दो टूक लोकसभा चुनाव परिणाम और गठबंधन सरकार के मायने

दो टूक
राजेश श्रीवास्तव
लोकसभा चुनाव परिणाम और गठबंधन सरकार के मायने
लगातार तीसरी बार नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने जा रहे हैं। एनडीए इस बार बहुमत में जरूर है, लेकिन भाजपा को पूर्ण बहुमत नहीं मिला है। इन नतीजों के अलग मायने हैं, जिन्हें हमें बेहद बारीकी से समझना होगा। इस बार बीजेपी की नहीं एनडीए की सरकार है। प्रधानमंत्री मोदी का जिस तरह का व्यक्तित्व है वह गठबंधन सरकार चलाने वालों की नेता की श्ौली से मेल नहीं खाता है। शायद इसीलिए इस बार एनडीए की सरकार की मजबूती को लेकर हर एक के मन में संशय के बादल घुमड़ रहे हैं। पीएम मोदी ने जब से अपनी सियासी पारी शुरू की है तब से वह आज तक सहयोगी दलों की तो छोड़िये अपने दल के लोगों के साथ भी सामंजस्य नहीं बिठा सके हैं। गुजरात की मुख्यमंत्री पद की दावेदारी से लेकर 2०24 तक के चुनाव तक का उनका सियासी सफर यही बताता है। वह जिस-जिस के साथ भी अब तक पारी ख्ोले उसका भी अब पता नहीं कहा चला गया। उनके ऐसे सहयोगियों की लंबी चौड़ी फेहरिस्त है जो अब गुमनाम के अंध्ोरे में खो से गये हंैं, सिवाय अमित शाह के। चाहे संजय जोशी हों, लालकृष्ण आडवाणी हों, भैरों सिह शेखावत हों, शंकरसिह वाघेला हांे, मुरली मनोहर जोशी हों, उमा भारती हों या फिर कोई और ऐसे तमाम नेता हैं। अगर इतिहास से सबक न लेना चाहें तो बीते दो कार्यकाल भी याद कर लीजिये जब उन्होंने एनडीए के अपने किसी साथी को तवज्जो नहीं दी। इसीलिए हमें लोकसभा चुनाव परिणाम के मायने और सरकार की मजबूती को भी समझना होगा।

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इन नतीजों ने आम आदमी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी को छोड़कर सभी को कुछ न कुछ दिया है। इस चुनाव को अगर संक्षेप में समझें तो सत्ता के साथ चलते हुए जो कमियां आती हैं, उसका कोर्स करेक्शन नहीं कर पाना, खराब तरीके से टिकट बांटना भाजपा को देश के सबसे बड़े सूबे में नुकसान पहुंचा गया। विपक्ष का संविधान खत्म हो जाएगा, यह नरैटिव सेट कर देने से भी भाजपा को नुकसान हुआ। अब लोग खुलकर बोल रहे हैं। अगर ये बातें पहले बोली जातीं तो शायद इन्हें जहां पहुंचना था, वहां पहुंच जातीं। यह चुनाव ऐसा है कि जिसमें जीता हुआ पक्ष हारे हुए जैसा दिखाई दे रहा है। यह चुनाव बता रहा है कि अब सत्ताधारी दल को कोर्स करेक्शन की बहुत जरूरत है। अब जो सरकार चलेगी, वो चेक एंड बैलेंस के साथ चलेगी।
जहां हारे, हम वहां की चर्चा करते हैं और जहां जीते हैं, वहां की चर्चा नहीं करते हैं। सवाल यह है कि हमें इस बात की समीक्षा करनी चाहिए कि कोई क्यों जीता। अगर यह समीक्षा होगी तो हार का कारण ढूंढना आसान हो जाएगा। इस देश में वन टाइम योजना लाभकारी नहीं है, यह साबित हो गया। 2०14, 2०19 और 2०24, इन तीनों चुनावों को देखेंगे तो 2०14 में भ्रष्टाचार बड़ा मुद्दा था, 2०19 में राष्ट्रवाद बड़ा मुद्दा था, 2०24 में संविधान और आरक्षण बड़ा मुद्दा बन गया। यकीनन भारतीय जनता पार्टी को कोर्स करेक्शन की जरूरत है। उत्तर प्रदेश के अंदर सामाजिक न्याय, महंगाई, बेरोजगारी जैसे मुद्दों का गुणात्मक प्रभाव देखने को मिला। समाज का एक बड़ा वर्ग इन मुद्दों पर टिका रहा और ध्रुवीकरण नहीं हुआ।
यह चुनाव परिणाम ऐसा है, जिसमें दो-तीन दलों को छोड़ दीजिए तो सबके लिए खुश होने का मौका है। सपा का प्रदर्शन अभूतपूर्व है। ममता बनर्जी के लिए भी ऐसा ही है। यह परिणाम ऐसा है कि अब आगे की राजनीति में बहुत कुछ बदलता हुआ दिखाई देगा। चुनाव परिणाम के दो दिनों तक ऐसा माहौल बना जैसे विपक्ष जीत चुका है और सत्ता पक्ष हार गया है। पिछले तीन दिन में सब कुछ बदल गया है। उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल से लेकर महाराष्ट्र तक जिस तरह के नतीजे रहे, यह भाजपा के लिए एक गंभीर स्थिति है। भारत में यह केवल दूसरी बार हो रहा, जब कोई नेता लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री बन रहा है। दुनियाभर के बड़े-बड़े नेता तीसरी बार आते-आते कमजोर पड़ गए। इसके कई उदाहरण हैं। इसलिए इस जीत को छोटा नहीं माना जाना चाहिए। नरेंद्र मोदी तो बेहतर उम्मीदवार नहीं थे, फिर उनका वोट प्रतिशत कैसे कम हो गया। रवि किशन का वोट शेयर 1० फीसदी के करीब कैसे कम हो गया। जिस प्रणाली से भाजपा जीतती थी, उसी में वह शिथिल हो गई और यही उसकी हार की वजह बनी। चुनाव और युद्ध, दोनों के परिणाम होते हैं, उसमें हार के कई कारण होते हैं। उनका अपने-अपने हिसाब से विश्लेषण होता है। अयोध्या की बहुत दिलचस्प कहानी है। जब-जब अयोध्या में भाजपा ने कुछ बड़ा किया है, वहां से भाजपा हारी है। ओडिशा में तो भाजपा को बहुत अच्छी सफलता मिली है। आने वाले समय में प्रधानमंत्री मोदी की बड़ी अग्निपरीक्षा होगी, जब उन्हें गठबंधन सरकार चलानी है। दूसरी अग्निपरीक्षा राहुल गांधी की होगी कि क्या वो इन नतीजों के बाद विपक्ष को एकजुट रख पाते हैं।

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