यूपी के दिग्गज नोएडा में दिखाएंगे अपनी ताकत

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अजय कुमार

उत्तर प्रदेश की राजनीति में जैसे-जैसे विधानसभा चुनाव 2027 का समय नजदीक आ रहा है, वैसे-वैसे सियासी हलचल तेज होती जा रही है। इस बार चुनावी रणनीतियों का केंद्र अचानक वही जिला बन गया है, जिसे लंबे समय तक सत्ता के लिहाज से ‘अशुभ’ माना जाता रहा। बात हो रही है गौतमबुद्ध नगर यानी नोएडा की। दिल्ली से सटे इस जिले ने अब प्रदेश की राजनीति में वह हैसियत बना ली है, जहां से उठने वाली लहर पश्चिमी उत्तर प्रदेश की तकरीबन 100 विधानसभा सीटों को प्रभावित करने की ताकत रखती है। यही वजह है कि भाजपा, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी तीनों ने अपने-अपने मिशन-2027 की शुरुआत यहीं से करने का फैसला किया है।गौतमबुद्ध नगर को आज उत्तर प्रदेश की आर्थिक राजधानी कहा जाने लगा है। जिले में आईटी, इलेक्ट्रॉनिक्स, रियल एस्टेट और इंफ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में बीते पांच वर्षों में 1.5 लाख करोड़ रुपये से अधिक के निवेश प्रस्ताव सामने आए हैं। यमुना एक्सप्रेसवे के किनारे बस रही यमुना सिटी, प्रस्तावित फिल्म सिटी और अंतरराष्ट्रीय स्तर का जेवर एयरपोर्ट इस जिले को राज्य की विकास गाथा का पोस्टर बॉय बना चुके हैं। राजनीति में विकास अक्सर सबसे बड़ा हथियार होता है और सत्तारूढ़ दल इस हथियार को पूरी धार के साथ मैदान में उतारने की तैयारी कर चुका है।

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भारतीय जनता पार्टी इस बार विकास के ठोस आंकड़ों और बड़ी परियोजनाओं को अपने चुनावी अभियान की रीढ़ बना रही है। 21 फरवरी को यमुना सिटी के औद्योगिक सेक्टर-28 में उत्तर भारत की पहली सेमीकंडक्टर यूनिट का शिलान्यास प्रस्तावित है। इस कार्यक्रम में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव मौजूद रहेंगे, जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वर्चुअल माध्यम से जनसभा को संबोधित करेंगे। करीब 48 एकड़ में लगने वाली इस यूनिट में एचसीएल और फॉक्सकॉन जैसी दिग्गज कंपनियां निवेश कर रही हैं। शुरुआती चरण में ही इससे 4,000 प्रत्यक्ष और 10,000 अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर पैदा होने का अनुमान है। भाजपा नेताओं का दावा है कि सेमीकंडक्टर यूनिट केवल एक उद्योग नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश को तकनीकी आत्मनिर्भरता की ओर ले जाने वाला कदम है। पार्टी का आकलन है कि नोएडा और ग्रेटर नोएडा पहले ही आईटी हब के रूप में पहचान बना चुके हैं और अब चिप मैन्युफैक्चरिंग के साथ यह इलाका वैश्विक मैप पर और मजबूती से उभरेगा। इसके तुरंत बाद जेवर में बन रहे अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट के शुभारंभ की तैयारी है। लगभग 1,334 हेक्टेयर में फैले इस एयरपोर्ट की पहली फेज क्षमता सालाना 1.2 करोड़ यात्रियों की है, जिसे अगले चरणों में 7 करोड़ तक ले जाने की योजना है। भाजपा इसे पश्चिमी यूपी के विकास का गेमचेंजर मान रही है।

