फूटा भीड़ बम, रेलवे हुआ बेदम, लेकिन कौन जिम्मेदार तय करें सरकार?

  • क्या है इसका कारण और क्यों सोए रहे जिम्मेदार अधिकारी
  • आखिर नाम रखते समय भी ख्याल नहीं रख पाए अफसर

मधुकर त्रिपाठी

अभी कुछ दिनों पहले की ही बात है। महाकुम्भ के बीचों-बीच भीड़ बेकाबू हुई और दर्जनों लोग काल के गाल में समा गए। यूपी के मुख्यमंत्री महंत आदित्यनाथ का भावुक वीडियो पूरी दुनिया ने देखा। लेकिन उन्होंने इससे सबक लिया और अगले सभी स्नान पर्व पर इतनी कड़ी सुरक्षा व्यवस्था की कि कोई बदइंतजामी नहीं हुई। इसी व्यवस्था के तहत प्रयागराज के एक रेलवे स्टेशन को भी बंद करवा दिया गया। लेकिन देशभर के रेलवे अधिकारियों ने इससे सीख नहीं ली और जनता को उनके भाग्य के भरोसे छोड़ दिया। नतीजतन नई दिल्ली के कैंट रेलवे स्टेशन पर भगदड़ मची और कई लोग असमय दुनिया छोड़ गए। ये वो लोग हैं, जिनके परिजन हो-हल्ला मचा रहे हैं या रो-कलप रहे हैं। जिनको कोई पूछने वाला नहीं है, वो मिसिंग हो जाएंगे या फिर कभी लौटकर नहीं आएंगे, ऐसा दिखाई पड़ रहा है। लेकिन इस हादसे ने पूरे देश को दहला दिया है। अब सवाल उठ रहे हैं कि उन लोगों का क्या कसूर है, जो आस्था के महाकुंभ में जाने के लिए निकले थे और सिस्टम की लापरवाही के चलते मौत की भगद़ड़ का शिकार हो गए। इस हादसे में 18 लोगों की मौत हुई है, कई घायल हैं।

अब सफाई भी पेश की जाएगी। दलीलें भी दी जाएंगी। लेकिन 18 लोग जो बेमौत मारे गए हैं, उनकी ज़िम्मेदारी कौन लेगा? आखिर इतना बड़ा हादसा कैसे हुआ? नई दिल्ली स्टेशन पर हादसे के बाद मंजर बेहद खौफनाक था। कुछ यात्री बेहोशी की हालत में मिले, तो कुछ बेहाल होकर अपने परिजन को खोज रहे थे। पूर्व रेल मंत्री और राजद के सबसे बड़े मुखिया लालू यादव ने कहा कि रेलवे की कुव्यवस्था की वजह से यह घटना हुई है। रेलवे को इसकी जिम्मेदारी लेनी चाहिए। उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने सरकार पर सीधा निशाना साधा और कहा है कि भाजपा सरकार मौत का सच छुपाने का पाप न करे। वहीं रायबरेली से सांसद और कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने सरकार पर बरसते हुए कहा कि सरकार पूरी तरह से फेल है। यह घटना एक बार फिर रेलवे की नाकामी और सरकार की असंवेदनशीलता को उजागर करती है।

अपने परिजनों को सुरक्षित न पाकर हमेशा दृढ़ रहने वाले पुरुषों की भी फूट पड़ी अश्रुधारा। 

बाद हादसे की करें तो नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर शनिवार की रात करीब नौ बजे थे, भारी भीड़ महाकुम्भ जाने के लिए प्लेटफॉर्म नम्बर 14 एवं 16 पर जमा हुई। प्रयागराज की रेलगाड़ियां लेट थीं, इसलिए सभी के सभी कन्फ्यूजन में थे। तभी नौ बजकर 26 मिनट पर भगदड़ मच गई। उसके बाद जो मंजर दिखा, वह रोंगटे खड़े कर देने वाला है। वहां उपस्थित लोगों का कहना है कि स्टेशन पर शाम चार बजे से भीड़ जुटने लगी थी। भीड़ में कुछ लोग बच्चों को भी साथ में लेकर आए थे। ये लोग नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर 14 पर इंतज़ार कर रहे थे, भीड़ का दबाव बढ़ता जा रहा था। बगल के प्लेटफॉर्म नंबर 13 से (दरभंगा) बिहार जाने वाली स्वतंत्रता सेनानी एक्सप्रेस को छूटना था, उसके लिए भी भीड़ जुट रही थी। छह बजते-बजते 13 और 14 नंबर प्लेटफॉर्म पर तिल रखने की भी जगह नहीं बची थी। घंटे भर में हालात आउट ऑफ कंट्रोल हो गए थे। इसका सहज अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि एक घंटे में 1500 सामान्य टिकटों की बिक्री हो गई। इसी बीच घोषणा हुई कि प्लेटफॉर्म नंबर 16 पर प्रयागराज से नई स्पेशल ट्रेन आ रही है, फिर क्या था। भीड़ को लगा कि यही ट्रेन प्रयागराज के लिए वापसी करेगी। स्पेशल ट्रेन की घोषणा सुनते ही सामान्य श्रेणी का टिकट लेने वाले यात्री प्लेटफॉर्म नंबर 14 से प्लेटफॉर्म नंबर 16 की तरफ भागने लगे।

