
- अधिकांशतः नारी अपने आप की, नही किसी के बाप की
- मोबाइल की अश्लील हरकतें सामाजिक रिश्तों को मिटा नही रही हैं क्या?
विजय श्रीवास्तव
Lucknow: शोसल मीडिया के नंगे और भोंडेपन का सबसे ज्यादा बुरा असर भारतीय किशोरों व युवाओं पर पड़ रहा है लेकिन दुर्भाग्य यह है कि हमारे यहां इस पर अंकुश,अल्पीकरण या प्रतिबंध को छोड़िए,इसे और बढ़ावा ही मिल रहा है। भारत को इस बात पर पश्चताचाप करना चाहिए कि जो काम सबसे पहले भारत को करना चाहिए वह आस्ट्रेलिया ने कर दिखाया। आज जब शोसल मीडिया पूरी तरह फूहड़पन और नग्नता पर उतर आया है तब इस पर अंकुश की पहल हम भारत से इस लिए करते हैं कि यह सनातनियों का देश है और यहां की सभ्यता और संस्कृति दुनिया के बाकी देशों से अलहदा है। भारत की शिनाख्त दुनिया भर में सुसभ्य और तहजीबदार जीवन शैली की है। अफसोस कि शोसल मीडिया के अस्वीकार दृष्य़ और शब्द को हम सबसे ज्यादा स्वीकार करने वाले देशों में सुमार हो रहे हैं।
कोरोना काल में सबकुछ आन लाइन के नाम पर एंड्रायड मोबाइल सबसे ज्यादे किसी को आकर्षित किया तो वे हैं स्कूली छात्र और छात्राएं। छोटे बड़े सभी के हाथों में एंड्रायड मोबाइल फोन आ गया। युवा वर्ग में लड़के हों चाहे लड़कियां सभी के हाथ में मोबाइल एक स्टेटस बन गया। किशोरों और युवाओं के हाथ में मिला यह सौगात आज अभिशाप बन रहा है। वेशक इंटरनेट के जमाने में इसके बहुत सारे फायदे भी हैं लेकिन यह उस उम्र के लोगों पर लागू है जो फायदे और नुकसान को समझते हों। कहना न होगा कि आधुनिक जीवन शैली और स्टेटस सिंबल के रास्ते एंड्रायड मोबाइल हर घर में नहीं,हर हाथ की शोभा बढ़ा रहा है। यह एक नशा बन गया है। हाल यह है कि सुबह से लेकर रात सोने तक किशोर और युवाओं की आंखें उनके मोबाइल से चिपकी रहती है। जाहिर है वे उसमें न्यूटन का फार्मूला तो ढूंढ रहे नहीं होते,उसके स्क्रीन पर अश्लील और ब्लू फिल्में उन्हें मोबाइल से चिपके रहने को मजबूर किए रहती है।

कई बुद्धिजीवियों ने दबी जुबान से आगाह करते कहा समाज में जिसकी वहू ,वेटी य वेटा जब शुबह शाम छत पर जाकर घंटो परिवार से चोरी छुपे किसी से बात करते हैं तो परिवार के जिम्मेदार लोगों को समझ जाना चाहिए मामला किस तरफ जा रहा है,किसी की भी बहन वेटी एक दिन में अचानक नही खराब होती है? एक रिटायर्ड IPS कि मानें तो भारत में किशोरों और युवाओं में जरायम की दुनिया में कदम रखने के पीछे शोसल मीडिया है। यह किशोरों को अवसाद में भी लाता है। एंड्रायड फोन का सबसे बुरा असर किशोरों और अल्प व्यस्क बच्चों पर पड़ रहा है,वह चाहे मेल हों या फीमेल उनके अनुसार बढ़ते हुए बाल अपराध के पीछे कहीं न कहीं शोसल मीडिया पर परोसा जा रहा आपराधिक व हिंसा को बढ़ावा देने वाले शार्ट वीडियो है।
एक मनोविज्ञानी की मानें तो भारत में शोसल मीडिया के नंगेपन पर कोई सोच तक नहीं रहा है। देखें तो राजनीतिक दलों में अपने प्रतिद्वंदियों को ट्रोल करने की ऐसी होड़ मची है कि उनके IT सेल से ऐसी ऐसी मैनीपुलेटड वीडीयो अथवा कार्टून अपलोड किए जाते हैं जिसे देखा तक नहीं जाता लेकिन हमारे किशोर अथवा किशोरियों को उसे देखने से कौन रोके? मजे की बात यह है कि शोसल मीडिया पर परोसें जा रहे नंगापन का असर किशोर और किशोरियों पर पड़ रहा है,यह जानकारी इंस्टाग्राम को है। वह जानता है कि फेसबुक पर अपलोड हो रही अश्लील व पोर्न वीडियो किशोरों को बर्बाद कर रहा है। हैरानी है कि इंस्टाग्राम खुद ऐसे मामलों में पीछे नहीं है।

