कुण्डली में ग्रहों की स्थिति और उनपर ग्रहों की दृष्टि तय करती है उम्र की सीमा,

जयपुर से राजेंद्र गुप्ता


भले ही जीवन में कितनी भी मुश्किलें क्यों न हों पर मरना कोई नहीं चाहता सभी लम्बी उम्र चाहते हैं। यह गलत भी तो नहीं है इस संसार की माया ही कुछ ऐसी है। सर्व प्रथम तो दीर्घायु, माध्यमायु और अल्पायु का योग जानते हैं? ज्योतिष शास्त्र में 33 वर्ष से 66 वर्ष की आयु को मध्यम आयु कहा गया है। 66 वर्ष से 99 वर्ष तक की आयु को दीर्घायु वहीँ 32 वर्ष की आयु को अल्पायु कहा गया है। हमारे आचार्यों ने बालारिष्ट की अवधि 16 वर्ष तक मानी है और उसके बाद अल्पायु 32 वर्षों तक को कहा है अतः अल्पायु न्यूनतम 16 वर्ष और अधिकतम 32 वर्ष मनना चाहिए।

कुंडली में दीर्घायु योग

जिस व्यक्ति की जन्मकुंडली में केंद्र स्थानों में शुभ ग्रह हों, लग्नेश शुभ ग्रहों के साथ हो तथा उस पर गुरु की दृष्टि हो तो व्यक्ति दीर्घायु होता है।

शुभ ग्रह षष्ठ, सप्तम एवं अष्टम स्थान में हों तथा पाप ग्रह तृतीय, षष्ठ एवं एकादश स्थान में हों तो इस योग में उत्तपन व्यक्ति की दीर्घ आयु होती है।

उच्च राशि में स्थित ग्रह के साथ शनि या अष्टमेश हों तो व्यक्ति दीर्घायु होता है।

लग्नेश केंद्र स्थान में गुरु और शुक्र के साथ हो अथवा केंद्र में स्थित लग्नेश पर गुरु और शुक्र की दृष्टि हो तो भी व्यक्ति की आयु लम्बी होती है।

पाप ग्रह तृतीय, षष्ठ एवं एकादश स्थान में हों, शुभ ग्रह केंद्र-त्रिकोण में हो तथा लग्नेश बलवान् हो तो मनुष्य की पूर्ण आयु होती है।

लग्न में द्वीस्वभाव राशि हो लग्नेश केंद्र में हो अथवा वह अपनी उच्च राशि, मूलत्रिकोण राशि या मित्र राशि में हो तो व्यक्ति की आयु लम्बी होती है।

अष्टमेश जिस जिस भाव में हो उसका स्वामी जिस राशि में हो उस राशि का स्वामी लग्नेश के साथ केंद्र में हो तो भी मनुष्य की आयु लम्बी होती है।

द्विस्वभाव लग्न में जन्म हो तथा लग्नेश से केंद्र में दो या दो से अधिक पाप ग्रह हों तो भी व्यक्ति की आयु दीर्घ होती है।

 

कुंडली में मध्यमायु के योग…

शुभ ग्रह केंद्र या त्रिकोण स्थान में हों तथा बलवान् शनि षष्ठ या अष्टम स्थान में हो तो व्यक्ति की मध्यमायु होती है।

लग्नेश निर्बल हो, केंद्र या त्रिकोण में वृहस्पति हो और षष्ठ, अष्टम या व्यय स्थान में पाप ग्रह हों तो व्यक्ति की मध्यमायु होती है।

लग्नेश भाग्येश के साथ हो, पंचमेश पर गुरु की दृष्टि हो तथा कर्मेश केंद्र में उच्च राशि में हो तो इस योग में उत्त्पन्न जातक मध्यम आयु का होता है।

शनि चतुर्थ या एकादश स्थान में हो और अष्टमेश केंद्र में हो तो व्यक्ति मध्यमायु होता है।

कुंडली में पाप ग्रह दशम स्थान और दशमेश पंचमेश के साथ हो तो व्यक्ति की मध्यमायु होती है।

चंद्र राशिपति पाप ग्रह के साथ अष्टम स्थान में हो, लग्नेश पापग्रहों के साथ षष्ठ स्थान में हो तथा बलवान् हो और शुभ ग्रहों की उसपर दृष्टि न हो तो मनुष्य की 45 वर्ष की आयु होती है।

अष्टमेश केंद्र में, मंगल लग्न में तथा बृहस्पति 3, 6, 11वें स्थान में हो तो व्यक्ति की आयु 44 वर्ष की होती है

शनि चतुर्थ या एकादश स्थान में हो और अष्टमेश केंद्र में हो तो व्यक्ति की मध्यमायु होती है।

लग्न में चंद्रमा वर्गोत्तम नवांश में हो, उसपर पाप ग्रहों की दृष्टि हो तथा शुभ ग्रह निर्बल हों तो व्यक्ति की आयु 45 वर्ष के करीब होती है।

लग्नेश अष्टम स्थान की राशि के नवांश में तथा अष्टमेश लग्न की राशि के नवांश में पाप ग्रह के साथ हो व्यक्ति की आयु 50 वर्षों की होती है।

 

कुंडली में अल्पायु योग…

लग्नेश एवं अष्टमेश पाप ग्रह हों, वे एकदूसरे की राशि में हों या 12वें या 6ठे स्थान में हो और गुरु के साथ न हों तो 18 वर्ष की उम्र होती है।

कर्क नवांश में शनि हो और उसपर गुरु की दृष्टि हो तो व्यक्ति की आयु 32 वर्ष की होती है।

मिथुन के नवांश में स्थित शनि को लग्नेश देखता हो तो 17 वर्ष की आयु होती है।

कर्क लग्न में गुरु के साथ सूर्य हो तथा अष्टमेश केंद्र में हो 22 वर्ष की आयु कही गई है।

केंद्र में पाप ग्रह हों और उन्हें चंद्रमा या शुभ ग्रह न देखते हों तो व्यक्ति की आयु 20 वर्षों की होती है।

गुरु के नवांश में स्थित शनि पर राहु की दृष्टि हो तथा उच्च राशि में स्थित लग्नेश को शुभ ग्रह न देखते हों तो जातक की आयु 19 वर्षों की होती है।

चंद्रमा का शनि से संबंध हो तथा सूर्य अष्टम स्थान में स्थित हो तो जातक की आयु सर 29 वर्षों की होती है।

द्वितीय एवं द्वादश में पाप ग्रह हों तथा उनपर शुभ ग्रहों की दृष्टि न हो तो व्यक्ति अल्पायु होता है।

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