- श्रावण मास में जन्मा अनूठा भक्त कवि
- राम को समर्पित जीवन का एक महापुरुष
- लोक भाषा मे वेद शास्त्र उपनिषदो का उद्गाता
बलराम कुमार मणि त्रिपाठी
श्रावण और भाद्रमास को गोस्वामी तुलसी दास ने राम नाम के दो अक्षर बताया।”वर्षा ऋतु रघुपति भगति तुलसी सालि सुदास। राम नाम वर बरनि जुग सावन भादौ मास।।” भक्त को धान,वर्षा ऋतु को रघुवीर की भक्ति कहा । संयोग है श्रावण मास मे तुलसी दास का भी जन्म हुआ। संभवत: इसी लिए राम नाम को उन्होंने माता- पिता कहा।
भरोसो जाहि दूसरो सो करो।
मेरो तो राम नाम कलप तरु कलि कल्यान भरो।
संकर साखि जो राखि कहो उर तो जरि जीह जयो।
मेरो तो मामय बाप दोउ आखर हौं सिसु अरनि अरौ।।
तुलसी को जन्मलेने के कुछ ही समय बाद माता पिता का निधन भोगना पड़ा और भगवान भरोसे पलना पड़ा। इसलिए भी प्रकृति से मिलने वाली वर्षा से धान की फसल का पोषित होना उन्हें अपना जीवन लगा। जिसने मांबाप को बचपन मे खो दिया,उनकी सूरत भी याद नहीं रही.. उनके द्वारा पालन पोषण भी नहीं मिला,उसे राम को ही माता पिता मान लेना सहज भी था। तुलसी ने लिखा-
“मातु पिता जग ज्याइ तज्यो विधिहूं न लिख्यो कछु भाग्य भलाई”
बाल्यकाल में लावारिस शिशु को पालन करने कै लिए आई मुनिया कहाईन भी ज्यादे दिन तक जीवित नहीं बची। अभागा शिशु मानकर लोग दरवाजे पर से भगाते भीरहे होंगे। तभी तो तुलसी के मुख से निकला ” मानत रह्यो चारि फल चारि ही चनक को।” अर्थात एक मुट्ठी चना मिल जाना मेरे लिए चारि पदारथ “अर्थ, धर्म ,काम ,मोक्ष रहे”।
“मांगि के खाइहों मसीत को सोईहों,लेबे को एक न देबे को दोऊ”। बचपन कैसे गुजरी अनाथ तुलसी ही यह जानते थे। उस तुलसी के बड़े होने पर यदि कही प्रेम की किरण दिखी वह रत्नावली में थी, पर वह तो इनकी भी गुरु निकली। पढ़ लिख कर युवा हुए पिता की बची खुची विरासत संभाली,विवाह होने के बाद यदि पत्नी के प्रति आसक्ति हुई तो यह होना सहज और स्वाभाविक ही था। ससुराल मे रह कर पत्नी मायके गई तो तुलसी उसके प्रति आसक्ति के कारण वियोग सह न सके। वर्षा काल मे बढ़ी नदी, भयंकर आधी रात ,गरजते बरसते काले बादलों वाली अंधेरी रात मे आसमान की परवाह न कर तुलसी पत्नी के मायके पहुंचे। यह सभी जानते है.. नाव न मिली तो बहते शव को सहारा मान बैठे.. मुंडेरे पर लटकते सांप को रस्सी समझ ली। भले यह किंबदंती हो किंतु “कामातुराणा न भयं न लज्जा” यह बात तो चरितार्थ ही हुई।
रत्नावली सुसंस्कृत परिवार की पढ़ी लिखी समझदार कन्या थी। उसने इनकी आसक्ति को भांप लिया और इनकी भाव भंगिमा और आने के तरीके से आहत भी हुई। उसनें इन्हे होश दिलाया.. सांप को रस्सी समझना और बहते शव को नाव समझना.. ‘इतनी आसक्ति राम पर होजाती तो ईश्वर को पा लेते।” उसके ठोकर ने इन्हें होश मे ला दिया।
गोस्वामी तुलसी दास का गुरु नरहरि दास से मिलना,वेद शास्त्र,उपनिषद,निरुक्त व्याकरण के अलावा राग रागिनियो का भी ज्ञान होना उनके कुशाग्र बुद्धि और लगन का परिचायक था। कवित्व की प्रतिभा ईश्वर प्रदत्त थी, संयोग ही था कि प्रेत का मिलना उसके बताये के अनुसार हनुमान जी से मिलन होना। हनुमान जी की कृपा से राम लक्ष्मण का मंदाकिनी गंगा के तट पर दर्शन होना, तुलसी दास जी का उन्हें तिलक लगाना..हनुमान जी का तोते के रूप मे उनकी पहचान करा देना ईश्वर की कृपा ही थी। जो प्रारब्ध के फलीभूत होने जैसा लगा।
गोस्वामी जी के कालखंड मे राजनैतिक और सामाजिक परिस्थितियां भी काफी प्रतिकूल रही़। मुगल शासन काल मे धर्मातरण के प्रयास,मूर्ति पूजा का विरोध,सनातनियों में शैव,शाक्त,वैष्णवों का अपने इष्ट और साधना पद्धति को बड़ा दिखाने की होड़। एक दूसरे को नीचा दिखाने के लिए आपसी संघर्ष और कटुता का बढ़ना। निर्गुण धारा के कबीर ,नानक,दादू रैदास आदि के अलग अलग पंथ इसके अलावा सूफी फकीरो के चार वर्ग अपनै अपने धुन मे मस्त। वैदिक विद्वान अलग अपनी श्रेष्ठता और विद्वत्ता मे शास्त्रार्थ करते वाक्युद्ध मे एक दूसरे को पराजित करने मे ही अपना गौरव मान रहे थे। ऐसे मे सबके बीच समन्वय वादी तरीका अपनाते हुए लोक भाषा अवधी मे रामकथा विषयक ग्रंथो का लेखन बड़ा ही क्रांतिकारी कदम था।
तुलसी ने रामचरित मानस के माध्यम मे चार वेद,अट्ठारह पुराण,छ: शास्त्र और स्मृति ग्रंथो का सार प्रस्तुत कर दिया। जिसको मान्यता दिलाने मे उन्हे बहुत पापड़ बेलने पड़े। किंतु आज छ: सालो बाद भी यह ग्रंथ बहुतो को अध्यात्म मार्ग के उच्च स्तर तक पहु़चा चुका है। अनेको को रोटी रोजी देकर लोक मे भौतिक उपलब्धि के साथ सम्मान भाजन बना रहा है। इसके अलावा दोहावली, कवितावली, गीतावली,बरवै रामायण, जानकी मंगल, पार्वती मंगल,रामलला नहछू,रामाज्ञा प्रश्नावली ,विनय पत्रिका ,कृष्ण गीतावली ,हनुमान चालीसा,हनुमान बाहुक आदि ग्रंथो के माध्यम से क्या कुछ नही़ दिया? हम गोस्वामी तुलसी दास का किया उपकार जब चंद्र दिवाकर आसमान मे है,तब तक नही़ भुला सकते।
