नव वर्ष पर  कैसे होगी भारतीय संस्कृति की रक्षा?

बलराम कुमार मणि त्रिपाठी
  • सिर्फ नारे लगाने से नही होगा सुधार
  • अंग्रेजी का बढ़ता महत्व और बदल रहे कल्चर
  •  ईस्वीय सन तारीख और आंग्ल सभ्यता का बढ़ता साम्राज्य
  • संस्कृत शिक्षा की दुर्दशा

वर्ष 2024 के जाने में अभी पॉच दिन बाकी हैं, फिर 2025 की शुरुआत होगी। पाश्चात्य देश 31 दिसंबर की रात मे जागकर नये वर्ष का स्वागत करेंगे। भारत मे लोग नया वर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से मनायेंगे।

वैसे हमे यह बात समझ मे तब आई, जब काफी

उम्र बीत गई। असल मे गुलामी काल से ही ईस्वीय सन ही अधिकांशत: हमारे यहां प्रचलन मे है। शासन प्रशासन भी इसी के अनुसार चलता है, फाईनेंसियल ईयर (वित्तीय वर्ष) की क्लोजिंग भी अंग्रेजो के जमाने से 31मार्च ही चला आरहा है।

सिर्फ नेपाल मे हमने शक संवत और चैत्र,वैशाख आदि महीनो और तिथियो का व्यवहार देखा है।हमारे देश में पहले हिंदी लिपि देवनागरी मे अंको के व्यवहार १..२..४..५..आदि के रूप में करते थे। एक इकाई दो ईकाई.. आदि ही पढ़ाते थे। अब सब कुछ बंद होचुका है। दर असल हम दुहरी व्यवस्था मे जीरहे है। मूलत: हम भारतीय हैं,पर न तो पहरावा भारतीय रह गया है,न रहन सहन भारतीय है और न पढ़ाई ही भारतीय रह गया। खान पान भी पाश्चात्य होता जारहा है। सिर्फ भारतीयता का मुखौटा पहने रहते हैं। विवाह,यज्ञोपवीत,मुंडन आदि बचे हैं … इसका भी आधुनिकीकरण होगया है ये सभी नया करने के चक्कर मे हास्यास्पद होता जारहा है और यहां तक की अब अंतिम संस्कार की भी खिल्ली उड़ाने से बाज नहीं आरहे हैं। शेष संस्कार तो याद भी नहीं रह गए है। वैसे हमारे भारतीय परंपरा में षोड़श संस्कार हुआ करते थे। पर सभी संस्कार मनाने वाले गिने चुने परिवार ही रह गए। अधिकांशत: परिवार अंग्रैजी माध्यम और मिशनिरी विद्यालयो मै पढ़ाना ही गौरव की बात समझते हैं। केवल वाचारंभण मे संस्कृति,संस्कार और भारतीयता का नारा लगाते दीखते हैं।

कल मैने एक वरिष्ठ पत्रकार से पूछा क्या 25 दिसंबर का अवकाश तुलसी दिवस के कारण है। उन्होंने कहा कि शुरु से यह क्रिसमस डे, के रूप मे गजेटेड अवकाश रहा करता है। आजादी के बाद हिंदुओ के  त्यौहारो पर अधिकांशत: अवकाश खत्य हो चुके हैं। भारत मे सभी धर्मों के लोग पलते हैं इसलिए सभी का ध्यान रखते हुए अवकाश घोषित होतै हैं। वैसे शिक्षा और स्वास्थ्य के मामले मे लोग मिशनिरी स्कूल और चीकित्सालय पसंद करते हैं। सरकारी स्कूल और चिकित्सालयो की हालत खराब होचुकी है। सुन कर दुख हुआ,किंतु सचाई से भला कैसै ईन्कार किया जासकता है? हम नारा कुछ भी लगा लें पर भारतीय संस्कृति को बचाने वाले उपाय कहां कर रहे हैं?

संस्कृत की शिक्षा की जो गरिमा गुलामी काल ये थी,वह आजादी के बाद आज रह गई है क्या? न तो शिक्षक है न भवन और न छात्रों को कोई प्रोत्साहन है। संस्कृत पढ़े हुओ को नौकरी मे जो कठिनाई होती है,वह संस्कृत पढ़ने वाले स्नातको और परा स्नातको से पूछिये। अपने ही विद्यालयो मे (संस्कृत विद्यालय) शिक्षको के रिक्त स्धानो की पूर्ती नहीं की जाती। अन्य की बात ही क्या?  उनके आय का साधन सिर्फ पांडित्य कर्म बचा उस पर भी लोगो की क्रूर दृष्टि पड़ चुकी है।

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