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दूसरी ओर समाजवादी पार्टी ने इस बार पुराने अंधविश्वासों को पीछे छोड़ते हुए नोएडा को ही अपनी सियासी प्रयोगशाला बनाया है। पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव 29 मार्च को दादरी के मिहिर भोज डिग्री कॉलेज से अपने चुनावी अभियान की शुरुआत करने जा रहे हैं। इसे ‘समाजवादी समानता भाईचारा रैली’ और ‘पीडीए भागीदारी यात्रा’ का नाम दिया गया है। सपा नेतृत्व का मानना है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में पश्चिमी यूपी में पार्टी के प्रदर्शन ने यह साफ कर दिया है कि पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक वर्ग का गठजोड़ अगर जमीन पर उतर आया तो भाजपा के लिए राह आसान नहीं रहेगी।सपा के रणनीतिकारों का कहना है कि गौतमबुद्ध नगर की सामाजिक संरचना पीडीए फॉर्मूले के लिए अनुकूल है। जिले की करीब 35 प्रतिशत आबादी पिछड़े वर्गों से आती है, जबकि दलित और अल्पसंख्यक मिलकर लगभग 30 प्रतिशत मतदाता हैं। इसके अलावा गुर्जर, जाट और त्यागी जैसी प्रभावशाली जातियों की मौजूदगी यहां की राजनीति को और दिलचस्प बना देती है। अखिलेश यादव को भरोसा है कि जिस तरह 2012 में उन्होंने यहीं से साइकिल यात्रा शुरू कर पूर्ण बहुमत हासिल किया था, उसी तरह 2027 में भी नोएडा से उठी लहर लखनऊ तक पहुंचेगी।

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बहुजन समाज पार्टी भी इस जिले को हल्के में लेने के मूड में नहीं है। यह जिला बसपा सुप्रीमो मायावती का गृह जनपद है और पार्टी इसे अपनी राजनीतिक शो विंडो मानती है। 15 मार्च को मान्यवर कांशीराम की जयंती पर नोएडा स्थित राष्ट्रीय दलित प्रेरणा स्थल में बड़े शक्ति प्रदर्शन की तैयारी है। पार्टी नेताओं का दावा है कि मेरठ, सहारनपुर, मुरादाबाद, बरेली, अलीगढ़ और आगरा मंडल से लाखों कार्यकर्ता इस कार्यक्रम में जुटेंगे। बसपा का फोकस साफ है अपने कोर दलित वोट बैंक को फिर से एकजुट करना और यह संदेश देना कि सत्ता की दौड़ में वह अभी भी मजबूत खिलाड़ी है।राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि गौतमबुद्ध नगर की अहमियत सिर्फ यहां की तीन विधानसभा सीटों तक सीमित नहीं है। नोएडा का राजनीतिक संदेश पूरे दिल्ली-एनसीआर में गूंजता है। यहां होने वाली रैलियां, घोषणाएं और विकास परियोजनाएं मीडिया और सोशल प्लेटफॉर्म के जरिए पश्चिमी यूपी के हर जिले तक पहुंचती हैं। 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने इस जिले में क्लीन स्वीप किया था, लेकिन इस बार मुकाबला कहीं ज्यादा त्रिकोणीय और कड़ा नजर आ रहा है।

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जिले में तेजी से बढ़ती शहरी आबादी, प्रवासी मतदाताओं की संख्या और रोजगार से जुड़े मुद्दे इस बार चुनावी बहस के केंद्र में रहेंगे। नोएडा-ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण के आंकड़ों के मुताबिक, पिछले दस सालों में यहां की आबादी में करीब 40 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। इनमें बड़ी संख्या युवाओं और मध्यम वर्ग के पेशेवरों की है, जिनकी प्राथमिकताएं पारंपरिक जातीय राजनीति से अलग विकास, रोजगार और बुनियादी सुविधाओं से जुड़ी हैं।यही कारण है कि 2027 की चुनावी जंग में नोएडा केवल एक जिला नहीं, बल्कि सत्ता की प्रयोगशाला बन चुका है। यहां जो प्रयोग सफल होगा, वही मॉडल पूरे प्रदेश में दोहराया जाएगा। भाजपा विकास की रफ्तार और बड़ी परियोजनाओं के सहारे मैदान में है, सपा सामाजिक गठजोड़ और नए संदेश के साथ वापसी की कोशिश में है, जबकि बसपा अपने पुराने आधार को फिर से मजबूत करने की रणनीति पर काम कर रही है। आने वाले एक महीने में होने वाली रैलियां और कार्यक्रम यह तय करेंगे कि 2027 के चुनावी ऊंट की करवट किस ओर बैठेगी, लेकिन इतना तय है कि इस बार सत्ता की राह नोएडा होकर ही गुजरेगी।

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