अपना अंतिम सांस गिन रहा है नेपाल का अधकचरा लोकतंत्र?

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  • पूर्व नरेश ज्ञानेंद्र के दशहरा पर्व पर दिए गए शुभकामना संदेश का निहितार्थ
  • नेपाल में तय समय-सीमा के भीतर चुनाव हो पाएगा उसे लेकर भी राजनीतिक दलों में असमंजस
  • हमारे भविष्य की आधारशिला है युवा पीढ़ी : ज्ञानेंद्र

उमेश चन्द्र त्रिपाठी

नेपाल में यद्यपि कि सुशीला कार्की के नेतृत्व में अंतरिम सरकार ने काम करना प्रारंभ कर दिया है लेकिन जनता में यह भ्रम बना हुआ है कि नेपाल का आगे का भविष्य क्या होगा? जिस गति से पुराने राजनीतिक दलों के नेताओं के खिलाफ एफआईआर दर्ज हो रहे हैं और उनके खिलाफ जांच के लिए आयोग का गठन किया गया है उससे ऐसा लगता है नेपाल की राजनीति में उन्हें दरकिनार करने की लंबी तैयारी है। यदि ऐसा हो पाया तो निसंदेह नेपाल का अधकचरा लोकतंत्र अपने अंतिम सांस के करीब है।फिलहाल अभी जो दृश्य है वह नेपाल के लिए बहुत शुभ नहीं है। हैरत है कि पिछले दिनों जेन जी आंदोलन में तहस नहस हुए नेपाल को संवारने के लिए कोई दूसरा या तीसरा देश दिलचस्पी नहीं दिखा रहा है जैसा कि भूकंप से तबाह हुए नेपाल के लिए दुनिया के तमाम देश सहयोग को आगे आए थे। इससे ऐसा लगता है कि नेपाल के मित्र देशों को भी छ महीने बाद होने वाले आम चुनाव के बाद नए नेपाल के राजनीतिक दिशा का इंतजार है। इसी के साथ दशहरा पर्व के अवसर पर पूर्व नरेश ज्ञानेंद्र का देश के नाम संदेश भी चर्चा में है। यद्यपि कि पूर्व नरेश का यह संदेश जनता के नाम शुभकामना संदेश था लेकिन इस बार के संदेश के मायने अलग है।

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बताने की जरूरत नहीं कि जेन जी आंदोलन के वक्त जब नेपाल जल रहा था तब पूर्व नरेश ज्ञानेंद्र के कट्टर समर्थक जिसे राज संस्था का हिमायती कहा जाता है, दुर्गा प्रसाई सेना प्रमुख के कक्ष में विराजमान होकर राजा शासन की बहाली की रणनीति पर विचार विचार-विमर्श कर रहे थे। नेपाल के सेना प्रमुख को राजशाही का समर्थक बताया जाता है। लोकतांत्रिक सरकार के कार्यकाल में भी उनके कक्ष में नेपाल के जनक माने जाने वाले नरेश पृथ्वी शाह की तस्वीर लगी हुई है। कार्की सरकार फिलहाल अभी ओली सहित उनके मंत्रिमंडल के मंत्रियों के खिलाफ कार्रवाई और जांच पड़ताल में जुटी है जैसा कि जेन जी समूह की मंशा है। ऐसा लगता है कि कार्की सरकार का छः महीने का कार्यकाल पूर्व की सरकार को भ्रष्ट और बेइमान साबित करने में ही बीत जाएगा। ओली और उनकी सरकार के लगभग सभी मंत्री भ्रष्ट और बेइमान थे, इसमें संदेह की गुंजाइश नहीं है। ऐसे में आगामी छह महीने बाद नेपाल में तय समय-सीमा में चुनाव हो पाएगा, इसे लेकर भी असमंजस है। क्योंकि चुनाव में हिस्सा लेने के लिए राजनीतिक दलों के लिए यह समय बहुत अधिक नहीं है। लेकिन जिस तरह भंग प्रतिनिधि सभा के सदस्यों और राजनीतिक दलों ने खामोशी अख्तियार कर ली है उससे तय समय-सीमा में चुनाव हो पाने के संदेह को और गहरा करता है। आंदोलन, आगजनी और हिंसा के बाद नेपाल की राजनीति डरी हुई जान पड़ रही है।

