9 जनवरी – प्रवासी भारतीय दिवस विशेष

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  • जब सात समंदर पार भी धड़कता है भारत : प्रवासी भारतीयों की राष्ट्रयात्रा – दिवाकर शर्मा

9 जनवरी केवल एक तारीख नहीं है, यह भारत की उस जीवंत चेतना का दिन है जो महासागरों को लांघकर भी अपनी जड़ों से अलग नहीं हुई। यह दिन उन करोड़ों भारतीयों का है जो भले ही जीवन, रोज़गार या शिक्षा के कारण विदेशों में बसे हों, लेकिन जिनकी धड़कनों में आज भी भारत बसता है। प्रवासी भारतीय दिवस दरअसल उस सत्य की सार्वजनिक स्वीकारोक्ति है कि भारत केवल अपनी भौगोलिक सीमाओं में नहीं सिमटा, बल्कि वह एक ऐसा विचार है जो दुनिया के हर कोने में जीवित है।
1915 में जब महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे, तब वह केवल एक व्यक्ति की वापसी नहीं थी। वह उस आत्मसम्मान की वापसी थी जिसे विदेशों में बसे भारतीयों ने अपने संघर्ष से अर्जित किया था। गांधी ने प्रवासी भारतीयों को यह सिखाया कि अन्याय सहना मजबूरी नहीं, बल्कि उसका विरोध करना कर्तव्य है। उसी क्षण से प्रवासी भारतीय केवल मजदूर या व्यापारी नहीं रहे, वे भारत की प्रतिष्ठा के रक्षक बन गए। आज उसी परंपरा का विस्तार हमें विश्व की सत्ता, विज्ञान, शिक्षा और उद्योग के केंद्रों में दिखाई देता है।
दुनिया के अनेक देशों में भारतीय मूल के लोग सर्वोच्च पदों पर हैं। कोई वैश्विक कंपनियों का नेतृत्व कर रहा है, कोई विश्वविद्यालयों में ज्ञान का प्रसार कर रहा है, तो कोई संसदों में नीतियां तय कर रहा है। यह संयोग नहीं है, यह उस भारतीय संस्कार का परिणाम है जो अनुशासन, परिश्रम और नैतिकता को जीवन का आधार मानता है। विदेश की धरती पर मिली सफलता भारत के गौरव में वृद्धि करती है, क्योंकि हर उपलब्धि के साथ भारत की साख और विश्वास बढ़ता है।
बहुत कम लोग यह समझ पाते हैं कि भारत की अर्थव्यवस्था को स्थिर रखने में प्रवासी भारतीयों की भूमिका कितनी निर्णायक है। विदेशों से भारत भेजा गया धन केवल आर्थिक सहयोग नहीं है, वह एक भावनात्मक रिश्ता है। वह संदेश है कि चाहे जीवन कहीं भी क्यों न बसा हो, भारत आज भी अपना ही है। संकट के समय यही प्रवासी भारतीय बिना किसी आह्वान के आगे आते हैं। प्राकृतिक आपदाएं हों, महामारी हो या राष्ट्रीय आवश्यकता, प्रवासी भारतीयों का योगदान कभी पीछे नहीं रहा।
जब भारत के विरुद्ध अंतरराष्ट्रीय मंचों पर झूठे आरोप लगाए जाते हैं, तब प्रवासी भारतीय मौन नहीं रहते। वे सच्चाई के साथ खड़े होते हैं, अपने प्रभाव और संपर्कों का उपयोग कर भारत का पक्ष रखते हैं। कश्मीर, परमाणु नीति या आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप के प्रयासों के विरुद्ध सबसे मजबूत आवाज़ अक्सर विदेशों से ही उठती है। यह राष्ट्रभक्ति किसी मंच से दिए गए भाषण की नहीं, बल्कि जिम्मेदारी के निर्वाह की पहचान है।
भारत की संस्कृति को जीवित रखने का श्रेय भी प्रवासी भारतीयों को जाता है। विदेशों में मनाई जाने वाली दीपावली, रामनवमी, जन्माष्टमी और होली केवल उत्सव नहीं हैं, वे भारत की पहचान का सार्वजनिक प्रदर्शन हैं। योग, आयुर्वेद और भारतीय भोजन को विश्व में स्वीकार्यता दिलाने में प्रवासी भारतीयों की भूमिका निर्णायक रही है। उन्होंने यह सिद्ध किया कि आधुनिकता अपनाने का अर्थ अपनी जड़ों से कट जाना नहीं होता।
खाड़ी देशों से लेकर यूरोप और अमेरिका तक, भारतीय श्रमिकों और पेशेवरों ने कठिन परिस्थितियों में काम कर उन देशों की प्रगति में योगदान दिया है। ऊंची इमारतों की नींव में, अस्पतालों की सेवाओं में, तकनीकी क्रांति के कोड में और शोध प्रयोगशालाओं की खोजों में भारतीय हाथों की मेहनत शामिल है। इसके बावजूद प्रवासी भारतीयों ने कभी भारत को हीन नहीं बताया, बल्कि हर अवसर पर भारत की क्षमता और सामर्थ्य का उदाहरण प्रस्तुत किया।
आज जब भारत आत्मनिर्भर बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तब प्रवासी भारतीय इस यात्रा के सहभागी बन रहे हैं। वे अपने अनुभव, ज्ञान और पूंजी के साथ भारत से जुड़ रहे हैं। नए उद्योग, तकनीकी नवाचार और सामाजिक पहलें इस बात का प्रमाण हैं कि प्रवासी भारतीय भारत को पीछे मुड़कर देखने वाला देश नहीं, बल्कि भविष्य की ओर बढ़ता राष्ट्र मानते हैं।
प्रवासी भारतीय दिवस सम्मान का औपचारिक आयोजन भर नहीं है। यह भारत की उस शक्ति का स्मरण है जो बिना शोर किए दुनिया में अपना स्थान बनाती है। यह उन भारतीयों के प्रति कृतज्ञता का दिन है जिन्होंने विदेश की धरती पर खड़े होकर भी भारत माता का मस्तक ऊंचा रखा। यह दिवस यह भी स्पष्ट करता है कि भारत अब केवल अपने भीतर सीमित नहीं है, भारत अपने प्रवासी संतानों के माध्यम से विश्व की चेतना में स्थायी रूप से स्थापित हो चुका है। भारत जहां भी है, वही प्रवासी भारतीय हैं और प्रवासी भारतीय जहां हैं, वहीं भारत है।

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