भाजपा की राजनीति युवा कंधों पर, कांग्रेस में परिवारवाद और वरिष्ठता हावी

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अजय कुमार                               
अजय कुमार
राहुल गांधी जब भी सार्वजनिक मंच से बोलते हैं, तो ऐसा आभास देते हैं मानो अगला प्रधानमंत्री बनना अब बस औपचारिकता भर रह गया हो। लेकिन सियासत भावनाओं से नहीं, आंकड़ों और नतीजों से चलती है। 2014, 2019 और 2024 तीन लोकसभा चुनाव बीत चुके हैं और तीनों में जनता ने राहुल गांधी के नेतृत्व को स्वीकार नहीं किया। इसके बावजूद वे उसी आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ते दिखते हैं। राजनीति में रिटायरमेंट की कोई तय उम्र नहीं होती, लेकिन लोकतंत्र में जनता बार-बार किसी नेता को नकार दे, तो वह खुद एक बड़ा संकेत होता है। राहुल गांधी आज 55 वर्ष के हैं। अगर वे किसी सरकारी या गैर-सरकारी संस्था में होते, तो अगले पाँच साल में रिटायरमेंट की तैयारी शुरू हो जाती। राजनीति में वे रिटायर नहीं होंगे, लेकिन उनके सामने जो खतरे खड़े हो रहे हैं, वे अब नजरअंदाज करने लायक नहीं रहे। राहुल गांधी के स्वभाव और राजनीतिक शैली पर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं। नकारात्मक राजनीति उनके भाषणों का स्थायी हिस्सा बन चुकी है। कभी “चौकीदार चोर है”, कभी “वोट चोर”, कभी “गद्दी छोड़ो” हर चुनाव के बाद नया नारा, लेकिन नतीजा वही। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार उन्हें हर हाल में “चोर” ही नजर आती है। समस्या यह नहीं कि वे सवाल उठाते हैं, समस्या यह है कि जनता को उनके सवालों में समाधान नहीं दिखता। विपक्ष की भूमिका निभाने और वैकल्पिक नेतृत्व देने के बीच जो फर्क होता है, राहुल गांधी आज भी उसी रेखा को नहीं पकड़ पाए हैं।
बीते महीनों में कांग्रेस के भीतर से ही जो आवाजें उठी हैं, वे राहुल गांधी की राजनीति के लिए नए खतरे का संकेत देती हैं। ओडिशा के पूर्व विधायक मोहम्मद मोकीम का पत्र कोई मामूली घटना नहीं थी। उन्होंने पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की उम्र पर सवाल उठाते हुए कहा कि कांग्रेस युवाओं से कटती जा रही है और नेतृत्व में बदलाव की जरूरत है। इसी पत्र में उन्होंने राहुल गांधी पर भी इशारों-इशारों में कहा कि वे पार्टी कार्यकर्ताओं और युवाओं से कनेक्ट नहीं कर पा रहे हैं। कांग्रेस ने आत्ममंथन करने के बजाय मोकीम को निष्कासित कर दिया। यह वही पुरानी कांग्रेस है, जो आईना दिखाने वालों को बाहर का रास्ता दिखा देती है। इंडिया गठबंधन के भीतर भी राहुल गांधी के नेतृत्व को लेकर असहजता अब खुलकर दिखने लगी है। जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने “वोट चोरी” के आरोपों को सार्वजनिक तौर पर खारिज कर दिया। ममता बनर्जी लोकसभा चुनाव के बाद ही नेतृत्व परिवर्तन की बात कह चुकी हैं। शरद पवार, अखिलेश यादव और लालू यादव जैसे नेता भी निजी बातचीत में यही संकेत देते रहे हैं कि कांग्रेस को अब आत्मकेंद्रित राजनीति छोड़नी होगी। सवाल साफ है अगर अपने ही सहयोगी राहुल गांधी पर भरोसा नहीं कर पा रहे, तो देश कैसे करेगा?

