23 को नहीं 24 अगस्त को व्रत रखेंगे वैष्णव, कल है पुत्रदा एकादशी

देवकीनंदन ठाकुर जैसे कई बड़े कथावाचकों ने भी कहा, कल है एकादशी

48 दंड से ऊपर की एकादशी का नहीं करना चाहिए व्रत

पारण के लिए भी सही मुहूर्त का ध्यान रखें, कुछ न मिले तो तुलसी दल से तोड़ दें व्रत

आचार्य प्रदीप तिवारी

Putrada Ekadashi : कैलेंडर और पंचांग में देखी गई तिथि के अनुसार 23 अगस्त 2026, रविवार को श्रावण शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि है। कई सम्प्रदायों में इस दिन पुत्रदा एकादशी यानी पवित्रा एकादशी का व्रत रखा जाएगा। लेकिन वैष्णव परम्परा मानने वालों के लिए आज का एकादशी व्रत त्याज्य है। यही व्रत हस्तिनापुर की महारानी गांधारी ने किया था, जिससे उनके सौ पुत्रों का क्षय हो गया था। इसलिए कई पुराणों ने इस व्रत को न करने का विधान बताया है।

पंचांग के अनुसार एकादशी तिथि 24 अगस्त की तड़के चार बजकर 18 मिनट तक रहेगी। इसके बाद द्वादशी तिथि शुरू होगी। पंचांग गणना में इस दिन चंद्रमा धनु राशि में रहेगा और मूल नक्षत्र शाम पांच बजकर 45 मिनट तक रहेगा। एकादशी व्रत को लेकर इस बार 23 और 24 अगस्त की तारीख को लेकर असमंजस है। स्मार्त परम्परा में व्रत 23 अगस्त को है, जबकि वैष्णव परंपरा में 24 अगस्त को एकादशी व्रत रखा जाएगा। अब आपको तय करना है कि एकादशी व्रत कब करना है।

पुराणों के अनुसार 48 दंड से ऊपर की एकादशी को त्याग देना चाहिए। कई पुराणों में मिलता है कि 52 दंड के नीचे की एकादशी का व्रत कर लेना चाहिए। लेकिन आज की एकादशी 56 दंड के ऊपर की है, यानी किसी भी तरह से व्रत रखने योग्य नहीं है। एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा, तुलसी अर्पित करना, विष्णु मंत्र का जाप, एकादशी व्रत कथा सुनना और जरूरतमंदों को दान करना शुभ माना जाता है।
कब है पुत्रदा एकादशी का पारण?

23 अगस्त को शैव परम्परा से एकादशी व्रत रखने वाले 24 अगस्त को द्वादशी तिथि में व्रत का पारण करेंगे। पंचांग गणना के अनुसार 24 अगस्त को हरिवासर सुबह 10 बजकर 49 मिनट पर समाप्त होगा। इसके बाद दोपहर एक बजकर 41 मिनट से शाम चार बजकर 16 मिनट तक पारण किया जा सकता है। वहीं 24 अगस्त को व्रत रखने वाले साधक 25 अगस्त यानी मंगलवार को सुबह साढ़े पाँच बजे से लेकर 8.49 बजे तक पारण कर सकते हैं। एक चीज़ ध्यान रखें, किसी भी क़ीमत पर पारण के मुहूर्त का त्याग न करें। यदि सुबह पारण का भोजन न तैयार हो तो केवल तुलसी दल से व्रत को पूर्ण कर लेना चाहिए।

एकादशी में एक अन्न का त्याग जरूरी

वैष्णव परम्परा के अनुसार 12 वर्ष से लेकर 80 वर्ष तक के सभी लोगों को एकादशी व्रत रखना चाहिए। लेकिन यदि आप किसी भी कारणवश यह व्रत नहीं रखते हैं तो एक अन्न का त्याग कर दीजिए। यानी कुल मिलाकर केवल और केवल एक अन्न का ही भोजन कीजिए, इससे आपको एकादशी का पुण्य भी मिलेगा और पाप से छुटकारा भी। पुराणों के अनुसार एकादशी के दिन अन्न में पाप हो जाता है। पुण्य न कर पाएं तो पाप न करें। इसीलिए इस दिन अन्न का दान नहीं किया जाता है और एक अन्न खाने की परम्परा चल पड़ी है। ख़ासकर उन्हें चावल का त्याग कर देना चाहिए। चावल जिसे पूजा पद्धति में अक्षत कहा जाता है, उसका सेवन नहीं करना चाहिए, क्योंकि सभी जानते हैं कि भगवान विष्णु को अक्षत, पीला पुष्प और तुलसी पत्र विशेष रूप से प्रिय है।

एक है विशेष कथा

एक दंत कथा के अनुसार एक राजा थे। उन्होंने राजाज्ञा घोषित कर दी थी कि हर कोई एकादशी का व्रत करेगा। यानी कि एकादशी के घर किसी के घर चूल्हा नहीं जलेगा। उनके नगर में एक रिश्तेदार आया। वह यात्रा से आने के कारण पहले से ही भूखा था। अब राजाज्ञा के कारण रिश्तेदार के वहां भी खाने को नहीं मिला। न खाने-पीने के कारण उसकी मृत्यु हो गई। फिर वो प्रेत हुआ। राजा के पास लोग गुहार लेकर पहुंचे और कहा कि यह संकट आपकी आज्ञा के कारण हुआ। परेशान राजा को एक बड़े ऋषि ने प्रेतमोचनी एकादशी का व्रत सभी को कराया। व्रत के प्रभाव से प्रेत को मुक्ति मिल गई। कहा जाता है तभी से एकादशी के दिन एक अन्न का त्याग की परम्परा चल पड़ी है।

एकादशी का महात्म्य

जब भगवान कृष्ण महल में जामवंती को लेकर आए तो सभी को उन्हें देखने की उत्कंठा हुई। श्री हरि भगवान कृष्ण ने जामवंती से कहा कि अगर रुक्मणी तुम्हें देखने को कहे तो कहना कि मुँह दिखाई में आप मुझे अपने एक कामिनी एकादशी व्रत का पुण्य दे दीजिए। कुछ देर में रुक्मिणी पहुंची तो जामवंती ने भगवान के कहे अनुसार उनसे एकादशी का पुण्य मांगा। जैसे ही वो पुण्य उनके पास आया तो वो दिव्य सुंदरी हो गईं। भालू के रूप से बदलकर सुंदर स्त्री बन जाने जैसा पुण्य एकादशी के व्रत से ही मिलता है।

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