

वैधृति और चित्रा योग के चलते द्वितीया तिथि में करें मां की स्थापना
नवरात्र में माता रानी के स्वागत की तैयारी, हाथी पर सवार होकर आएंगी मां दुर्गा
Lucknow : शारदीय नवरात्र की शुरुआत के साथ ही घरों और मंदिरों में मां दुर्गा के स्वागत की तैयारियां तेज हो जाती हैं। नवरात्र के पहले दिन कलश स्थापना को विशेष महत्व दिया जाता है। हालांकि, इस बार प्रतिपदा तिथि में वैधृति और चित्रा योग की स्थिति को लेकर कलश स्थापना के शुभ मुहूर्त पर चर्चा हो रही है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इन योगों में कलश स्थापना से बचने की सलाह दी जाती है। ऐसे में कुछ पंचांग और धार्मिक व्याख्याओं के आधार पर द्वितीया तिथि में कलश स्थापना करने का विकल्प सुझाया जा रहा है।
वैधृति और चित्रा योग में कलश स्थापना को लेकर क्या है मान्यता?
धार्मिक मान्यताओं और पुराणों में पूजा-पाठ के लिए शुभ मुहूर्त का विशेष महत्व बताया गया है। प्रचलित मान्यता के अनुसार, वैधृति योग में कलश स्थापना को पुत्र के लिए प्रतिकूल माना गया है, जबकि चित्रा योग में स्थापना को धन हानि से जोड़कर देखा जाता है। इन मान्यताओं का उल्लेख भविष्य पुराण के संदर्भ में भी किया जाता है। बताया जा रहा है कि संबंधित पंचांग के अनुसार प्रतिपदा तिथि में वैधृति और चित्रा योग दोनों की स्थिति बन रही है। ऐसी स्थिति में मुहूर्त के निर्धारण को लेकर विशेष सावधानी बरतने की बात कही जा रही है।

प्रतिपादि च वैधृत्यादियोगनिषैधो मार्गवार्चनदीपिकाम, देवीपुराणे-स्वाष्ट्रवैधृतियुक्ता चेत्प्रति चंडिकार्चने। तयोरन्ते विधातव्यं कलशारोपणं गृहे।
प्रतिपदा में वैधृति योग को निषेध माना गया है। इस योग में कलश स्थापना करने से पुत्र हानि, पुत्र को कष्ट आदि जैसी परेशानियां खड़ी हो सकती हैं। इसलिए देवी की आराधना के लिए शुरू हो रहे नवरात्र में यदि वैधृति योग आ जाए तो देवी कलश की स्थापना अगले दिन की जानी चाहिए। भविष्य पुराण के अनुसार चित्रा तथा वैधृति से सम्पूर्ण प्रतिपदा हो तो शुरू के दिन अंश त्यागकर चौथे अंश में कलश एवं देवी स्थापना किया जा सकता है। लेकिन चौथा अंश बिल्कुल गोधूलि बेला के आसपास है, इसलिए उसे भी त्याग देना उचित माना जाएगा।
चित्रावेधृति सम्पूर्णा प्रतिपच्चेन्द्रवेन्नृप। त्याज्याद्यशास्त्रयस्तवाद्या स्तुरीयांशे तु पूजनम्।
वहीं रूद्रयामल में कहा गया है कि यदि वैधृति में कलश स्थापना करेंगे तो पुत्र का नाश होता है और चित्रा में धन का नाश होता है। चूंकि आज प्रतिपदा के दिन ये दोनों ही योग हैं इसलिए प्रथमा के दिन माता की स्थापना करने से अच्छा है द्वितीया के दिन कलश और देवी की स्थापना करें।
वैधृतो पुत्रनाशः स्याच्चित्रायां धननाशनम्।
चौथे चरण में स्थापना का विकल्प, लेकिन सूर्यास्त का भी सवाल
धार्मिक व्याख्याओं के अनुसार यदि वैधृति और चित्रा योग दोनों हों तो चौथे चरण में कलश स्थापना का विकल्प बताया जाता है। उपलब्ध समय-विवरण के मुताबिक, चौथे चरण की शुरुआत शाम करीब 5:30 बजे के बाद और समाप्ति रात 9:32 बजे के आसपास बताई गई है। वहीं सूर्यास्त का समय शाम 5:56 बजे बताया जा रहा है। वहीं मत्स्य पुराण के अनुसार सायंकाल या रात्रि में कलश की स्थापना निषेध बताया गया है। इसके लिए एक सूत्र भी बताया गया है।
इदं कलशस्थापनं रात्रों न कार्यम। न रात्रौं स्थापनं कार्य न च कुम्भाभिषेचनम्।
ऐसे में सूर्यास्त के आसपास के समय और रात्रि में कलश स्थापना को लेकर भी सवाल उठते हैं। कुछ धार्मिक मान्यताओं में रात्रि के समय कलश या कुंभ स्थापना से बचने की बात कही गई है। इसी वजह से द्वितीया तिथि में कलश स्थापना करने का सुझाव दिया जा रहा है।
हाथी पर सवार होकर आएंगी मां दुर्गा
शारदीय नवरात्र में मां दुर्गा के आगमन के वाहन को लेकर भी श्रद्धालुओं में उत्सुकता रहती है। प्रचलित धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस बार देवी का आगमन हाथी पर बताया जा रहा है। हाथी को समृद्धि, ऐश्वर्य, स्थिरता और शुभता का प्रतीक माना जाता है। इसी आधार पर मां दुर्गा के गज पर आगमन को सुख-समृद्धि और खुशहाली से जोड़कर देखा जाता है। धार्मिक मान्यताओं में देवी के वाहन को केवल पूजा की परंपरा ही नहीं, बल्कि प्रकृति, कृषि, जनजीवन और सामाजिक परिस्थितियों से जुड़े प्रतीकात्मक संकेतों के रूप में भी समझा जाता है। हाथी पर मां दुर्गा के आगमन को लेकर भक्तों में यह आशा रहती है कि देवी की कृपा से परिवारों में सुख-शांति और समृद्धि बनी रहे।
क्या देश-दुनिया और राशियों पर पड़ेगा शुभ प्रभाव?
मां दुर्गा के वाहन को लेकर प्रचलित मान्यताओं के आधार पर देश-दुनिया और जनजीवन के संबंध में अलग-अलग ज्योतिषीय व्याख्याएं की जाती हैं। हाथी को शुभता और संपन्नता का प्रतीक मानने के कारण इसे सकारात्मक संकेत के रूप में देखा जाता है। हालांकि, देश की परिस्थितियों, प्राकृतिक घटनाओं या अलग-अलग राशियों पर निश्चित प्रभाव पड़ने का दावा केवल धार्मिक मान्यता के आधार पर नहीं किया जा सकता। नवरात्र का मुख्य संदेश शक्ति, भक्ति, संयम और सकारात्मकता से जुड़ा है। ऐसे में श्रद्धालु शुभ मुहूर्त में विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर मां दुर्गा का आशीर्वाद प्राप्त करने की कामना करते हैं।
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