आज विश्व पृथ्वी दिवसः जब तक पठार में पेड़, तब तक बस्तर में पानी

  •  सूख चुके हैं बहार के नाम से चर्चित बस्तर के हज़ारों नाले
  •  साल वनों के द्वीप बस्तर में रह गया 796 वर्ग किमी साल जंगल
  •  जगदलपुर वन वृत्त में बस गई हैं ढाई सौ से अधिक नई बस्तियां
    हेमंत कश्यप / जगदलपुर।
    पहाड़ के ऊपर विशाल मैदान को पठार कहा जाता है और बस्तर दंडकारण्य नामक पठार पर बसा है और जब तक इस पठार पर जंगल रहेंगे तब तक यहां पानी भी रहेगा।
    यह चेतावनी 83 वर्ष पहले ही भूगर्भ शास्त्रियों ने बस्तरवासियों को दे दी थी, इसके बावजूद यहां तेजी से जंगल कटे और बहार के नाम से चर्चित रहे यहां के हजारों नालों का प्रवाह खत्म हो गया। इधर जगदलपुर वन वृत्त में बीते 30 वर्षों में पेड़ काट ढाई सौ से ज्यादा नई बस्तियां आबाद हो चुकी हैं। पेड़ों की कटाई को गंभीरता से नहीं रोका गया तो बसर आने वाले दिनों में बूंद बूंद पानी को तरसेगा।
    ख़त्म हो रहा जंगल
    बस्तर संभाग का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 39,060 वर्ग किमी है जिसके दक्षिण पश्चिम भाग में जगदलपुर वन वृत्त स्थित है। वन वृत्त का विस्तार 22,506 वर्ग किमी में है, इसका लगभग 55 प्रतिशत भाग अर्थात 12,429.110 वर्ग किमी क्षेत्र वनाच्छादित रहा है।
    बस्तर वन में विभिन्न प्रकार के वनौषधीय पौधों की भी उपलब्धता रही है। इस क्षेत्र में ग्रामीणों का जीवन मुख्यतः वनो पर ही आधारित है। वन ग्रामीणों के लिए रोजगार एवं आजीविका के मुख्य स्त्रोत है। वन आदिवासियों की आस्था, संस्कृति एवं परम्परा से जुड़े हुए हैं। तेजी से सिमट रहे जंगल को बचाने वनों का संरक्षण जनहित के लिए अति- आवश्यक हो गया है।
    सिमट रहा साल वन
    जगदलपुर वन वृत्त में करीब दो हजार वर्ग किमी क्षेत्र में साल का जंगल था लेकिन बढ़ती जनसंख्या और गांव, नगरों के विकसित होने से साल वन का रकबा महज 795 वर्ग किमी रह गया है। वहीं सागौन 300, मिश्रित वन भी 5750 वर्ग किमी क्षेत्र में सिमट कर रह गया है।
    वन वृत्त की करीब एक लाख एकड़ वन भूमि पर गत 25 वर्षों में ढाई सौ से अधिक बस्तियां बस चुकी हैं। वन वृत्त में 31548.710 हेक्टेयर वन भूमि पर पट्टा के लिए 27 हजार 35 लोगों ने पट्टा मांगा है। विभाग के साथ ग्रामीण भी साल वनों की दुर्दशा के लिए जिम्मेदार हैं।
    जड़ सहेजते हैं पानी
    भूगर्भ शास्त्री बताते हैं कि पेड़ पौधे बारिश के पानी को अपनी जड़ों में संचित करते हैं और जब वर्षाकाल खत्म होता है। जड़ों में संचित पानी ही नदी – नालों में रिसता है, वहीं अन्य जल स्रोतों का जल स्तर भी बढ़ाते हैं। बस्तर समुद्र तल से 566.918 मीटर ऊपर है जबकि मैदानी इलाके का दुर्ग शहर समुद्र तल से 327.26 मीटर की ऊंचाई पर है। इस तरह बस्तर मैदानी क्षेत्र की तुलना में 239.65 मीटर अर्थात 790. 87 फीट ऊंचे स्थान पर बसा है। जंगलों के कारण ही यहां के नदी नालों में बारहों मास पानी रहा। जैसे जैसे पेड़ों की संख्या कम होती जाएगी यहां के नदी – नाले क्रमशः सूखते चले जाएंगे। इस भयावहता को समझने की आवश्यकता है।

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