आस्ट्रेलिया अपने देश के भावी पीढ़ी को बर्बाद होने से बचाने के यह कदम उठाने जा रहा है। क्योंकि उसे अपने भावी कर्णधारों की चिंता है लेकिन हमें तो इसकी परवाह ही नहीं है। सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर तो की देशों ने बैन लगा रखा है। उनके कारण भले ही आस्ट्रेलिया से भिन्न हों लेकिन उनके किशोर व युवा अश्लीलता से बच तो रहे हैं। देखें तो इस मामले में चीन,उत्तर कोरिया,ईरान,कतर जैसे देश काफी सख्त हैं। चीन में तो विदेशी सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर पूरी तरह पाबंदी है। वहीं 2015 के बाद तीन में से एक देश सोशल मीडिया पर बैन लगा चुका है।
इसमें 62 देश शामिल हैं सोशल मीडिया के बढ़ते कुप्रभाव व अन्य कारणों से सेंशरसिप के मामलों में खासा बढ़ोत्तरी हुई है। एशिया के 48 देशों में से 27 देश सोशल मीडिया के कुप्रभाव को लेकर सतर्क हुए हैं। भारत में हाल इसके विपरीत है। चाय पान की छोटी दुकानें हों,ट्रेन हों बस हो कहीं भी हाथ में एंड्रायड फोन लिए लोग ऐसे रोमांचित होते हुए दिख रहे हैं जैसे उन्हें क्या मिल गया हो। मोबाइल के प्रति युवा वर्ग की लत देखने लायक होती। घर में बच्चे तो बिना मोबाइल लिए खाना तक मना कर देते हैं। मां बाप उनके समक्ष मजबूर व असहाय दिखते हैं लेकिन उसमें परोसें जा रहे अश्लील दृश्यों से परेशान भी होते हैं। क्योंकि उसे उनका बच्चा भी देख रहा होगा।
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चिंता इस बात की लेकर होती है कि वे अपने बच्चे को इस लत से बचाएं कैसे? ऐसे वक्त में उनकी वेवशी साफ झलकती है। माना कि एंड्रायड फोन अपरिहार्य है लेकिन ऐसा भी न हो कि यह हर हाथ में। शहर छोड़िए गांव की किशोरियां भी इसकी आदी हो गई हैं। परदेश कमाने गए तमाम लोग अपनी घरवाली से बात करने के लिए उसे एंड्रायड फोन थमा गए। अब यह उनके अल्प व्यस्क बच्चों के हाथ आ गया। जाने अनजाने कोई खराब दृष्य़ या शार्ट वीडियो उनके हाथ लग गया तो उसे वे बार बार देखना चाहेंगी।
निश्चित ही शुरू में वे ऐसे दृश्यों से अनजान होंगी लेकिन शीघ्र ही वे इसे देखने की आदी हो जाती हैं। धीरे धीरे एक वक्त ऐसा आता है कि वे अपना भला बुरा भूल कर वह राह धर लेती हैं जिस राह कोई भी मां बाप अपनी संतान को चलना नहीं देखना चाहेगा। कहना न होगा कि बच्चे की मोबाइल लत से अधिकांश मां बाप अवसाद में चले जाते हैं। वे क्या करें,कैसे अपने बच्चे को बचाएं इस चिंता से वे चिता तक चले जाते हैं। अब इस स्थित से उबारे कौन? जाहिर है इसके लिए सरकार ही कुछ कर सकती है। 2015 से भारत में 121 बार शोसल मीडिया पर बैन लगा है लेकिन सरकार ने सुरक्षा के नाम पर ऐसा की है। काश! ऐसी ही सुरक्षा वह अपने भावी कर्णधारों के बारे में सोचती तो क्या बात होती।
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