार कोष के साथ भारत तीन वर्षों में 10.56 लाख करोड़ रुपये जुटा सकता है। यह संभावित अमेरिकी राजस्व घाटे की भरपाई करने और एक संप्रभु डिजिटल आधार तैयार करने के लिए पर्याप्त है।

आधार और UPI जैसी पहलों ने साबित कर दिया है कि यदि मजबूत इच्छा शक्ति के साथ क्रियान्वयन किया जाए, तो आईटी सेक्टर में आत्मनिर्भरता दूर की कौड़ी नहीं होगी। कल्पना करें, सरकार टीसीएस को सरकारी डेस्कटॉप, स्कूलों और कियोस्क के लिए लिनक्स पर आधारित एक सुरक्षित, उपयोगकर्ता-अनुकूल ऑपरेटिंग सिस्टम बनाने का काम सौंप सकती है। इन्फोसिस एक राष्ट्रीय ईआरपी सिस्टम को एकीकृत करने में मदद कर सकती है, लेकिन इस बार इसे सैप या ओरेकल के बजाय ईआरपीनेक्स्ट जैसे घरेलू प्लेटफॉर्म पर बनाया जाएगा। विप्रो और एचसीएल इन्फोसिस्टम्स सशस्त्र बलों के लिए कस्टम डिफेंस-ग्रेड डिवाइस और सुरक्षित संचार प्रणालियां प्रदान कर सकती हैं, लेकिन ओपन-सोर्स फर्मवेयर के साथ। माइंडट्री कृषि एआई में अग्रणी हो सकता है, लेकिन पहले से ही सटीक कृषि उपकरण बना रहे भारतीय एनालिटिक्स स्टार्टअप के साथ मिलकर और डाटा संप्रभुता के लिए टेक महिंद्रा और एलएंडटी इन्फोटेक भारतीय एआई उत्पाद कंपनियों के साथ साझेदारी करके एक संप्रभु क्लाउड और डाटा प्लेटफॉर्म बनाए जा सकते हैं।

यदि सही ढंग से समन्वय बनाकर काम किया जाए, तो भारत अपनी इन आईटी कंपनियों के योगदान से बड़ा परिवर्तन ला सकता है। पहला, इससे विविधता आएगी और अमेरिका पर निर्भरता घटेगी। दूसरा, यह नवाचार संस्कृति को ताकत देगा, जिससे बड़े आईटी और उत्पाद स्टार्टअप को गंभीर उत्पाद इंजीनियरिंग और अनुसंधान एवं विकास में लगाया जा सकेगा। तीसरा, इससे इकोसिस्टम का विस्तार होगा : स्टार्टअप, एसएमई और विश्वविद्यालय प्रमुख परियोजनाओं में शामिल होंगे। सबसे अहम बात इससे भारत अपने शासन, रक्षा और अर्थव्यवस्था की सॉफ्टवेयर जरूरतों को लेकर आत्मनिर्भर बनेगा। याद रहे, भारत का आईटी सेवा उद्योग भी एक संकट से ही पैदा हुआ था। 1990 के दशक के अंत में वाई2के बग ने दुनिया को कोडर्स की तलाश करने पर मजबूर कर दिया था। वह वैश्विक संकट हमारे लिए एक अवसर बन गया। 2025 का एच-1बी का हालिया झटका भी कुछ वैसा ही हो सकता है।

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