फतेहपुर लोकसभाः क्या गठबंधन करेगा कमाल या जीत के साथ रिकॉर्ड बनाएगी BJP?

प्रयागराज मंडल में शामिल फतेहपुर जिला भी राजनीतिक रूप से बेहद अहम माना जाता है। फतेहपुर संसदीय सीट से पूर्व पीएम विश्वनाथ प्रताप सिंह भी चुनाव लड़ चुके हैं। वह जब देश के प्रधानमंत्री बने थे तब इसी सीट से सांसद चुने गए थे। इनके अलावा पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के बेटे भी दो बार सांसद रह चुके हैं। फिलहाल फतेहपुर सीट पर BJP का कब्जा बना हुआ है। साध्वी निरंजन ज्योति यहां से सांसद हैं और उनकी नजर चुनावी जीत की हैट्रिक पर लगी है। फतेहपुर संसदीय सीट के तहत छह विधानसभा सीट आती है, जिसमें जहानाबाद, बिदकी, अयाह शाह, फतेहपुर, हुसैनगंज और खागा शामिल है। खागा अनुसूचित जाति के लिए रिजर्व सीट है। साल 2022 में हुए विधानसभा चुनाव में यहां की चार सीटों पर BJP की अगुवाई वाली एनडीए (एक सीट अपना दल, सोनेलाल) को जीत मिली तो दो सीट सपा के खाते में गई।

साल 2019 के संसदीय चुनाव में फतेहपुर लोकसभा सीट के चुनावी परिणाम को देखें तो तब यहां पर एकतरफा मुकाबला हुआ था। BJP की प्रत्याशी साध्वी निरंजन ज्योति और बसपा के सुखदेव प्रसाद वर्मा के बीच था। चुनाव से पहले बसपा और सपा के बीच चुनावी गठबंधन हो गया था और इस वजह से यह सीट बसपा के खाते में आई थी। हालांकि गठबंधन का फायदा बसपा को नहीं मिला और उसे हार का सामना करना पड़ा। निरंजन ज्योति को 566,040 वोच मिले तो बसपा के सुखदेव प्रसाद को 367,835 वोट मिले। कांग्रेस के राकेश सचान को 66,077 वोट ही मिले और वह तीसरे स्थान पर रहे। BJP की साध्वी निरंजन ज्योति ने आसान मुकाबले में सुखदेव प्रसाद को 198,205 मतों के अंतर से हरा दिया। तब के चुनाव में फतेहपुर लोकसभा सीट पर कुल 17,83,535 वोटर्स थे जिसमें पुरुष वोटर्स की संख्या 9,72,502 थी जबकि महिला वोटर्स की संख्या 8,10,988 थी। इसमें से कुल 10,43,655 (59.3%) वोटर्स ने वोट डाले। चुनाव में नोटा के लिए 14,692 वोट पड़े थे।

फतेहपुर नाम जौनपुर के इब्राहिम शाह द्बारा अथगढ़िया के राजा सीतानंद पर मिली जीत के बाद रखा गया था। साथ ही इस नाम पर एक और कहानी भी कही जाती है कि फतेहमंद खान ने शहर की स्थापना की थी। यह जानकारी तहसील खागा में डेण्डासई में पाए गए एक खंडित शिलालेख से मिली। इसके अनुसार, सुल्तान अलाउद्दीन के एक अधिकारी फतेहमंद खान को इस संबंध में 1519 में आदेश मिला। लेकिन खास बात यह है कि इस दौर में अलाउद्दीन नाम का कोई सुल्तान नहीं था, ऐसे में यह दावा सही नहीं माना जा सकता।

फतेहपुर का संसदीय इतिहास

फतेहपुर लोकसभा सीट के संसदीय इतिहास को देखें तो यहां पर 1990 के बाद के दौर में मुकाबला त्रिकोणीय ही रहा है। जीत कभी BJP तो कभी सपा या फिर बसपा के खाते में गई है। कांग्रेस को 40 साल पहले आखिरी बार यहां पर जीत मिली थी। फतेहपुर में 1957 के चुनाव में कांग्रेस के अंसार हरवानी को जीत मिली थी। फिर 1962 में निर्दलीय गौरी शंकर चुनाव जीते थे। 1967 में कांग्रेस के संत बक्श सिंह ने यहां से जीत हासिल की। वह 1971 के चुनाव में भी अपनी सीट बचाने में कामयाब रहे। इमरजेंसी के बाद 1977 में कराए गए चुनाव में कांग्रेस को हार मिली और जनता पार्टी के प्रत्याशी बशीर अहमद सांसद चुने गए। 1978 के उपचुनाव में जनता पार्टी के सैय्यद लियाकत हुसैन ने जीत हासिल की।

