अखिलेश का मुस्लिम दांव, आजम की कमी या ओवैसी का डर

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संजय सक्सेना

उत्तर प्रदेश की राजनीति में इन दिनों एक दिलचस्प खेल चल रहा है। समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव एक के बाद एक मुस्लिम नेताओं को अपनी पार्टी में शामिल कराते जा रहे हैं। ईद के बाद से यह सिलसिला और तेज हो गया है। पहले नसीमुद्दीन सिद्दीकी का सपा में आना, फिर बहुजन समाज पार्टी के पूर्व नेता और प्रवक्ता डॉ. एमएच खान का समाजवादी पार्टी में शामिल होना यह महज संयोग नहीं है, बल्कि एक सुनियोजित रणनीति है, जिसकी जड़ें कई राजनीतिक मजबूरियों और महत्वाकांक्षाओं में एक साथ गड़ी हुई हैं।सबसे पहले उस खालीपन की बात करते हैं, जो सपा की राजनीति में पिछले कुछ समय से महसूस किया जा रहा है। सपा के बड़े मुस्लिम चेहरे आजम खान जेल में हैं, ऐसे में अखिलेश यादव को एक प्रभावशाली मुस्लिम नेता की जरूरत महसूस हो रही थी। आजम खान सिर्फ एक नेता नहीं थे, वे समाजवादी पार्टी का एक पूरा चेहरा थे। रामपुर और उसके आसपास के इलाकों में उनकी जड़ें इतनी गहरी थीं कि उनके बिना सपा का मुस्लिम वोट बैंक अधूरा लगता था। मंच पर उनकी गैरहाजिरी सपा के लिए एक बड़ा राजनीतिक घाटा रही है।

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अखिलेश इस घाटे की भरपाई एक नेता से नहीं, बल्कि कई नेताओं को जोड़कर करने की कोशिश में हैं।इसी कड़ी में नसीमुद्दीन सिद्दीकी का सपा में आना एक बड़ी घटना है। 2007 से 2012 तक चली बसपा सरकार में नसीमुद्दीन सिद्दीकी के पास करीब 18 विभागों की जिम्मेदारी थी, जिस वजह से राजनीतिक हलकों में उन्हें ‘मिनी सीएम’ तक कहा जाने लगा था। बसपा से निकाले जाने के बाद वे कांग्रेस में गए, लेकिन वहां भी उनकी राजनीतिक भूख शांत नहीं हुई। अब सपा में आकर उन्होंने न सिर्फ खुद के लिए एक नया मंच तलाश किया है, बल्कि अखिलेश को भी एक ऐसा मुस्लिम चेहरा मिल गया है, जिसे पूरे उत्तर प्रदेश में पहचाना जाता है। नसीमुद्दीन सिद्दीकी करीब 1600 समर्थकों के साथ सपा में शामिल हुए हैं, जिससे कई जिलों में पार्टी को संगठनात्मक मजबूती मिल सकती है।

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बसपा के प्रवक्ता डॉ. एमएच खान का सपा में आना भी इसी रणनीति का हिस्सा है। सपा नेतृत्व ने उनका स्वागत करते हुए भरोसा जताया कि उनके अनुभव और संवाद कौशल से पार्टी को मजबूती मिलेगी और उन्हें सपा का आधिकारिक पैनलिस्ट बनाया गया है। यानी मीडिया की बहसों में, जहां आजम खान की आक्रामक आवाज की कमी खलती थी, वहां अब डॉ. खान जैसे अनुभवी प्रवक्ता पार्टी का पक्ष रखेंगे। यह एक व्यावहारिक और चतुर राजनीतिक कदम है। लेकिन अखिलेश की यह बेचैनी केवल आजम खान की अनुपस्थिति से नहीं उपजी है। इसके पीछे एक और बड़ा कारण है और वह है असदुद्दीन ओवैसी और उनकी पार्टी एआईएमआईएम। जान लें कि ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम यूपी में 200 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी में है। भले ही यूपी में ओवैसी का पिछला प्रदर्शन बेहद कमजोर रहा हो, पिछले विधानसभा चुनाव में एआईएमआईएम 95 सीटों पर लड़ी और 94 में उनके उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई थी, लेकिन मुस्लिम वोटों के बिखराव का डर सपा को हमेशा सताता रहता है। बिहार में ओवैसी ने दिखाया है कि वे छोटी-छोटी जगहों पर चुनाव जीत सकते हैं।

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यूपी में अगर उन्होंने 10-15 सीटें भी निकाल लीं, तो वह सीधे सपा का नुकसान होगा। अखिलेश यादव ने खुद कहा कि ओवैसी को अगर यूपी आना है तो वो साइकिल पर सवार होकर आएं, नहीं तो माना जाएगा कि उनके अंडरग्राउंड तार भाजपा से जुड़े हैं। यह बयान बताता है कि अखिलेश ओवैसी को कितनी गंभीरता से लेते हैं। उनके लिए ओवैसी एक सीधा प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि वह ‘वोट कटुआ’ है, जो चुनाव के नतीजे पलट सकता है। इसीलिए अखिलेश की पूरी कोशिश यह है कि मुस्लिम मतदाता को यह संदेश दिया जाए कि उनका असली और ताकतवर नेतृत्व सपा के पास है, ओवैसी के पास नहीं।यूपी में करीब 19 फीसदी मुस्लिम वोट हैं और 2022 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी को 79 फीसदी मुस्लिम वोट मिला था। यह आंकड़ा देखने में बड़ा लगता है, लेकिन इसी में सपा की चुनौती भी छुपी है। जब इतना बड़ा वोट बैंक आपके साथ हो, तो उसे बनाए रखना और और मजबूत करना दोनों जरूरी हो जाता है। 2024 के लोकसभा चुनाव में इंडिया गठबंधन को 92 फीसदी मुस्लिम वोट मिला। यह उछाल सपा को उत्साहित करता है, लेकिन यह भी डराता है कि इतना बड़ा वोट बैंक एकजुट रहे, इसके लिए लगातार मेहनत करनी होगी।राजनीतिक पंडितों का मानना है कि अखिलेश यादव जिस तरह से बसपा और कांग्रेस के कद्दावर नेताओं को अपनी टीम में शामिल कर रहे हैं, उससे 2027 के विधानसभा चुनाव की बिसात अभी से बिछ गई है।

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मुस्लिम नेताओं को जोड़ने के साथ-साथ अखिलेश अपने पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक फॉर्मूले को धार देने में लगे हैं। यह फॉर्मूला 2027 में उनकी सबसे बड़ी ताकत बन सकता है।कुल मिलाकर ,अखिलेश यादव की यह मुस्लिम नेताओं को जोड़ने की मुहिम कई परतों वाली राजनीति है। एक तरफ आजम खान की कमी पूरी करने की जरूरत है, दूसरी तरफ ओवैसी के बढ़ते प्रभाव को रोकना है और तीसरी तरफ 2027 के लिए एक ऐसा गठजोड़ तैयार करना है, जो भाजपा को सत्ता से बाहर कर सके। यह खेल जितना आसान दिखता है, उतना है नहीं। लेकिन अखिलेश की चालें बता रही हैं कि वे इस बार पूरी तैयारी के साथ मैदान में उतरे हैं।

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