मद्रास में जन्मी लड़की से सिनेमा की मिसाल तक: कैसे वहीदा रहमान बनीं गुरु दत्त की पहली पसंद

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Entertainment: भारतीय सिनेमा की सबसे सशक्त और संवेदनशील अभिनेत्रियों में शुमार वहीदा रहमान आज, 3 फरवरी 2026 को, अपना 88वां जन्मदिन मना रही हैं। ‘प्यासा’, ‘कागज के फूल’ और ‘गाइड’ जैसी अमर फिल्मों से सिनेमा को नई ऊंचाइयां देने वाली वहीदा रहमान का सफर आसान नहीं था। मद्रास में जन्मी इस लड़की के सपनों से कभी उनके पिता तक घबरा गए थे।

वहीदा रहमान का बचपन मद्रास (अब चेन्नई) में बीता। उनके पिता नगर निगम में कमिश्नर थे और परिवार बेहद अनुशासित माहौल में रहता था। वहीदा को बचपन से ही नाचना-गाना और अभिनय करना पसंद था। वे अक्सर शीशे के सामने खड़े होकर फिल्मी दृश्यों की नकल करती थीं। यह देखकर उनके पिता कई बार उनकी मां से कहते थे कि कहीं यह लड़की जरूरत से ज्यादा कल्पनाओं में तो नहीं जी रही।

एक इंटरव्यू में वहीदा रहमान ने बताया था कि एक दिन उनके पिता ने उन्हें बुलाकर सवाल किया कि वह ऐसा क्यों करती हैं। इस पर उन्होंने जवाब दिया, “मैं चाहती हूं कि जब मैं हंसूं तो पूरी दुनिया हंसे और जब मैं रोऊं तो दुनिया रोए।” यही जज्बा आगे चलकर उन्हें एक महान अभिनेत्री बना गया।

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दक्षिण भारत में पली-बढ़ी होने के कारण वहीदा रहमान ने भरतनाट्यम की विधिवत ट्रेनिंग ली। मंच पर नृत्य करते-करते ही उन्हें अभिनय का आत्मविश्वास मिला। उनके पिता के एक मित्र तेलुगु फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े निर्माता थे। उन्होंने वहीदा को फिल्म में लेने का प्रस्ताव रखा, लेकिन पिता ने उम्र और पढ़ाई का हवाला देकर मना कर दिया।

पिता के निधन के बाद परिस्थितियां बदलीं। वही निर्माता फिर से वहीदा की मां के पास पहुंचे और भरोसा दिलाया कि फिल्म में केवल नृत्य होगा, अभिनय जैसा कुछ नहीं। काफी सोच-विचार के बाद मां ने अनुमति दे दी। यही फैसला वहीदा रहमान की जिंदगी का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ।

1955 में तेलुगु फिल्म ‘रोजुलु मरयी’ में वहीदा रहमान ने बतौर डांसर काम किया। फिल्म सफल रही और उसी साल ‘जयसिम्हा’ में उन्हें एनटी रामाराव के साथ पहली बार लीड एक्ट्रेस बनने का मौका मिला। उनकी सादगी और स्क्रीन प्रेजेंस ने सबका ध्यान खींचा।

इसी दौरान हैदराबाद में उनकी मुलाकात गुरु दत्त से हुई। गुरु दत्त उनकी प्रतिभा से बेहद प्रभावित हुए और उन्हें मुंबई बुलाया। 1956 में फिल्म ‘सीआईडी’ से वहीदा रहमान ने हिंदी सिनेमा में कदम रखा और फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा।

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