भाषा की पाठशाला : सांविधानिक या संवैधानिक? प्रावधान या प्रविधान??

पहले, एक वाक्य में वस्तुस्थिति को समझें :–

“हम यह तो कह सकते हैं कि संविधान में किसी चीज का प्रावधान है; पर हम यह नहीं कह सकते हैं कि यह ‘संवैधानिक प्रावधान’ है।” अब आइए! समझते हैं।

संस्कृत में ‘धा’ मूल से अनेक शब्दों की निर्मिति है। ‘धा’ में धारण करने, रखने, जड़ने, जमाने, पकड़ने, भरती करने (भर्ती अशुद्ध है।) का भाव है। ‘धा’ मूल से व्युत्पन्न विधान शब्द का अर्थ ‘नियम’ या ‘क़ानून’ है। इसमें ‘प्र’ उपसर्ग जुड़कर ‘प्रविधान’ शब्द बनेगा; जैसे विधान में ‘सम्’ उपसर्ग जुड़कर ‘संविधान’ बनता है। प्र उपसर्ग का अर्थ विशेष है, अतः स्पष्ट है कि विशेष नियम, प्रविधि अथवा विशेष-उपबंध के लिए ‘प्रविधान’ शब्द का ही प्रयोग होना चाहिए, यथा– ‘सांविधानिक प्रविधान’। ऐसे में, प्रतिप्रश्न है कि जहाँ ‘प्रावधान’ शब्द लिखा मिलता है, क्या उसे ग़लत माना जाए? आइए! इसे देखते हैं:–

ज्ञातव्य है कि ‘प्रावधान’ शब्द अपने आप में ग़लत नहीं है; इसकी व्याकरणिक निर्मिति है। यह बना है– ‘प्र’ और ‘अवधान’ से; जैसे सावधान शब्द बनता है– ‘स(साथ अथवा सहित) + अवधान’ से। ‘प्र’ का अर्थ विशेष और ‘अवधान’ का अर्थ ‘ध्यान” है। यहाँ जानना चाहिए कि ध्यान शब्द की व्युत्पत्ति ‘ध्यै’ (ध्यैयित्तायाम्) धातु से हुई है, जिसमें चिंतन-मनन, सोच-विचार आदि का भाव है। इस प्रकार, ‘प्रावधान’ का अर्थ हुआ– ‘विशेष-ध्यान’।

अवधान : ‘अवधान’ सिर्फ़ ध्यान नहीं है, अपितु ध्यान का केंद्रीकरण है। अब इसमें ‘प्र’ उपसर्ग लगाते हैं तो संधि के नियम से ‘प्रावधान’ शब्द बनता है।

‘संविधान में किसी चीज का प्रावधान है’ का अर्थ है– ‘संविधान में इस पर विशेष रुप से ध्यान दिया गया है’ या ‘यह संविधान के पन्नों में आया है’। निष्कर्ष यह कि संविधान की धाराओं, अनुच्छेद(अनु+ छेद) आदिक के लिए ‘प्रावधान’ शब्द उचित नहीं है और किसी चीज का संविधान में प्रावधान होता है– यह बिलकुल ठीक है। अतः, सन्दर्भ महत्त्वपूर्ण है।

★ विशेष : संविधान में ‘इक’ प्रत्यय लगने से ‘सांविधानिक’ शब्द बनेगा; जिसका अर्थ है– ‘संविधान से सम्बन्धित’। विधान में ‘इक’ प्रत्यय लगने से ‘वैधानिक’ शब्द बनेगा। अगर कुछ संविधान से सम्बन्धित है तो वह संवैधानिक नहीं; अपितु ‘सांविधानिक’ है।

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