वर्ष 1980 के चुनाव में फतेहपुर लोकसभा सीट से पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के बेटे हरिकिशन शास्त्री मैदान में उतरे और विजयी हुए। वह 1984 के चुनाव में भी विजयी हुए। वह लगातार दो बार चुनाव जीते। इसके बाद विश्वनाथ प्रताप सिंह भी यहां पर चुनाव लड़ने आए। 1989 और 1991 के संसदीय चुनाव में जनता दल के टिकट पर विश्वनाथ प्रताप सिंह ने जीत हासिल की। 1989 में जीत हासिल करने के बाद विश्वनाथ प्रताप सिंह देश के प्रधानमंत्री भी बने थे। साल 1996 के चुनाव में बसपा के विशंभर प्रसाद निषाद चुने गए तो 1998 के चुनाव में BJP ने यहां से जीत का खाता खोला और अशोक कुमार पटेल चुनाव जीतने में कामयाब रहे। वह 1999 के चुनाव में फिर से सांसद चुने गए।

जातिगत समीकरण

फतेहपुर लोकसभा सीट पर एससी वोटर्स की संख्या सबसे अधिक है। यहां पर करीब 19 लाख वोटर्स में 4 लाख से अधिक एससी वोटर्स हैं। इनके अलावा क्षत्रिय वोटर्स की संख्या 3 लाख, ढाई लाख के करीब ब्राह्मण वोटर्स हैं तो निषाद वोटर्स की संख्या दो लाख, 1.25 लाख वैश्य और एक लाख से अधिक यादव वोटर्स हैं। इनके अलावा डेढ़ लाख से अधिक मुस्लिम वोटर्स हैं। साल 2004 के आम चुनाव में बसपा को जीत मिली और महेंद्र प्रसाद निषाद चुनाव जीतने में कामयाब रहे। जबकि 2009 में सपा के राकेश सचान के खाते में जीत आई और पार्टी की जीत का खाता भी खुल गया। 2014 के संसदीय चुनाव में देश में मोदी लहर का असर दिखा और यह फतेहपुर सीट भी BJP के खाते में आ गई। BJP की प्रत्याशी साध्वी निरंजन ज्योति ने बसपा के अफजल सिद्दीकी को 1,87,206 मतों के अंतर से हराया। 2019 के चुनाव में भी साध्वी निरंजन ज्योति ने आसान जीत हासिल करते हुए 1,98,205 मतों के अंतर से जीत हासिल की। अब उनकी नजर जीत की हैट्रिक पर लगी है। फतेहपुर सीट पर भले ही पिछले 2 चुनाव में हार-जीत का अंतर 2 लाख के करीब रहा हो, लेकिन इस बार मुकाबला थोड़ा कड़ा हो सकता है क्योंकि सपा और कांग्रेस के बीच गठबंधन हो चुका है।

बुलंद दरवाजे से बटेश्वर की कथा; राज, राम और एक वोट कटवा! किसके साथ है फतेहपुर

बुलंद दरवाजा एकतरफ तो दूसरी ओर यमुना तट पर विराज रहे बटेश्वर नाथ। फतेहपुर सीकरी संसदीय क्षेत्र का नक्शा देखें तो, यह सुदूर तक फैला संसदीय क्षेत्र एक छोर दयालबाग यमुना किनारे को छूता है, तो दूसरे छोर को बाह में चंबल छूती है। सीकरी की दिशा अलग है। सच कहें तो भौगोलिक रूप से बहुत दुरूह। लोकसभा चुनाव की तस्वीर देखें तो मतदाता कैसी तस्वीर बनाने का मन बना चुका है, समझना उतना आसान नहीं। इस क्षेत्र के पांच विधानसभा क्षेत्रों के मतदाताओं में कम से कम चार तरह के रंग भरने का मन है। भाजपा के लिए यहां जीत हासिल करना बहुत जरूरी है। यही वजह है कि पार्टी ने सारी ताकत अंतिम पांच दिन में यहां लगा दी है। वहीं कांग्रेस के फौजी का दम भी कम नहीं है।

पिछली बार खिला था कमल

सीकरी संसदीय सीट से आगरा ग्रामीण, फतेहाबाद, बाह, खेरागढ़ और सीकरी विधानसभा सीट लगती हैं। पिछली बार भाजपा के राजकुमार चाहर ने 4।96 लाख वोटों से जीते थे। वह फिर कमल चुनाव चिह्न लाए हैं। कांग्रेस-सपा गठबंधन का हाथ पूर्व सैनिक रामनाथ सिकरवार संग है। बसपा के हाथी पर रामनिवास शर्मा हैं। यदि चुनाव में एक सप्ताह पूर्व की बात करें तो चाहर मुश्किल में थे। लग रहा था कि दिल्ली का रास्ता कांग्रेस के नजदीक हो रहा है। परंतु मतदान के अंतिम दौर तक बहुत मंथन हो गया है, जिसमें भाजपा को अमृत मिल गया है। रुनकता के प्लाईवुड की दुकान पर बैठे रायभा के बबलू कहते हैं कि पार्टी संग प्रत्याशी बड़ा मुद्दा हो गया है। आखिर चाहर ने यह तो सोचा होता कि दोबारा चुनाव में भी जाना है।

