गीता जयंती पर, कर्तव्य पथ से पलायन कायरता

  • अज्ञानता मोह के कारण
  • असत कभी नही टिकता सत कभी नहीं मरता
बलराम कुमार मणि त्रिपाठी
बलराम कुमार मणि त्रिपाठी

युद्धभूमि मे आकर अर्जुन धनुष किनारे रख कर मोहासक्ति से रोरहा है। क्या विचित्र दृश्य हे इतना बड़ा धनुर्धर वीर परीक्षा की घड़ी मे रोने लगा। श्रीकृष्ण ने डांट पिलायी और गीता गायन शुरू कर दिया।अद्भुत गीता गाया प्रभु ने। उन्होंने चुप कराया डांटा और फटकार भी लगाई। पर अर्जुन टस से मस नहीं हुआ। अंत मे शुरु से समझाया। जब ईश्वर समझाने लगता हो तो बड़े बड़ो की हेकड़ी नहीं रहती।

रोना गाना जीवन भर चलता रहेगा। जन्म से रोना शुरु हुआ अंत मे रुला कर जाएगा। प्रभु ने जब भी अवतार लिए मुस्कराते हुए आए। रामावतार में मां के कहने पर रोये।”सुनि वचन सुजाना रोदन ठाना।”श्री कृष्ण ने वह भी नहीं किया। जेल मे चुप चुप चलता है। रोने पर तो पहरे दार से लेकर कंस तक सभी भागे आते। सारा ब्रज मंडल चौंक कर जाग जाता। इसलिए संसार मे आकर श्रीकृष्ण बिल्कुल नहीं रोये।जसोदा के घर पहुंच कर भी नहीं। खेलते रहे कि मैया जाग गई। मतलब यह स़सार क्रीड़ा भूमि है‌। यहां युद्ध भी एक तरह का खेल है। यहां योगी की तरह जियो और मस्त रहो।

बात होरही थी, महाभारत की कुरुक्षेत्र के मैदान मे कौरव और पांडवों की अट्ठारह अक्षौहिणी सेनाये युद्ध के लिए तैयार खड़ी हैं। पांडवो मे अर्जुन महान धनुर्धर हे,पर लडा़ई के मैदान मे उस पर हताशा छागई। नहीं लड़ूंगा कह कर रथ के पिछले हिस्से मे जाकर बैठ गया‌। तब श्रीकृष्ण ने समझाना शुरु किया। पहली कड़ी बात कही.. ….”कुतस्त्वा कश्मल मिदं विषमे समुपस्थितम्। अनार्य जुष्टम् अस्वर्ग्यम् अकीर्तिं कर मर्जुनम।।” युद्धभूमि मे आकर यह मलिनता, विषम काल मे यह अज्ञानता कैसे पैदा होरहा? यह तो आर्यो के द्वारा कभी नहीं किया गया है। यह आचरण न स्वर्ग देने वाला है न कीर्ति देने वाला है। नपुंसकता त्यागो! यह तुम्हारे जैसे वीर को शोभा नहीं देता। हे परंतप ! क्षुद्र हृदय की दुर्बलता त्याग कर लड़ने के लिए खड़े हो जाओ।

तब अर्जुनने फिर आंसू टपकाना शुरु किया। कहता है कि मेरे बुजुर्ग भीष्म और गुरु द्रोणाचार्य सामने खड़े हे, कैसे उनके खिलाफ वाण उठाउंगा?गुरुजनों को मारना अपराध है। भीख मांग कर खा लेना अच्छा है, पर इन पर अस्त्र शस्त्र उठाना किस लिए?? रुधिर सने भूमि भोग मुझे नहीं चाहिए। इन्हें मार कर जीतेंगे या हारेंगे नहीं जानता। लेकिन अपराध तो निश्चित ही होजाएगा। हमारी समझ मे नहीं आरहा मुझे क्या करना उचित है ?मन मे उलटे ख्याल आरहे हैं ,बुद्धि मे भ्रम होरहा। मै आपका शिष्य हूं मुझे बताईये मै क्या करू?

