संत एकनाथ षष्ठी आज: भक्ति, समानता और समाज सुधार के महान संत को नमन

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राजेन्द्र गुप्ता

संत एकनाथ महाराज महाराष्ट्र की भक्ति परंपरा में एक बहुत ही महत्वपूर्ण और मार्गदर्शक संत हैं। ‘श्री एकनाथ षष्ठी’ का दिन उनकी पुण्य तिथि के रूप में बड़ी श्रद्धा से मनाया जाता है। एकनाथ षष्ठी 2026 की तिथि 9 मार्च है। एकनाथ महाराज (1533 ईस्वी से 1599 ईस्वी) भक्ति संतों में सबसे महत्वपूर्ण संतों में से एक हैं।

ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व

संत एकनाथ महाराज ने 72 वर्ष की आयु में फाल्गुन वद्य षष्ठी की 6 तारीख को सदेह जल समाधि ली। उन्होंने ‘शांति ब्रह्मा’ के नाम से जाना जाने वाला अपना काम पूरा किया और विट्ठल का नाम जपते हुए गोदावरी में प्रवेश किया। एकनाथ ने जीवन भर जातिगत भेदभाव को स्वीकार नहीं किया। उन्होंने अछूतों के घरों में भोजन किया और प्यासे गधे को गंगा का पानी पिलाया, जिससे उन्होंने दुनिया को दिखाया कि ‘भूतदया’ ही सच्ची भक्ति है। उन्होंने ‘एकनाथी भागवत’, ‘भावार्थ रामायण’ और कई भरुदे और अभंगों के माध्यम से आध्यात्मिक ज्ञान को आम आदमी की भाषा (मराठी) तक पहुंचाया।

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पैठण महोत्सव (नाथ षष्ठी महोत्सव)

एकनाथ षष्ठी के अवसर पर पैठन में एक विशाल जुलूस निकाला जाता है। यह त्योहार आमतौर पर तीन दिनों तक चलता है।

प्रथम दिवस (कावड़) : राज्य भर से लाखों वारकरी गोदावरी की कावड़ी लेकर पैठन आते हैं।

मुख्य दिवस (छठा) : इस दिन नाथ की पादुकाओं की पूजा की जाती है और पालकी समारोह आयोजित किया जाता है। भक्त गोदावरी में स्नान करते हैं और नाथ के दर्शन करते हैं।

काला (सप्तमी) : यह त्योहार षष्ठी के दूसरे दिन ‘काला’ के साथ समाप्त होता है।

त्योहार का स्वरूप

  • एकनाथ महाराज के भारुदा के बिना यह उत्सव अधूरा है। इस दिन विभिन्न स्थानों पर भारुदा कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, जिनका उद्देश्य मनोरंजन के माध्यम से समाज को शिक्षित करना है।
  • पैठन में नाथों के महल में भजनों और नाम के जप की निरंतर गूंज सुनाई देती है।
  • इस दिन मुख्य रूप से ‘पूरनपोली’ का प्रसाद चढ़ाया जाता है, क्योंकि ऐसा माना जाता है कि नाथों को पूरनपोली का नैवेद्य प्रिय था।

संत एकनाथ महाराज का योगदान

  • संत एकनाथ महाराज एक महान संत, कवि और समाज सुधारक थे।
  • उन्होंने भगवद् गीता, रामायण और भागवत पुराण जैसे ग्रंथों पर टीकाएँ लिखीं।
  • उन्होंने अभंग, भारुद और गावलान जैसे भक्ति गीत भी रचे।
  • एकनाथ महाराज ने समाज में प्रचलित बुरी प्रथाओं और अंधविश्वासों का विरोध किया।
  • उन्होंने सभी धर्मों के लोगों को एक साथ रहने और एक दूसरे से प्रेम करने का उपदेश भी दिया।
  • उनकी रचनाओं में श्रीमद्भागवत के ग्यारहवें अध्याय पर मराठी टीका, चतुश्लोकी भागवत, रुक्मिणी स्वयंवर, भावार्थ रामायण, संत चरित्र और आनंद लहरी शामिल हैं।

 

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