सभी लोगों को प्लेटफॉर्म नम्बर 14 से 16 तक जाने के लिए फुटओवर ब्रिज का सहारा लेना था। लेकिन वहां भी पहले से बड़ी संख्या में लोग बैठे हुए थे। उसी भीड़ की चपेट में फुटओवर ब्रिज पर बैठे लोग आ गए, चिल्ल-पों तेज हई और कुछ मिनटों में ही भगदड़ की स्थिति बन गई। देखते ही देखते 18 लोगों की असमय मौत हो गई। सवाल फिर वही कि जब स्टेशन पर इतनी भीड़ थी, तो पूरा सिस्टम चैन की बंसी क्यों बजा रहा था? कुछ देर तक रेल प्रशासन अपनी लापरवाही पर मिट्टी डालने की कोशिश करता रहा? बाद में उसने माना कि भगदड़ में मौत हुई है। थोड़ी देर बाद खबर आई कि इस हादसे की जांज के लिए एक उच्च स्तरीय समिति के गठन का आदेश दिया गया है। सवाल फिर क्या ये जांच उन सवालों का जवाब भी खोजेगी कि कुंभ के लिए पर्याप्त इंतजाम करने का दावा करने वाला रेलवे राजधानी के स्टेशन पर ही भगदड़ क्यों नहीं रोक पाया? दावा तो पर्याप्त इंतजाम के किया जाता रहा, तो रेलवे लोगों को संभाल क्यों नहीं पाए? क्या लोगों को संभालने के लिए पर्याप्त व्यवस्था नहीं थी? क्या रेलवे को पता नहीं था कि वीकेंड पर बहुत लोग प्रयागराज जा रहे हैं? क्या ऐसी व्यवस्था नहीं थी जिससे प्लेटफॉर्म पर भगदड़ न मचती? लाखों-करोड़ों फूंककर महाकुम्भ का प्रचार करने वाली सरकार क्या सुरक्षा का इंतजाम करना भूल गई थी? सवाल हजारों हैं, जान सभी की प्यारी होती है, लेकिन सिस्टम केवल प्रचार में उलझा हुआ है।

ट्रेनों में यात्रियों से वसूली करने वाले RPF के जवानों की जगह सेना को बुलाने पर विवश सरकार। हालात यह है कि लूट करती है लोकल पुलिस और जब भी हादसे हो जाते हैं तो सम्भालने की जिम्मेदारी उठाती है सेना? इस बिंदु पर भी सिस्टम मूंद लेता है अपनी आंखें…

तीन सरकारी बयानों का जिक्र करता हूं, दिल्ली पुलिस का कहना है कि प्रयागराज नाम से दो ट्रेनें थीं। इनमें से एक प्रयागराज स्पेशल का अनाउंसमेंट हुआ, तब प्लेटफॉर्म 14 पर प्रयागराज (मगध) खड़ी थी, जो यात्री 14 जा रहे थे वो उद्घोषणा सुनकर 16 की तरफ भागे। वहीं उत्तर रेलवे के मुख्य जनसम्पर्क अधिकारी का कहना है कि फुटओवर ब्रिज पर एक आदमी का पैर फिसला, वो नियंत्रण खो दिया, तभी वहां उपस्थित लोग भागने लगे और यह हादसा हो गया। अब तीसरा बयान मंत्री का आया। सुकांत मजूमदार ने कहा कि पहले भगदड़ की फर्जी खबर फैली, तब यह हादसा हुआ। अब सच-झूठ का पता लगाने के लिए एक जांच कमेटी बनाई जा रही है। सरकारी लोगों की टीम सरकार को और अपने सिस्टम को बचाने का भरपूर कोशिश करेगी, इसमें कहीं भी शक, सुबहा और संदेह नहीं है। बस आम जनता को सोचना है कि अगर कहीं भीड़ दिखे, तो खुद बच लो। सरकार के पास कोई इंतजाम नहीं है। नहीं तो ऐसे ही अनर्गल बयानबाजी के बीच आपके जान की कीमत भी नहीं बचेगी।

इसी बीच उद्योगपति आनंद महिंद्रा ने कहा है कि हमें क्राउड मैनजेमेंट का प्लान बनाना चाहिए, जो तकनीक से लैस हो। मैं सभी इंजीनियरिंग संस्थानों से आह्वान करता हूं, इस तरह की योजना बनाएं। साथ ही अपील भी किया कि भीड़ नियंत्रण और सुरक्षा को आस्था का विषय व राष्ट्रीय मिशन बनाएं।

(लेखक एक प्रतिष्ठित पत्रिका के सम्पादक हैं और विभिन्न प्रतिष्ठानों में अपनी सेवाएं दे चुके हैं… अब एक चैनल का प्रभार)

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