बिहार में शून्य के पहाड़ पर समाजवादी पार्टी

Samajwadi Party NayaLook
   अजय कुमार

उत्तर प्रदेश की राजनीति में अच्छी खासी हनक और धमक रखने वाले समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव की पड़ोसी राज्य बिहार की राजनीति में एक प्रकार की उदासीनता नजर आती है। यह दल, जो उत्तर प्रदेश में अपनी मजबूत जड़ें जमाए हुए है, बिहार में हमेशा से ही शून्य के पहाड़ पर खड़ा नजर आता है। यहां इसकी सफलता का इतिहास लगभग शून्य रहा है। मुलायम सिंह यादव द्वारा स्थापित यह दल बिहार की विधान सभा में कभी भी कोई बड़ा प्रभाव नहीं डाल पाया। फिर भी, हाल के वर्षों में अखिलेश यादव के नेतृत्व में दल ने नई दिशा अपनाई है। अब, महागठबंधन के साथ जुड़कर अखिलेश बिहार में नई उम्मीदें जगा रहे हैं।बिहार की विधान सभा निर्वाचनों में समाजवादी दल का प्रदर्शन देखें तो यह स्पष्ट होता है कि यहां इसकी स्थिति हमेशा कमजोर रही। सन 1995 के विधान सभा निर्वाचन में दल ने दो स्थानों पर विजय प्राप्त की थी। उस समय बिहार की राजनीति में विभिन्न दलों का उभार हो रहा था, और समाजवादी दल ने यादव समुदाय के कुछ मतों पर कब्जा किया। लेकिन मत प्रतिशत की बात करें तो यह बहुत कम था, लगभग एक से दो प्रतिशत के बीच। उस निर्वाचन में कुल मतों का एक छोटा हिस्सा ही दल को मिला, जो इसकी सीमित पहुंच को दर्शाता है। फिर सन 2000 आया, जहां दल को कोई स्थान नहीं मिला। शून्य सीटों के साथ यह निर्वाचन दल के लिए निराशाजनक रहा। मत प्रतिशत में भी कोई उल्लेखनीय वृद्धि नहीं हुई, और दल बिहार की मुख्य धारा से दूर होता गया।

सन 2005 में दो बार निर्वाचन हुए। फरवरी में हुए निर्वाचन में समाजवादी दल ने चार स्थानों पर सफलता प्राप्त की। यह दल के लिए एक छोटी जीत थी, क्योंकि उस समय बिहार में राजनीतिक अस्थिरता थी, और विभिन्न गठजोड़ बन रहे थे। मत प्रतिशत लगभग दो प्रतिशत के आसपास रहा, जो पिछले निर्वाचनों से थोड़ा बेहतर था। लेकिन अक्टूबर में दोबारा हुए निर्वाचन में दल की सीटें घटकर दो रह गईं। फिर भी, यह दिखाता है कि दल ने यादव बहुल क्षेत्रों में कुछ प्रभाव बनाया था। लेकिन उसके बाद का इतिहास और भी निराशाजनक है। सन 2010 के विधान सभा निर्वाचन में दल को कोई स्थान नहीं मिला। मत प्रतिशत गिरकर एक प्रतिशत से भी कम हो गया। दल ने कई स्थानों पर उम्मीदवार उतारे, लेकिन मतदाताओं का समर्थन नहीं मिला। बिहार में राष्ट्रीय जनता दल और जनता दल (संयुक्त) जैसे दलों ने यादव मतों पर मजबूत पकड़ बना ली, जिससे समाजवादी दल हाशिए पर चला गया।सन 2015 के निर्वाचन में दल ने पचासी स्थानों पर उम्मीदवार उतारे, लेकिन फिर शून्य पर आकर रुक गया। मत प्रतिशत लगभग एक प्रतिशत रहा। दल ने महागठबंधन से अलग होकर लड़ने का फैसला किया, जो गलत साबित हुआ। सन 2020 में तो दल ने निर्वाचन नहीं लड़ा, बल्कि राष्ट्रीय जनता दल को समर्थन दिया। परिणामस्वरूप, कोई सीट नहीं जीती गई, और मत प्रतिशत की गणना भी नहीं हुई। कुल मिलाकर, 1995 से 2020 तक दल ने कुल आठ से दस सीटें ही जीतीं, और मत प्रतिशत कभी तीन प्रतिशत से ऊपर नहीं गया। यह शून्य का पहाड़ ही है, जहां दल बार-बार चढ़ने की कोशिश करता है, लेकिन गिर जाता है। बिहार में दल की कमजोरी का मुख्य कारण यहां की जातीय राजनीति है। यादव मतदाता मुख्य रूप से राष्ट्रीय जनता दल के साथ जुड़े हैं, और समाजवादी दल को उत्तर प्रदेश की तरह यहां आधार नहीं मिला।

