पश्चिमी यूपी में मायावती पुराने सपने और नई रणनीति के साथ

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संजय सक्सेना

बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष व पूर्व मुख्यमंत्री मायावती का जेवर के नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट के पहले चरण के उद्घाटन के बहाने पश्चिमी उत्तर प्रदेश को अलग राज्य और उसके लिए हाईकोर्ट की अलग बेंच बनाने की मांग फिर से उठाना केवल एक भावुक नारा नहीं है, बल्कि एक लंबी चली आ रही राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है।  इस मुद्दे को बार‑बार तराशकर वह न सिर्फ पश्चिमी उत्तर प्रदेश के स्थानीय असंतोष को अपनी राजनीति में बदलना चाहती हैं, बल्कि बसपा को एक वैकल्पिक अस्तित्व के रूप में भी स्थापित करना चाहती हैं, जिससे दल को ताकत और मान्यता दोनों मिल सकें।

जेवर एयरपोर्ट का उद्घाटन होते ही मायावती ने यह दावा किया कि इस परियोजना की रूपरेखा और इसके जरूरी बुनियादी काम उनकी बसपा सरकार के शासनकाल में ही शुरू हो चुके थे।  उनका यह दावा बसपा को विकासवादी दल के रूप में पेश करने वाला है, जिससे उत्तर प्रदेश की जनता के सामने यह संदेश जाता है कि बसपा केवल जातिगत मुद्दे उठाने वाली पार्टी नहीं, बल्कि बड़ी परियोजनाओं की सोच भी रखती है।  इस तरह वह एयरपोर्ट के नाम पर न केवल अपने शासनकाल की राजनीतिक विरासत जीवित रख रही हैं, बल्कि मौजूदा सरकार और अन्य तीनों बड़े दलोंकृभाजपा, सपा और कांग्रेसकृको विकास कार्यों में देरी और रुकावट का दोषी भी ठहरा रही हैं।

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इसी कड़ी में वह पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हाईकोर्ट की अलग बेंच और वहाँ के लिए अलग राज्य बनाने के सपने को दोहरा कर एक नया तर्क बना रही हैं।  उनका संदेश स्पष्ट है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश, जो औद्योगिक गलियारों, खजूरी खेतों, और नोएडादृगुरुग्राम जैसे नए शहरों का घर है, आज भी अदालती और प्रशासनिक देरी और निर्णयों की दूरी से जूझ रहा है।  इस असंतोष को वह बसपा के पक्ष में मोड़ने की कोशिश कर रही हैं, ताकि वहाँ के छोटे व्यापारी, उद्योगपति, भूमि‑मालिक और नव‑निर्मित पड़ोस बसपा को अपनी उम्मीद का केंद्र बना सकें, जो पहले शायद भाजपा या सपा की ओर झुके रहे हैं। अलग प्रदेश की मांग को फिर से उठाकर मायावती बसपा के लिए कई तरह के फायदे तैयार करने की कोशिश कर रही हैं। सबसे पहले, यह मुद्दा पार्टी को एक बड़े राज्य‑स्तरीय रणनीति के रूप में पेश करता है, न कि केवल जातिगत या विधानसभा‑स्तरीय तंत्र के रूप में।  उत्तर प्रदेश के विभाजन की चर्चा आज‑कल केवल बसपा तक सीमित नहीं है, बल्कि राज्य भर के राजनीतिक गलियारों में भी चल रही है, लेकिन बसपा इसे अपनी राजनीति का केंद्र बनाकर अपनी विशिष्ट पहचान बनाए रखना चाहती है।  इससे पार्टी को एक नई राजनीतिक भाषा भी मिलती है, जिसमें न केवल दलित, आदिवासी और अन्य पिछड़े वर्गों की बात होगी, बल्कि पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लोगों के विकास और न्याय की बात भी शामिल होगी।

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दूसरे, अलग प्रदेश की मांग बसपा को पश्चिमी उत्तर प्रदेश के विभिन्न जातिगत और सामाजिक समूहों को एक साथ जोड़ने का मौका देती है।  यहाँ दलित, ओबीसी, जाट, गुज्जर, राजपूत और अन्य छोटी जातियाँ रहती हैं, जो अक्सर अलग‑अलग राजनीतिक दलों के खेमों में बंटी रहती हैं।  मायावती की रणनीति यह है कि स्थानीय असंतोष और विकास की मांग को एक दूसरे से जोड़कर बसपा उन सबको एक नए राजनीतिक विकल्प के रूप में पेश करे, जहाँ जाति अलग‑अलग नहीं होगी, बल्कि क्षेत्रीय और विकासवादी एजेंडा हावी होगा।  ऐसी स्थिति में बसपा न केवल अपनी मूल आधार‑जनता को बचाए रख सकती है, बल्कि नए वोट‑बैंक भी बना सकती है, जो पहले भाजपा या सपा के पास रहते थे।

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तीसरा, यह रणनीति बसपा को राजनीतिक रूप से “मजबूत विपक्षी दल” के रूप में दिखाने में मदद कर सकती है।  उत्तर प्रदेश में भाजपा‑संचालित राज्य सरकार के दौर में अलग राज्य की मांग से यह संदेश निकलता है कि प्रदेश बड़ा होने के कारण विकास और न्याय दोनों ही धीमे हो रहे हैं।  इस दावे को बसपा अपने विकासवादी एजेंडा के साथ जोड़कर यह बताना चाहती है कि अगर वह सत्ता में आई, तो सिर्फ जातिगत आरक्षण और सामाजिक न्याय तक ही सीमित नहीं रहेगी, बल्कि प्रशासनिक सुधार और भू‑राजनीति को भी नए सिरे से सोचेगी।  इससे पार्टी की छवि बदल सकती है, जो आज भी कई लोगों को सिर्फ “दलित‑नेतृत्व पार्टी” लगती है, वह धीरे‑धीरे एक व्यापक जन‑आधार वाली राज्य‑स्तरीय राजनीतिक शक्ति के रूप में गिनी जा सकती है।

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चौथा, अलग प्रदेश की मांग बसपा को मीडिया और जनता के बीच लगातार चर्चा में रहने का अवसर देती है।  जब भी राज्य‑विभाजन, न्यायपालिका की अलग बेंच या औद्योगिक विकास जैसे विषय आते हैं, बसपा का नाम उस संवाद में जरूरी तौर पर आता है।  इससे पार्टी को उत्तर प्रदेश के राजनीतिक समीकरण में बने रहने की प्रासंगिकता मिलती है, भले ही कभी‑कभी चुनावी आंकड़े उसके अनुकूल नहीं हों।  मीडिया‑समय और चर्चा का यह फायदा बसपा को नए नेताओं को उभारने, युवाओं को जोड़ने और स्थानीय स्तर पर नेता‑बनावट की प्रक्रिया आगे बढ़ाने में मदद कर सकता है।

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