भाजपा के मंसूबों को नाकाम करने पर जुटे सपाई

फतेहपुर संसदीय सीट पर वर्ष 2014 और 2019 के आम चुनाव में लगातार दो बार भारतीय जनता पार्टी ने कामयाबी हासिल कर अपना कब्जा बरकरार रखा है। अब तीसरी बार भी BJP की जिला इकाई इस सीट पर हैट्रिक का दम भर रही है। वहीं समाजवादी पार्टी ने बीते 10 वर्षों में दो पंचवर्षीय के हुए आम चुनावों में सफलता अर्जित करने वाली भाजपा के इस किले को ध्वस्त करने के मंसूबे को नाकाम करने के लिए विकास और बेरोजगारी जैसे अहम मुद्दों को लेकर जनता के बीच संसदीय क्षेत्र में दिन रात जनसंपर्क अभियान में जुटी हुई है।

रिपोर्ट कार्ड के अनुसार चुनेंगे सांसद

फतेहपुर लोकसभा सीट पर इन दो चुनावों में रनर रहने वाली बसपा भी इस बार विनर बनने के लिए इस सीट पर अपने दलित वोट बैंक के साथ अन्य समाज के मतदाताओं पर डोरे डालने में पीछे नहीं है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि बेशक भाजपा और सपा के बीच इस सीट पर कांटे का मुकाबला होगा। लेकिन यहां पर इस बार के चुनाव में जनता बीते 10 वर्षों में हुए स्थानीय विकास के हिसाब किताब के अनुसार अपना सांसद चुनेगी।

राजनीतिक परिवारवाद को नकारा

प्रदेश की मुख्य विपक्षी समाजवादी पार्टी और कांग्रेस पर हमेशा से परिवारवाद की राजनीति के आरोप लगाते रहे हैं। इसी तरह बीते दिनों बसपा सुप्रीमो मायावती ने अपने भतीजे आकाश आनंद को राजनीति में अपना उत्तराधिकारी घोषित कर पार्टी की जिम्मेदारियां सौंपीं थीं। इसके बाद बसपा पर भी परिवारवाद की राजनीति के आरोप उजागर होने लगे थे। जिम्मेदारियां मिलने के बाद आकाश आनंद ने कई जनसभाओं में संबोधन के दौरान सपा और कांग्रेस पर हमला बोला था। वहीं सीतापुर में भाजपा पर भी जमकर बरसे थे। इस पर BJP की ओर से आकाश आनंद के खिलाफ मुकदमा भी दर्ज कराया गया था। इसके बाद बसपा सुप्रीमो ने पार्टी के अनुशासनहीनता पर आकाश आनंद पर कार्रवाई करते हुए पार्टी के सभी पदों से मुक्त कर दिया था।

BJP की टीम ‘बी’ का आरोप

राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि आकाश आनंद को बसपा के सभी पदों से मुक्त करने की इस कार्रवाई पर बसपा सुप्रीमो ने भले ही परिवारवाद की राजनीति को नकार दिया हो, लेकिन भाजपा की बी टीम के रूप में काम करने के आरोपों की चर्चा जरूर हो रही है। जिससे इस सीट पर बीते दो आम चुनावों में दूसरे नंबर पर रहने वाली बसपा पर इसका सीधा असर दिखाई देगा।

क्या कहते हैं वोटर?

वहीं बैठे कथावाचक भोलेराम कहते हैं कि भाजपा ने रामेश्वर को बाहर करने में इतनी देरी क्यों कर दी? वोट पर कहते हैं कि रामनाथ की जाति में वह सबसे मजबूत हैं लेकिन उनके लिए मुद्दा हिदुत्व है। कुकथला के पास ताशों की महफिल सजी है। वहां बाबूलाल कहते हैं कि जाट वोटों में बंटवारा है। यह आगे जाटों के लिए ही मुश्किल भरा होगा, क्योंकि कोई और जीता तो आगे भी दावेदारी रहेगी। वह भाजपा प्रत्याशी राजकुमार पर कहते हैं कि क्षेत्र में आलू प्रसंस्करण केंद्र बनवाया लेकिन प्रचार क्यों नहीं कर सके। वह अब गंगाजल लाने की बात कर रहे हैं लेकिन तब से कहां थे। ऐसे में रामेश्वर को जाटों में दम मिला। अब वोट तो बहुत कटेगा। हाथी को लेकर कहते हैं कि प्रत्याशी रामनिवास के व्यक्तिगत संबंध सीकरी में बहुत हैं। यही उनकी मजबूती का आधार है।