लेकिन अब परिदृश्य बदल रहा है। अखिलेश यादव, जो उत्तर प्रदेश में दल के प्रमुख नेता हैं, ने बिहार में नई रणनीति अपनाई है। हाल ही में वे महागठबंधन के साथ खड़े हुए हैं। महागठबंधन, जिसमें राष्ट्रीय जनता दल, कांग्रेस और वामपंथी दल शामिल हैं, बिहार में भारतीय जनता दल के विरुद्ध मजबूत मोर्चा बना रहा है। अखिलेश ने वोटर अधिकार यात्रा में भाग लिया, जो महागठबंधन द्वारा आयोजित की गई थी। इस यात्रा का उद्देश्य मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा करना और भारतीय जनता दल की कथित मत चोरी के विरुद्ध जागरूकता फैलाना है। अखिलेश ने सार्वजनिक रूप से कहा कि भारतीय जनता दल बिहार से भागने वाला है, और महागठबंधन की जीत निश्चित है। उन्होंने राष्ट्रीय जनता दल को पूर्ण समर्थन देने का वादा किया। यह गठजोड़ बिहार के आगामी विधान सभा निर्वाचन के लिए महत्वपूर्ण है, जो 2025 में होने वाले हैं।अब सवाल यह है कि अखिलेश के इस कदम से किसे लाभ होगा? सबसे पहले, महागठबंधन को। बिहार में यादव मतदाता एक बड़ा हिस्सा हैं, लगभग पंद्रह प्रतिशत। राष्ट्रीय जनता दल इन मतों का मुख्य दावेदार है, लेकिन हाल के निर्वाचनों में कुछ मत बिखर गए हैं। अखिलेश, जो खुद यादव हैं और उत्तर प्रदेश में दल की हालिया लोक सभा जीत से उत्साहित हैं, इन मतों को एकजुट कर सकते हैं। उत्तर प्रदेश में दल ने अड़तीस स्थानों पर जीत हासिल की, जो उसका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन था। यह मोमेंटम बिहार में भी काम कर सकता है। महागठबंधन को इससे यादव मतों की मजबूती मिलेगी, और गैर-यादव पिछड़े वर्गों को भी आकर्षित किया जा सकता है। कांग्रेस और वामपंथी दलों को भी लाभ होगा, क्योंकि गठजोड़ मजबूत होगा। तेजस्वी यादव, जो राष्ट्रीय जनता दल के नेता हैं, ने अखिलेश के इस समर्थन को स्वागत किया है। वे कहते हैं कि यह यात्रा भारतीय जनता दल को असहज कर रही है।

दूसरी ओर, समाजवादी दल को भी अप्रत्यक्ष लाभ होगा। हालांकि बिहार में दल का आधार कमजोर है, लेकिन महागठबंधन के साथ जुड़कर यह अपनी छवि मजबूत कर सकता है। अगर महागठबंधन जीतता है, तो दल को कुछ स्थानों पर अवसर मिल सकते हैं। लेकिन मुख्य लाभ राष्ट्रीय जनता दल को होगा, क्योंकि अखिलेश का समर्थन यादव मतों को पूरी तरह उनके पक्ष में कर देगा। भारतीय जनता दल को नुकसान होगा, क्योंकि विपक्ष अब अधिक एकजुट है। बिहार में निर्वाचन हमेशा करीबी होते हैं, जैसे 2020 में महागठबंधन और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के बीच मत प्रतिशत में केवल एक प्रतिशत का अंतर था। अखिलेश का यह कदम उस अंतर को पाट सकता है।कुल मिलाकर, यह गठजोड़ बिहार की राजनीति में नया मोड़ ला सकता है। शून्य के पहाड़ पर चढ़ते हुए समाजवादी दल अब महागठबंधन की सीढ़ी का सहारा ले रहा है। अगर यह सफल होता है, तो बिहार में विपक्ष की ताकत बढ़ेगी, और भारतीय जनता दल को चुनौती मिलेगी। लेकिन सफलता के लिए एकता जरूरी है। तेजस्वी और अखिलेश का यह हाथ मिलाना मतदाताओं को नई उम्मीद दे रहा है। बिहार के लोग अब देखेंगे कि यह शून्य का पहाड़ कब हरा-भरा होता है।

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