राहुल गांधी खुद को युवाओं का नेता बताने की कोशिश करते हैं। वे जेन-जी की बात करते हैं, आंदोलन की वकालत करते हैं, सोशल मीडिया पर युवाओं को संबोधित करते हैं। लेकिन 2029 में जब अगला लोकसभा चुनाव होगा, तब राहुल गांधी 59 वर्ष के होंगे। जेन-जी वह पीढ़ी है, जिसकी उम्र आज 13 से 28 वर्ष के बीच है। यह मान लेना कि 60 के करीब पहुंचा नेता किशोरों और युवाओं की मानसिकता का नेतृत्व करेगा, सियासत की हकीकत से आंख चुराने जैसा है। युवाओं को केवल भाषण नहीं चाहिए, उन्हें अवसर, नेतृत्व और भविष्य की स्पष्ट तस्वीर चाहिए जो कांग्रेस आज तक नहीं दे पाई। इसके उलट भारतीय जनता पार्टी ने साफ तौर पर युवा नेतृत्व की ओर शिफ्ट करना शुरू कर दिया है। दिसंबर 2025 में बिहार के मंत्री और पांच बार के विधायक नितिन नबीन को राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बनाया जाना सिर्फ एक नियुक्ति नहीं है, यह एक राजनीतिक संदेश है। भाजपा ने यह साफ कर दिया है कि भविष्य की राजनीति युवाओं के कंधों पर लड़ी जाएगी। संगठन से लेकर सरकार तक, 50 से 55 वर्ष की उम्र के नेताओं को जिम्मेदारी दी जा रही है। योगी आदित्यनाथ, देवेंद्र फडणवीस, पुष्कर सिंह धामी, मोहन यादव ये सभी चेहरे दिखाते हैं कि भाजपा लंबी राजनीतिक पारी की तैयारी कर रही है।

कांग्रेस की हालत इसके ठीक उलट है। सचिन पायलट जैसे नेता सालों से इंतजार में हैं। कर्नाटक में डीके शिवकुमार आज भी मुख्यमंत्री बनने का सपना देख रहे हैं। शशि थरूर को लोकप्रियता के बावजूद किनारे रखा गया। कन्हैया कुमार जैसे नेता इस्तेमाल से ज्यादा उपेक्षा के शिकार हुए। नतीजा यह हुआ कि ज्योतिरादित्य सिंधिया, जितिन प्रसाद, जयवीर शेरगिल जैसे युवा चेहरे कांग्रेस छोड़कर भाजपा में चले गए। कांग्रेस आज भी वरिष्ठता और परिवारवाद की दीवार में उलझी हुई है। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी को युवा चेहरा कहा जाता है, लेकिन पार्टी के भीतर अंतिम फैसले आज भी सोनिया गांधी के इर्द-गिर्द घूमते हैं। कर्नाटक संकट हो या संगठनात्मक फेरबदल, आखिरी नजर उन्हीं पर जाती है। यह स्थिति उस पार्टी की है, जो खुद को लोकतंत्र की संरक्षक बताती है।

कांग्रेस का अंदरूनी कलह उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बन चुका है। हरियाणा और दिल्ली में आम आदमी पार्टी से टकराव, बिना सहयोगियों को भरोसे में लिए राष्ट्रीय रैलियां, गठबंधन धर्म की अनदेखी ये सब राहुल गांधी की राजनीतिक समझ पर सवाल खड़े करते हैं। विपक्ष को जोड़ने का दावा करने वाले नेता के कदम अगर खुद बिखराव पैदा करें, तो खतरा स्वाभाविक है। सबसे बड़ा खतरा उम्र नहीं, बल्कि समय से तालमेल न बैठा पाना है। भाजपा जहां युवाओं को आगे कर रही है, वहीं कांग्रेस बूढ़ों की फौज बनती जा रही है। राहुल गांधी चाहे जितना युवा दिखने की कोशिश करें, सच्चाई यही है कि पांच साल बाद वे भी उसी कतार में होंगे, जिसकी ओर मोकीम ने अपने पत्र में इशारा किया था। भारतीय राजनीति अब धैर्य नहीं, दिशा मांगती है। जनता को सपना नहीं, रोडमैप चाहिए। राहुल गांधी आज भी संघर्ष और शिकायत के बीच फंसे हुए हैं। अगर यही रफ्तार रही, तो आने वाले सालों में उनके लिए सबसे बड़ा खतरा विरोधी नहीं, बल्कि समय साबित होगा।

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