नई दिल्ली। वंदे मातरम की 150वीं वर्षगांठ पर चल रही बहस ने फिर सांप्रदायिक रंग ले लिया। जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने दो टूक कहा – “हमें किसी के वंदे मातरम गाने पर ऐतराज नहीं, लेकिन मुसलमान अल्लाह के सिवा किसी की इबादत नहीं कर सकता। मर जाना मंजूर है, शिर्क (अल्लाह के साथ किसी को शरीक करना) कतई मंजूर नहीं।” मदनी ने गीत के आगे के अंतरे में दुर्गा, लक्ष्मी जैसे देवी-देवताओं का जिक्र बताया और कहा कि ये इस्लाम की एकेश्वरवाद की भावना के खिलाफ है।
मदनी ने 1937 के कांग्रेस फैसले का हवाला दिया जब टैगोर की सलाह पर सिर्फ पहले दो अंतरे अपनाए गए थे। उन्होंने कहा, “संविधान अनुच्छेद 25 और 19 धार्मिक स्वतंत्रता देता है। किसी को जबरन गीत गवाना असंवैधानिक है।” उन्होंने सवाल उठाया – “देश में आर्थिक संकट की रिपोर्ट्स आ रही हैं, बेरोजगारी चरम पर है, लेकिन बहस सिर्फ वंदे मातरम पर क्यों?”
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बीजेपी ने तुरंत पलटवार किया। पूर्व केंद्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने कहा, “ये मुस्लिम लीग वाली जहरीली सोच है। लीग खत्म हो गई, लेकिन उसकी मानसिकता बाकी है। राष्ट्रगीत गाने से अगर ईमान खतरे में आता है तो इससे बड़ा बेईमान कोई नहीं।” नकवी ने याद दिलाया कि स्वतंत्रता संग्राम में भी लीग ने वंदे मातरम का विरोध किया था। ये विवाद नया नहीं। 1905 में बंग-भंग आंदोलन से लेकर आज तक वंदे मातरम पर सवाल उठते रहे हैं। एक तरफ ये आजादी का नारा था, दूसरी तरफ कुछ समुदायों के लिए धार्मिक भावनाओं का मामला। संविधान सभा ने जन गण मन को राष्ट्रगान और वंदे मातरम को राष्ट्रगीत बनाकर बीच का रास्ता निकाला। लेकिन 150 साल बाद भी सवाल वही – क्या राष्ट्रप्रेम को गीत से जोड़ा जाए या दिल से?
मदनी ने अपील की – “ये बहस राजनीतिक फायदे के लिए न हो। देश की एकता और संविधान का सम्मान करें।” नकवी ने जवाब दिया – “देशभक्ति साबित करने का सर्टिफिकेट किसी को देने की जरूरत नहीं।”
