सृष्टि का स्थाई भाव नहीं है भौतिक विकास की काँचन काया

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सृष्टि का स्थाई भाव नहीं है भौतिक विकास की काँचन काया

जगत के भौतिक विकास का काँचन स्वरूप कभी भी स्थाई नहीं रहा हैं। आगे भी नहीं रहेगा। कामिनी और कंचन के प्रभाव में जगत की काया तभी तक चमक पाती है जब तक यहां राम तत्व का प्राकट्य गौण रहता है। राम का प्रभाव सामने आते ही कांचनी लंका की श्री हनुमान जी दाह करने के लिए शक्ति झोंक देते हैं। यह कोई कथा मात्र नहीं है। सृष्टि का यही महाविज्ञान है। इसे शुद्ध सनातन के तत्व से जो समझ पाता है, केवल वहीं इस जगत में सुखी रहता है। आसुरी सभ्यताएं केवल कंचन और कामिनी की प्राप्ति के अंतिम लक्ष्य के लिए लड़ती हैं।

पृथ्वी पर एक तितली यदि अपने पंख घुमाती है तो पृथ्वी का समस्त वायुमंडल उससे प्रभावित हो जाता है। हवाओं की गति प्रभावित हो जाती है। हर वेग और प्रत्येक गति इसके प्रभाव में आ जाती है, ऐसा आधुनिक विज्ञान स्वयं कहता है। जो भूगोल शास्त्र के अध्येता हैं वे इस तथ्य से परिचित हैं।अब स्वयं सोचिए, विगत कुछ वर्षों से इसी पृथ्वी पर भूमि से लेकर आकाश तक में लाखों टन बारूद प्रति दिन जलाया जा रहा है। प्रतिपल नैसर्गिक गति और लय को तोड़ा जा रहा है। प्रति पल स्वर्ण आखेट करती शक्तियां वायु में आग प्रसारित कर रही हैं। प्रति पल रक्त की धारा बह रही है। प्रति पल विनाश के सर्व सुलभ प्रयास हो रहे हैं। सब कुछ जला कर सुख और चैन की तलाश की जा रही है। नैसर्गिक धर्म पर प्रति पल घनघोर प्रहार किए जा रहे हैं। असुर, अधम और अभिमानी निरंतर प्रभावी हो रहे हैं। यह वही अवस्था तो है जिसके लिए हमारे पूर्वक कहते रहे हैं:

जब जब होय धरम की हानी
बाढ़े असुर, अधम अभिमानी
तब-तब प्रभु धरि विविध सरीरा,
हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा।।

सनातन ज्ञान संपदा के महान चिंतक गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित रामचरितमानस की ये पंक्तियां हैं। प्रति दिन करोड़ों लोग इसका पारायण भी करते हैं। इसका अर्थ है कि जब-जब धरती पर धर्म की हानि होती है, तब-तब दुष्टों और अभिमानी असुरों का अत्याचार बढ़ता है, तब-तब भगवान दयालु होकर विभिन्न रूप धारण करके सज्जनों के कष्टों का निवारण करते हैं। इसका संदर्भ इसलिए उचित लग रहा है क्योंकि वर्तमान विश्व की स्थिति इस समय ऐसी ही है। बिल्कुल ऐसी ही। सृष्टि के धर्म पर आसुरी शक्तियों और वृत्तियों ने गंभीर संकट खड़ा कर दिया है। वास्तव में इस समय सज्जन प्रवृत्ति बहुत पीड़ा में है। भौतिक विकास की काँचन काया की महिमा है। देव गुण गौण है। असुर वृत्ति प्रभावी है। उन्माद और विनाश की हर चाल चली जा रही है। प्रकृति और इस सृष्टि को हर ओर से संकट में डाल कर इसकी नैसर्गिक गति को बाधित किया जा रहा है।

अब सच में उसी कृपानिधि की प्रतीक्षा में हर सज्जन मन लगा हुआ है। इस पीड़ा से मुक्ति के एक मात्र उम्मीद। याद कीजिए , अभी जब दुनिया कोरोना की महामारी से जब जूझ रही थी। मनुष्य नाम के प्राणियों की हर गतिविधि पर जब अंकुश लग गया था। उस थोड़े से समय के लिए यह सृष्टि कितनी सुंदर दिखने लगी थी। पूरी प्रकृति कितनी खिली हुई दिख रही थी। पूरा वातावरण कितना शुद्ध हो गया था। कोई शोर नहीं। कोई कोलाहल नहीं। कोई प्रदूषण नहीं। कोई आग नहीं। कोई बारूद नहीं। कोई छेड़छाड़ नहीं। यहां तक कि वातावरण का तापमान तक नीचे आ गया था।

कोरोना के उस काल में एक संदेश प्रकृति ने दी थी, वह संदेश था कि इस कलियुग के कल्प वृक्ष केवल और केवल रामदूत हनुमान ही हैं। पवन तनय को भूलिए मत। यह जगत पवन के ही अधीन है। महामारी में सबसे ज्यादा जरूरी तत्व पवन ( ऑक्सीजन ) ही साबित हुआ। यह संदेश भी शायद लोगों को समझ में नहीं आया। बिना पवन आपकी कोई भौतिक कांचनी उपलब्धि किसी काम नहीं आएगी।

आज युद्धरत विश्व को भारत यही संदेश देने के प्रयास में है। लेकिन भौतिक कांचनी उपलब्धियों के उन्माद से असुर बन चुकी शक्ति वैचारिकताओं को यह समझ में नहीं आ रहा। उन्हें अभी यह समझ में आएगा भी नहीं। उन्हें यह भी समझ में नहीं आएगा कि जब भी यह स्थिति उत्पन्न होती है तो भारत भूमि से रामत्व का प्रादुर्भाव होता है। जब भी राम तत्व प्रभावी होता है तो सोने की लंका को भस्म होना ही होता है। श्री हनुमान जी का यह प्रथम परिचय होता है। अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता , मंगल मूर्ति मारुति नंदन बाध्य होते हैं कि आसुरी विकास की कांचनी लंका को दहन करें और लोक को राम से जोड़ें। यही उनका मंगलमय स्वरूप भी है। पृथ्वी आज उनके उसी मंगल प्रभाव की प्रतीक्षा में है। मंगल अब बहुत प्रभावी हैं। कांचनी लंका का दहन सुनिश्चित है। आसुरी शक्तियों का विनाश भी सुनिश्चित है। सज्जन वृत्ति पर कोई आंच नहीं आने वाली। मनुष्य सभ्यता के जनक भगवान मनु की राजधानी में श्री रामजन्भूमि पर बालक राम भी विराज चुके हैं और अब श्री राम का दरबार भी सज चुका है। रामदूत और सीतासुत श्री हनुमान जी को अपना कार्य करने दीजिए। ये वही तो हैं, शंकर स्वयं केसरी नंदन।।
।।जय सियाराम।।

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