यह परिस्थिति सबके जीवन में एक न एक दिन जरुर आती है। जब वह किंकर्तव्य विमूढ़ होजाता है। जब धर्म और अधर्म के अंतर्द्वंद मे अपना कर्तव्य नहीं समझ मे आता है‌। अर्जुन इसी भ्रम का शिकार हुआ। कहता है अब आप निर्णय करिये… आप ही गुरु बन कर मेरा दिशा निर्देशन करें। मै आपका शिष्य हूं। मेरी इंद्रियां काम नही कर रही मुख सूख रही है.. मेरा शोक दूर करिये। क्या करूं ?समझाईयै।

भगवान दोनो सेनाओ के बीच रथ रोक कर खड़े होगए और मुस्कराते हुए बोले…

अशोच्यानन्वशोचस्तं प्रज्ञावादांश्च भाषसे।

गतासूनु गतासूंश्च नानु शोचंति पंडिता:।।

जिनका शोक नही करना चाहिए उनके लिए शोक करता है,बात ज्ञानियों जैसी बातें बोल रहा है। अरे जो जल्द मरने वाले है या मर चुके हैं उनके लिए बुद्धिमान पुरुष शोक नहीं करता।

नत्वेवाहं जातु नाशं नत्वं नेमे जनाधिपा:‌

न चैव न भविष्याम: सर्वे वयमत: परम्।

क्या समझ रहा है युद्ध से जन्मना मरना बंद होजाएगा? न तो ऐसा है कि यह आत्मा मर जायेगा। क्योकि आत्मा तो कभी मरता नहीं। ऐसा नही है किसी काल मे मैं नहीं हूं या तू नहीं है। अथवा ये राजा लोग नहीं है। ऐसा भी नही है कि इसके बाद कभी होंगे नहीं। जैसे शरीर मे जीवात्मा की कुमारावस्था, युवावस्था,वृद्धावस्था होती है वैसे ही दूसरा शरीर मिल जाता है। इसमे मोह कैसा? यह तो सिर्फ कपड़े बदलना जैसा है। उन्होंने और स्पष्ट किया- अज्ञानता के कारण ऐसा लगता है कि आत्मा की कुमार, युवा, जरावस्था होती है.. ऐसे ही अज्ञानता के कारण इस सूक्ष्म शरीर का आवरण है यह स्थूल शरीर इसका दूसरा शरीर मिलना अज्ञानता से आत्मा मे होता हुआ लगता है‌ पर वास्तव मे ऐसा है नही़। आत्मा निर्विकार है.. अच्छेद्य है, अभेद्य है ,नित्य है ,निरंजन है। दुख -सुख ,सर्दी -गर्मी देने वाले इंद्रिय और विषयों के संयोग क्षणभंगुर हैं.. अनित्य है।

इनको तू सहन कर। दुख -सुख को समान समझने वालै जिस धीर पुरुष को इंद्रियो के विषय व्याकुल नही करते वास्तव में वही मोक्ष के लिए योग्य होता है। तत्वज्ञानी यह जानता है कि असत का अस्तित्व नही और सत् वस्तु का कभी अभाव नहीं होता। इस न्याय से यह जान ले..

अविनाशि तुतद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम।

विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चितकर्तु मर्हसि।१७। २।

अर्थात, नाशरहित तो उसे जान जिससे यह जगत व्याप्त है, इस अविनाशी का विनाश करने मे कोई सक्षम नही है।

अंतवंत इमे देहानित्यस्योक्ता: शरीरिण:।

अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युधृयस्व भारत।।१८।२।

इस नाश रहित अप्रमेय नित्य स्वरुप जीवात्मा के ये सब शरीर नाशवान कहे गए है,इसलिए हे भरत वंशी अर्जुन तू युद्ध कर!
इसके बाद श्रीकृष्ण ने आत्मा की अजरता और अमरता पर विस्तार से चर्चा की। पूरा आत्म ज्ञान दिया- आत्मा न मरता है न मारा जाता है.. जो इसे मरनै या मारने वाला सभझ रहे दोनो अज्ञानी है। यह आत्मा किसी काल मे न जन्मता है और न मरता है आदि आदि। इस तरह गीता के अध्याय दो सांख्य योग मे ही आगे स्थित -प्रज्ञ का लक्षण बताया है‌। और यह बताया स्थित प्रज्ञ पुरुष किस तरह सब कुछ करते हुए भी अकर्ता है ,कभी मोहित नही होता और ब्रह्मानंद को ही सदा प्राप्त होजाता है‌। किंतु अर्जुन का समाधान अभी नहीं होता कहता है कि यदि कर्म से ज्ञान श्रेष्ठ है तो मुझे इस घोर कर्म मे क्यो लगाते हैं.. तब श्रीकृष्ण ‘कर्मयोग’नामक तीसरा अध्याय शुरु करते हैं।

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