Hartalika Teej: मां पार्वती जी ने भगवान शंकर को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठिन तपस्या की थी। इसी उपलक्ष्य में महिलाएं यह व्रत करती हैं। इस बार यह व्रत 13 सितंबर को सुबह 07:08 बजे से माना जाएगा। 14 सितंबर को तृतीया तिथि का समापन सुबह 7.06 बजे होगा।
पूजा के शुभ मुहूर्त
प्रातःकाल उठकर सुबह 6.05 से 7.06 बजे तक पूजन कर लेना चाहिए। प्रदोष काल में शाम के समय 6.28 बजे के बाद पूजन करना चाहिए।
हरतालिका तीज व्रत कथा की पौराणिक कहानी
शिवपुराण के अनुसार, स्वयं भगवान शिव ने माता पार्वती को उनके पूर्व जन्म का स्मरण कराने के लिए यह कथा सुनाई थी। माता पार्वती अपने बाल्यकाल से ही भगवान शिव को पति के रूप में पाना चाहती थीं। इसके लिए उन्होंने हिमालय राज के घर जन्म लिया और गंगा तट पर अन्न-जल का त्याग कर हजारों वर्षों तक अत्यंत कठिन तपस्या की। माता पार्वती की यह दशा देखकर उनके पिता हिमालय बेहद दुखी थे। इसी बीच देवर्षि नारद वहां पहुंचे और हिमालय राज से कहा कि भगवान विष्णु माता पार्वती से विवाह करना चाहते हैं।
हिमालय राज इस प्रस्ताव से अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने विवाह की स्वीकृति दे दी। लेकिन जब माता पार्वती को पता चला कि उनके पिता उनका विवाह भगवान विष्णु से तय कर चुके हैं, तो वे अत्यंत दुखी हुईं और अपनी एक प्रिय सखी से अपने मन की बात कही। माता पार्वती के दुःख को दूर करने के लिए उनकी सखी उनका ‘हरण’ (अपहरण) करके उन्हें एक घने जंगल की गुप्त गुफा में ले गई। सखी द्वारा हरी जाने के कारण ही इस व्रत का नाम ‘हरतालिका’ पड़ा।
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शिव जी का प्रकट होना
भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि के दिन हस्त नक्षत्र में माता पार्वती ने रेत (बालू) से शिवलिंग का निर्माण किया और निराहार-निर्जला रहकर रात्रि जागरण करते हुए शिव जी की स्तुति की। उनकी इस घोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए और उन्होंने माता पार्वती को पत्नी के रूप में स्वीकार करने का वरदान दिया। बाद में पिता हिमालय राज भी पार्वती जी की भक्ति देखकर मान गए और विधि-विधान से शिव-पार्वती का विवाह संपन्न हुआ।
तीज व्रत की पूजा विधि
यह व्रत पूर्णतः निर्जला और निराहार (बिना अन्न और जल के) रखा जाता है।

सुबह की तैयारी और संकल्प
प्रात:काल जल्दी उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ या नए वस्त्र (लाल, पीले या हरे रंग के) धारण करें। काले कपड़ों के प्रयोग से बचें। हाथ में जल और पुष्प लेकर व्रत का संकल्प लें। शाम के समय (प्रदोष काल में) पूजा के स्थान को साफ करके वहां एक सुंदर मंडप या फूलों से चौकी सजाएं।चौकी पर साफ कपड़ा बिछाकर पवित्र काली मिट्टी या बालू (रेत) से भगवान शिव, माता पार्वती और भगवान गणेश की प्रतिमाएं बनाएं।
मुख्य पूजन (प्रदोष काल पूजा)
गणेश पूजन: सबसे पहले भगवान गणेश को तिलक लगाएं, दूर्वा, और फल-फूल अर्पित करके उनकी पूजा करें। इसके बाद भगवान शिव को चंदन का तिलक लगाएं और माता पार्वती को कुमकुम-रोली लगाएं। शिव जी को बेलपत्र, धतूरा, शमी पत्र, आक के फूल और वस्त्र (धोती-अंगोछा) चढ़ाएं। माता पार्वती को 16 श्रृंगार की सामग्री (जैसे सिंदूर, बिंदी, चूड़ियां, मेहंदी, महावर, बिछिया आदि) अर्पित करें। भगवान को फल, मिठाई और विशेष रूप से भीगे हुए काले चने का भोग लगाएं।
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कथा, आरती और रात्रि जागरण
हाथ में चावल या चने के दाने लेकर हरतालिका तीज व्रत की कथा पढ़ें या सुनें। कथा समाप्त होने पर वे दाने भगवान के चरणों में अर्पित कर दें। सबसे पहले गणेश जी को, फिर भगवान शिव और माता पार्वती की आरती करें। नियम के अनुसार, इस व्रत में चारों पहर की पूजा की जाती है और रात भर सोए बिना भजन-कीर्तन करते हुए रात्रि जागरण किया जाता है।
पारण और व्रत की समाप्ति
अगले दिन सुबह आखिरी पहर की पूजा के बाद माता पार्वती को सिंदूर लगाएं और उनसे अपने पल्लू में सुहाग लें। मिट्टी की मूर्तियों को विसर्जित करने के बाद, सुहाग की सामग्री और दान की वस्तुएं किसी ब्राह्मण या सुहागिन महिला को आदर सहित दान करें। इसके बाद प्रसाद (जैसे खीरा या मिठाई) ग्रहण करके अपने व्रत का पारण (व्रत खोलें) करें।
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