कैदी की मौत के मामले में डीएम को किया गुमराह

 

  • झांसी जेल में 48 घंटे के दौरान हुई दो बंदियों की मौत
  • जिला प्रशासन के मासिक निरीक्षण के दौरान हुई घटना
  • अवैध वसूली और उत्पीड़न से आजिज बंदी और उनके परिजन

 

लखनऊ/झांसी। तू डाल डाल तो मैं पात पात… यह कहावत झांसी जेल प्रशासन के अधिकारियों पर एकदम चरितार्थ होती है। जेल अधिकारियों ने बंदी की आत्महत्या के मामले में डीएम और एसपी तक को गुमराह कर दिया। डीएम और एसपी जेल का निरीक्षण करते रहे और जेल अधिकारियों ने आत्महत्या करने वाले बंदी को जेल से बाहर निकालकर अस्पताल में बंदी को मृतक घोषित करा दिया। 48 घंटे के अंदर दो विचाराधीन बंदियों को मौत ने जेल प्रशासन को कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। जेल का आलम यह है कि अधिकारी बंदियों से अवैध वसूली कर जेब भरने में जुटे हुए है। इस शोषण से बंदी तो बंदी बंदियों के परिजन भी काफी दुखी हैं।

बीती 30 सितंबर को जिला प्रशासन की संयुक्त टीम झांसी जेल में मासिक निरीक्षण चल रहा था। सूत्रों के मुताबिक डीएम, एसपी के निरीक्षण के दौरान ही सर्किल नंबर एक की चार ए बैरेक में निरुद्ध टिकरी गांव निवासी बंदी करन कुशवाहा ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। इसकी भनक लगते निरीक्षण करा रहे अधिकारी टीम को उस बैरेक में ले जाने के बजाए अधिकारियों को महिला बैरेक लेकर चले। इस दौरान जेल अधिकारियों ने आनन फानन में एंबुलेंस से आत्महत्या करने वाले बंदी करन को अस्पताल पहुंचाया। जहां डॉक्टरों ने उसे मृतक घोषित कर दिया। जबकि इस बंदी की मौत निरीक्षण के दौरान ही बैरेक में ही हो गई थी।

सूत्रों का कहना है कि अभी यह मामला निपट भी नहीं पाया था कि एक दिन बाद ही जेल में निरुद्ध बुजुर्ग बंदी रामसिंह की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई। 48 घंटे में हुई दूसरी मौत की घटना से जेल प्रशासन के अधिकारियों में खलबली मच गई। बताया गया है कि अफीम की खेती के आरोप में बंद विचाराधीन बंदी रामसिंह की अधिकारियों ने वसूली के लिए नंबरदारों से पिटाई करवा दी। पहले से बीमार चल रहे बुजुर्ग बंदी की पिटाई से रीढ़ की हड्डी में चोट आ गई। पहले से बीमार और मारपीट में घायल हुए बंदी रामसिंह को उपचार के लिए झांसी मेडिकल कॉलेज भेजा गया। जहां डॉक्टरों ने उसको भी मृतक घोषित कर दिया। 48 घंटे में दो बंदियों की मौत ने जेल प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए। बताया जा रहा कि इस जेल में वसूली के लिए बंदियों के साथ बंदियों के परिजनों का भी जमकर शोषण किया जा रहा है। उधर इस संबंध में जब जेल अधीक्षक विनोद कुमार से बात करने का प्रयास किया गया तो उन्होंने नाम सुनते ही फोन काट दिया। जेलर कस्तूरी लाल गुप्ता ने तो फोन ही नहीं उठाया।

मुख्यालय अफसरों का मातहतों पर कोई नियंत्रण नहीं कारागार विभाग के आला अफसरों का मातहत अधिकारियों और कर्मियों पर कोई नियंत्रण नहीं रह गया है। यही वजह है कि प्रदेश की जेलों में मौत की घटनाएं थमने का नाम नहीं ले रही है। झांसी जेल में दो मौत की घटनाओं से पहले लखनऊ, फिरोजाबाद, प्रतापगढ़ समेत अन्य कई मंडलीय, जिला जेलों में विचाराधीन बंदी मौत को गले लगा चुके है। मरने वाले बंदियों में अधिकांश युवा शामिल हैं।

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