बुलडोजर बाबा के गढ़ गोरखपुर में बिश्नोई गैंग की दस्तक?

 -राजीव तिवारी बाबा

Gorakhpur : माफियाओं के खिलाफ सख्त कार्रवाई और बुलडोजर एक्शन के लिए देशभर में चर्चा में रहे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गढ़ गोरखपुर में अब देश के चर्चित संगठित अपराधी नेटवर्क लॉरेंस बिश्नोई गैंग के कथित असलहा नेटवर्क की दस्तक ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। गोरखपुर में उत्तर प्रदेश एसटीएफ की कार्रवाई में पांच संदिग्ध असलहा तस्करों की गिरफ्तारी और हथियारों की बरामदगी के बाद जांच की जो कड़ियां सामने आ रही हैं, वे स्थानीय अवैध हथियार कारोबार से कहीं आगे जाती दिखाई दे रही हैं। हालांकि बिश्नोई गैंग से इन कड़ियों के वास्तविक संबंध की पुष्टि जांच पूरी होने के बाद ही हो सकेगी।

14 सितंबर की रात गोरखपुर के विंध्यवासिनी पार्क के आसपास STF ने पांच लोगों को गिरफ्तार किया। इनके पास से चार .32 बोर पिस्टल, चार मैगजीन, एक .32 बोर रिवॉल्वर और पांच कारतूस बरामद किए गए। लेकिन असली कहानी हथियारों की इस बरामदगी के बाद शुरू हुई। एसटीएफ की पूछताछ में मध्य प्रदेश के बड़वानी जिले के सेंधवा और हरियाणा के सोनीपत से हथियार लाकर गोरखपुर और पूर्वांचल में खपाने वाले अंतरराज्यीय नेटवर्क के संकेत मिले। एसटीएफ के अनुसार इस नेटवर्क के जरिए पूर्वांचल में करीब 100 से 150 अवैध पिस्टल पहुंचाई जा चुकी हैं।

मामले को इसलिए गंभीर माना जा रहा है क्योंकि जांच में सोशल मीडिया, खासकर इंस्टाग्राम, के इस्तेमाल की बात सामने आई है। आरोप है कि फर्जी ID बनाकर संभावित ग्राहकों तक पहुंच बनाई जाती थी और फिर हथियारों की कीमत, आपूर्ति और भुगतान की व्यवस्था तय होती थी। यानी अपराध का पारंपरिक नेटवर्क अब सोशल मीडिया की आभासी दुनिया से जुड़ चुका था।

STF के मुताबिक हथियारों की सप्लाई का स्रोत मध्य प्रदेश और हरियाणा तक फैला था। सेंधवा से आने वाली पिस्टलें गोरखपुर पहुंचती थीं और यहां से गोरखपुर, कुशीनगर, देवरिया, महराजगंज, संतकबीरनगर समेत पूर्वांचल के दूसरे इलाकों में भेजी जाती थीं। प्रति पिस्टल हजारों रुपये का मुनाफा कमाए जाने की बात भी जांच में सामने आई है।

लेकिन इस पूरे मामले का सबसे संवेदनशील पहलू है लॉरेंस बिश्नोई और अनमोल बिश्नोई गैंग से कथित कनेक्शन। एसटीएफ के अनुसार पश्चिमी चंपारण निवासी शशांक पांडेय इस नेटवर्क की महत्वपूर्ण कड़ी है। पुलिस का कहना है कि शशांक का बिश्नोई गैंग से संबंध रहा है और वह पंजाब में हथियार सप्लाई के मामले में जेल भी जा चुका है। गिरफ्तार श्रेयांश यादव उर्फ बबलू के साथ उसके पुराने संबंध और असलहा नेटवर्क में उसकी भूमिका की भी जांच की जा रही है। श्रेयांश के कथित संपर्क गोल्डी बराड़ और रोहित गोदारा से होने की बात भी एसटीएफ ने कही है, हालांकि इन संपर्कों की प्रकृति और वास्तविकता जांच का विषय है।

मामला कितना बड़ा हो सकता है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 17 सितंबर की रिपोर्टों के मुताबिक एसटीएफ ने इस मामले में 31 लोगों को आरोपी बनाया है। पांच गिरफ्तार हो चुके हैं और 26 अन्य की तलाश में उत्तर प्रदेश के अलावा बिहार, मध्य प्रदेश और हरियाणा में भी टीमें दबिश दे रही हैं।

यही वह बिंदु है जहां गोरखपुर की कहानी महज अवैध हथियारों की बरामदगी का मामला नहीं रह जाती। सवाल यह है कि क्या गोरखपुर को पूर्वांचल में हथियार पहुंचाने के लिए सिर्फ एक स्थानीय ट्रांजिट प्वाइंट के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा था या फिर यहां किसी बड़े संगठित अपराध नेटवर्क ने अपनी जड़ें जमाने की कोशिश की?

STF ने गोरखनाथ क्षेत्र के राजकुमार चौहान हत्याकांड में इस्तेमाल हुए हथियार को भी इसी नेटवर्क से जोड़कर देखा है। साथ ही पूर्व में कैंपियरगंज और संतकबीरनगर में बरामद हथियारों के स्रोत की भी पड़ताल की जा रही है। यदि जांच में ये कड़ियां पुष्ट होती हैं तो मामला कुछ हथियार तस्करों की गिरफ्तारी से बढ़कर पूर्वांचल में संगठित अपराध के नेटवर्क की पड़ताल का बन सकता है।

विडंबना यह है कि जिस गोरखपुर को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सख्त कानून-व्यवस्था वाली राजनीति का प्रतीक माना जाता है, उसी गोरखपुर में अब एक ऐसे नेटवर्क की जांच हो रही है जिसके तार देश के चर्चित आपराधिक गिरोहों तक पहुंचने का दावा किया जा रहा है। यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि बिश्नोई गैंग ने गोरखपुर में अपना संगठित ठिकाना बना लिया है। लेकिन इतना जरूर है कि STF की मौजूदा जांच ने इस संभावना को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

अब असली परीक्षा केवल गिरफ्तार पांच लोगों तक सीमित नहीं है। जांच को यह साबित करना होगा कि हथियार कहां से आए, किसने मंगाए, किन लोगों तक पहुंचे, किन वारदातों में इस्तेमाल हुए और बिश्नोई गैंग से बताए जा रहे संपर्क वास्तव में कितने गहरे थे।

क्योंकि यदि 100 से 150 पिस्टल पूर्वांचल के विभिन्न जिलों में पहुंचने का एसटीएफ का दावा जांच में सही साबित होता है, तो सवाल सिर्फ यह नहीं होगा कि गोरखपुर में अवैध असलहों का कारोबार कितना बड़ा था। बड़ा सवाल यह होगा कि योगी के गढ़ में अपराध के खिलाफ चलाए जा रहे सख्त अभियान के बीच संगठित अपराध ने किस रास्ते से अपनी जगह बनाने की कोशिश की।

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