भारत-चीन आये साथ, तो एशिया की राजनीति में होगा बड़ा उलट फेर

China India relations

संजय सक्सेना

लखनऊ। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रमुख व्यापार सलाहकार पीटर नवारो ने हाल ही में भारत-चीन संबंधों पर तीखी टिप्पणी की है। उन्होंने कहा कि चीन ने अक्साई चिन पर हमला किया था और वह भारत का दोस्त नहीं है। नवारो की यह प्रतिक्रिया भारत और चीन के बीच बढ़ती नजदीकी से जुड़ी है, जो अमेरिकी हितों को चुनौती दे रही है। ट्रंप प्रशासन की ओर से भारत पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगाने के बाद दोनों एशियाई दिग्गजों के रिश्ते सुधर रहे हैं, जिससे व्हाइट हाउस में खलबली मची हुई है। यह घटना वैश्विक भू-राजनीति में एक नया मोड़ ला सकती है, जहां अमेरिका चीन को घेरने की कोशिश कर रहा है, लेकिन भारत अपनी स्वतंत्र विदेश नीति पर अड़ा हुआ है। पीटर नवारो, जो ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में व्यापार नीति के प्रमुख सलाहकार हैं, ने एक साक्षात्कार में भारत को चेतावनी दी। उन्होंने कहा, आप दशकों से चीन के साथ एक शांत युद्ध में हैं। चीन ने अक्साई चिन पर आक्रमण किया और आपके पूरे क्षेत्र पर कब्जा कर लिया। ये आपके दोस्त नहीं हैं। यह बयान सीधे तौर पर भारत-चीन के ऐतिहासिक विवादों को उजागर करता है और अमेरिकी चिंता को दर्शाता है कि भारत की चीन से नजदीकी क्वाड गठबंधन को कमजोर कर सकती है, जिसमें अमेरिका, भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं।

अक्साई चिन का मुद्दा भारत-चीन संबंधों का एक पुराना घाव है। 1962 के भारत-चीन युद्ध में चीन ने अक्साई चिन पर कब्जा कर लिया, जो लद्दाख क्षेत्र का हिस्सा है। यह क्षेत्र लगभग 38,000 वर्ग किलोमीटर में फैला है और चीन इसे शिनजियांग प्रांत का हिस्सा मानता है। युद्ध में भारत को भारी नुकसान हुआ, जिसमें हजारों सैनिक मारे गए। उसके बाद से दोनों देशों के बीच सीमा विवाद जारी है। 2020 में गलवान घाटी में हुई झड़प ने संबंधों को और बिगाड़ दिया, जिसमें 20 भारतीय सैनिक शहीद हुए। लेकिन हाल के महीनों में स्थिति बदल रही है। 2025 में ट्रंप के टैरिफ हमले के बाद चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक गुप्त पत्र भेजा, जिसने संबंधों को पुनर्जीवित किया। ट्रंप ने भारत पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगाया क्योंकि भारत रूस से सस्ता तेल खरीद रहा है। नवारो ने इसे ष्मोदी का युद्ध कहा, मतलब यूक्रेन-रूस संघर्ष को भारत की वजह से लंबा खींचना। उन्होंने कहा, भारत इतना अहंकारी है (रूसी तेल खरीदने पर)। वे कहते हैं कि हम जहां से चाहें तेल खरीद सकते हैं। भारत, आप दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र हैं। वैसा ही व्यवहार करें! नवारो ने सुझाव दिया कि अगर भारत रूस से तेल खरीदना बंद कर दे, तो अमेरिका 25 प्रतिशत टैरिफ माफ कर सकता है। लेकिन भारत ने अपनी ऊर्जा नीति को स्वतंत्र रखा है, जो अमेरिकी दबाव को चुनौती देता है।

भारत-चीन की नजदीकी के पीछे कई कारण हैं। ट्रंप के टैरिफ ने भारतीय अर्थव्यवस्था को झटका दिया, जिससे निर्यात प्रभावित हुआ। इसके जवाब में भारत ने चीन के साथ व्यापार बढ़ाने की कोशिश की। हाल ही में दोनों देशों ने सीमा पर गश्त समझौते किए, प्रत्यक्ष उड़ानें बहाल कीं और पर्यटन को बढ़ावा दिया। मोदी की दुर्लभ चीन यात्रा की चर्चा है, जो शंघाई सहयोग संगठन शिखर सम्मेलन में हो सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह नई दोस्ती एशिया में व्यापार को बदल सकती है और अमेरिका के नेतृत्व वाले गठबंधनों को कमजोर कर सकती है। अल जजीरा की रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप के टैरिफ और भू-राजनीतिक बदलाव ने भारत-चीन को करीब लाया है, जो क्वाड को नुकसान पहुंचा सकता है।

गौरतलब हो, ट्रंप प्रशासन चीन को वैश्विक खतरा मानता है और भारत को उसके खिलाफ मोर्चे पर रखना चाहता है। लेकिन भारत की रणनीतिक स्वायत्तता नीति अमेरिका को पसंद नहीं आ रही। भारत रूस से एस-400 मिसाइल सिस्टम खरीद चुका है और चीन के साथ आर्थिक संबंध मजबूत कर रहा है। 2024 में भारत-चीन व्यापार 100 अरब डॉलर से ऊपर पहुंच गया था। नवारो जैसे सलाहकारों का मानना है कि यह अमेरिकी हितों को चोट पहुंचाता है, क्योंकि भारत रूस से तेल खरीदकर यूक्रेन युद्ध को ईंधन दे रहा है। भारत की ओर से अभी आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई, लेकिन विदेश मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि भारत अपनी विदेश नीति में किसी का हस्तक्षेप नहीं बर्दाश्त करेगा। विपक्षी नेता राहुल गांधी ने ट्वीट किया कि अमेरिका को अपनी चिंता खुद देखनी चाहिए। भारत स्वतंत्र है। अंतरराष्ट्रीय विश्लेषक मानते हैं कि यह विवाद इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में तनाव बढ़ा सकता है। यदि भारत-चीन संबंध मजबूत होते हैं, तो अमेरिका को नई रणनीति अपनानी पड़ेगी। बहरहाल, नवारो का बयान सिर्फ एक टिप्पणी नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन का संकेत है। जहां एक तरफ अक्साई चिन जैसे पुराने घाव हैं, वहीं आर्थिक जरूरतें नई दोस्ती को जन्म दे रही हैं। क्या भारत अमेरिकी दबाव में झुकेगा या अपनी राह चुनेगा? यह समय बताएगा। लेकिन इतना साफ है कि ट्रंप के सलाहकार की भड़काहट से एशिया की राजनीति में नया अध्याय शुरू हो गया है।

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