घूस मांगने पर कारागार विभाग का एक बाबू निलंबित

  • एसीपी लगाने के लिए हेड वार्डर से मांगी थी रंगदारी
  • शिकायत करने पर डीजी पुलिस/आईजी जेल ने की कार्यवाही
  • इससे पहले पत्रावली में गड़बड़ी करने में दो बाबू हो चुके निलंबित

राकेश यादव

लखनऊ। जेल मुख्यालय और जेल कार्यालयों में व्याप्त भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने की आईजी जेल की मुहिम रंग ला रही है। मुख्यालय में पत्रावली में गड़बड़ी के आरोप में निलंबित किए गए दो बाबुओं के बाद जेल कार्यालय में घुस मांगने पर एक और बाबू को निलंबित कर दिया गया है। एक माह के अंदर तीन बाबुओं के निलंबन की कार्यवाही से विभाग के बाबुओं में हलचल मची हुई है। विभाग में चर्चा है कि भ्रष्टाचार में लिप्त अभी कई अन्य बाबुओं पर भी कार्यवाही की जा सकती है।

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मामला वाराणसी जेल परिक्षेत्र का है। मंडल की जेलों के कर्मियों को एसीपी देने के आवेदन किए। एसीपी देने के लिए एसीपी कमेटी के सदस्यों ने अभिलेखों के परीक्षण के उपरांत पात्र कर्मियों की संस्तुति करते हुए अपनी रिपोर्ट वरिष्ठ अधीक्षक केंद्रीय कारागार वाराणसी को भेज दी। इस रिपोर्ट के पांच माह बाद भी इस पर कोई निर्णय नहीं लिया गया। जिससे वाराणसी मंडल में कार्यरत कर्मियों को समय से सेवा का लाभ नहीं दिए जाने के कारण आक्रोश व्याप्त था। एसीपी नहीं दिए जाने की जानकारी वरिष्ठ अधीक्षक/नियुक्ति अधिकारी को दी गई। यह प्रक्रिया अभी चल ही रही थी। इसी दौरान एक चौंकाने वाला मामला सामने आ गया।

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सूत्रों का कहना है कि मंडल की एक कारागार के हेड वार्डर ने एसीपी का लाभ देने के लिए केंद्रीय कारागार वाराणसी के अधिष्ठान में कार्यरत कनिष्ठ सहायक धर्मेंद्र कुमार पांडेय से संपर्क किया। कनिष्ठ सहायक ने एसीपी देने के लिए हेड वार्डर से अतिरिक्त धनराशि की मांग की। हेड वार्डर ने इसकी शिकायत परिक्षेत्र के डीआईजी समेत अन्य आला अफसरों से कर दी। जांच में दोषी पाए जाने पर आईजी जेल के निर्देश पर कनिष्ठ सहायक धर्मेंद्र कुमार पांडेय को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया। निलंबित बाबू को प्रयागराज से संबद्ध किया गया है। इससे पूर्व जुलाई के प्रथम सप्ताह में आईजी जेल ने पत्रावली को लेकर गुमराह करने वाले मुख्यालय में गोपनीय अनुभाग के संजय श्रीवास्तव और विनय रावत को निलंबित किया था। एक माह के अंदर निलंबन को यह तीसरी कार्यवाही है। उधर आईजी जेल पीवी रामाशास्त्री से काफी प्रयास के बाद भी संपर्क नहीं हो पाया।

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यह कहावत कारागार मुख्यालय के अफसरों पर एकदम फिट बैठती है। मुख्यालय के दो बाबुओं के निलंबन को लेकर कर्मियों में तमाम तरह की अटकलें लगाई जा रही है। चर्चा है कि प्रभार किसी और के पास था और निलंबन किसी और का कर दिया गया। जानकारों का कहना है कि विभागीय कार्यवाही का प्रभार संभालने वाले बाबू को निलंबित कर दिया गया, जबकि गलती अधीक्षक संवर्ग का प्रभार देख रहे बाबू से हुई थी। इस मामले की पड़ताल में दूध का दूध पानी सामने आ जाएगा।

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