आगे बढ़ने पर अभुआपुरा में सोनू पंडित कहते हैं कि सबका अपना-अपना बंटवारा है। उनके लिए तो मोदी-योगी ही नाम हैं। टीटू पंडित कहते हैं कि आप समझ सकते हैं कि पहले एक ही बिरादरी के दारोगा दिखते थे। अब गांव में चलो तो कई दूसरी जातियों के भी दारोगा हैं। योगी ने परीक्षाएं बिना गड़बड़ी कराई हैं, तो मौका मिला है।

जयंत का कितना असर

जाटों में जयंत का कितना असर है? इसे जैंगारा के बबलू बताते हैं कि राजकुमार की नाव मंझधार से निकाल दी है। अखवाई के ओमप्रकाश भगौर बाजार से सामान लेकर लौटे हैं। वह बताते हैं कि अभी सामान खरीदने में एक दुकानदार से चुनावी बहस हो गई। आखिर में समझा आए कि हमारा हित मोदी से ही है। रामेश्वर का कितना रंग है, तो कहते हैं कि अपने गांव वाले क्षेत्र में ही वोट काटेंगे। बसपा के परंपरागत मतदाताओं में एक बंटवारा अखवाई के सोनू समझाते हैं। पुरानी पीढ़ी बसपा के साथ तो नई के लिए हाथ ही इस बार जगन्नाथ है। ऐसा क्यों? हम कब तक वहां रहें, आखिर हाथी दिल्ली पहुंचता ही नहीं। रिठौरा के भाव सिंह कहते हैं कि जाटों का बंटवारा होगा। वह कहते हैं कि पांच बार के विधायक बदन सिंह कहते थे कि जनप्रतिनिधि को जनता के सुख दुख में शामिल होना चाहिए। इससे ही वह राजनीति में आगे बढ़ता जाता है।

कानून व्यवस्था भी मुद्दा

अग्निवीर योजना पर भी इशारे में मन के गुस्से को बताते हैं लेकिन चौधरी चरण सिंह को भारत र‘ मिलने से गौरवान्वित भी महसूस करते हैं। खेरागढ़ के एक आश्रम पर कांग्रेस प्रत्याशी का ठिकाना है। यहां पहले उनका मैदान मजबूत था। अब भाजपा ने क्षेत्र में बहुत सैनिक लगा दिए हैं। परिणाम तो देर में आएंगे लेकिन बानगी देखने को मिल रही है। जगनेर के आढ़ती धर्मेंद्र शर्मा के यहां व्यापारियों की बैठक चल रही है। दस में से नौ एक मत हैं कि कानून व्यवस्था का राज चाहिए। मंडी में भी कहा जाता है कि बाजार में पता कीजिए कि ठेल और वाहनों से वसूली कौन करता है। यह जीत गए तो मुश्किल कर देंगे। पिछड़ा वर्ग में कुशवाहों के मत के लिए दो इशारे हैं जिनमें विधायक भगवान सिंह और गिर्राज सिंह। त्यागियों की चालीसी ने भाजपा को उम्मीद दे दी है।

राज, राम और वोट कटवा…

क्षेत्र में पिछड़ा मतों में लोधे राजपूतों पर कल्याण का असर बाकी है, तो बघेलों के लिए एसपी सिंह का साथ ही इशारा होता है। निषाद मतों के लिए भाजपा पहले ही विधानसभा में हिसाब फैला चुकी है लेकिन फिर भी भितरघात का सामना कर रही है। ब्राह्मणों का रुख हर विस क्षेत्र में अलग है। वहां हाथी का पेट न भरने से नए समीकरण बन रहे हैं ।

सपा भेदेगी भाजपा का किला! कितनी पावरफुल है बसपा?

उत्तर प्रदेश के फतेहपुर लोकसभा सीट पर बीते दो पंचवर्षीय के आम चुनावों में भाजपा लगातार जीत दर्ज की है। तीसरी बार भी भाजपा दमखम के साथ चुनावी रण भूमि में है। हालांकि इन दोनों चुनावों में बहुजन समाज पार्टी दूसरे पायदान पर थी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मोदी और योगी के बलबूते जिले की भाजपा इकाई भले ही सफलता का दावा कर रही हो, लेकिन इस बार संसदीय सीट पर विकास कार्यों और बेरोजगारी जैसे अहम मुद्दों के रिपोर्ट कार्ड के अनुसार जनता अपना सांसद चुनेगी। इससे तो यह साफ जाहिर हो गया है कि इस सीट पर भाजपा और सपा के बीच जबरदस्त मुकाबला होने की संभावना है।

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