डर के इस माहौल में नेपाल में दो तरह की राजनीति जन्म लेती हुई दिखाई पड़ रही है जो जनता को अपनी ओर आकर्षित कर सकती है। प्रथम तो राजशाही और दूसरा ग्रेटर नेपाल ! राजशाही का जिक्र क्या करें। नेपाल चार सौ साल तक राजशाही के शिकंजे में रहा ही है। इस दौरान दो बार लोकतंत्र के लिए आवाज उठी। पहली बार 1960 में प्रधानमंत्री रहे स्वर्गीय वीपी कोइराला के नेतृत्व में राजा के खिलाफ आवाज उठाई गई थी जिसे तत्कालीन नरेश ने छल-कपट के जरिए दबा दिया था, दूसरा 1996 में। 1996 का यह आंदोलन जनयुद्ध में तब्दील हो गया था जिसमें 17 हजार लोग मारे गए थे। इस आंदोलन का नेतृत्व माओवादियों के हाथ में था। लंबे समय तक चले इस आंदोलन का परिणाम यह रहा कि नरेश ज्ञानेंद्र को 2008 में सत्ता छोड़ने को मजबूर होना पड़ा और नेपाल में लोकतंत्र के सूरज का उदय हुआ।

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ग्रेटर नेपाल राजशाही के जमाने का पुराना राग है। जिसमें नेपाल सीमा से सटे भारत के लंबे चौड़े भू-भाग को नेपाल का हिस्सा बताया गया है। ग्रेटर नेपाल का नक्शा भी जारी कर उसमें भारतीय क्षेत्रों को नेपाल का दर्शाया गया है। इस मांग को नए सिरे से उभार कर काठमांडू के मेयर बालेन शाह अपनी राजनीति चमकाने की कोशिश कर सकते हैं। बालेन शाह की शिनाख्त लोकप्रिय नेपाली रैपर की है। इसी शिनाख्त के बदौलत वे काठमांडू वैली जैसे नेपाल के सबसे बड़े नगर निगम के मेयर चुने गए। उनके कार्यालय में ग्रेटर नेपाल का नक्शा टंगा हुआ है। जेन जी आंदोलन के बाद जब अंतरिम सरकार के प्रधानमंत्री के चयन की बात चली तो जेन जी समूह का बड़ा वर्ग बालेन शाह को प्रधानमंत्री बनाने के पक्ष में था। वे प्रधानमंत्री भले नहीं बन पाए लेकिन युवाओं का बड़ा हिस्सा अभी भी उनके समर्थन में है।

कहना न होगा कि आंदोलन की आग में नेपाल के इमारत, घर मकान और जरूरी दस्तावेज ही नहीं जले, देखें तो नेपाल की राजनीति भी भस्म हुई है। जेन जी समूह ने पुराने राजनीतिक दलों में ऐसा डर पैदा किया है कि वे सहमें हुए हैं। बेइमान और भ्रष्टाचार के मुद्दे पर जनता जेन जी समूह के साथ है। भय और डर के इस माहौल में बालेन शाह अपनी राजनीति का दायरा बढ़ाने में व्यस्त हैं वहीं राजा समर्थकों का बड़ा वर्ग एक बार फिर नेपाल में राजशाही की बिसात बिछा रहा है। मजे की बात यह है कि नेपाली कांग्रेस सहित अन्य दलों के तमाम बड़े नेता पूर्व नरेश ज्ञानेंद्र के संपर्क में हैं।

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दशहरे के मौके पर पूर्व नरेश ज्ञानेंद्र का जनता के नाम भावनात्मक संदेश को नेपाल में बदल रही राजनीतिक परिदृश्य की दृष्टि से देखा जा रहा है। पूर्व नरेश ज्ञानेंद्र ने नेपाली जनता को याद दिलाया है कि उनके पूर्वजों ने जिस त्याग, बलिदान और अदम्य साहस से नेपाल की एकता, अखंडता, सार्वभौमिकता और संप्रभुता की रक्षा की, वही हमारे अस्तित्व, स्वाभिमान और गौरवशाली संस्कृति की रीढ़ है। इन्हीं आदर्शों के सहारे नेपाल सदा से स्वतंत्र और स्वाभिमानी राष्ट्र के रूप में खड़ा रहा है। हमें किसी भी प्रकार की पराधीनता या भू-राजनीतिक जाल में उलझे बिना, अपनी राह स्वयं तय करते हुए “अखण्ड नेपाल” के नवनिर्माण की ओर अग्रसर होना है। अपने संदेश में पूर्व नरेश ज्ञानेंद्र ने युवाओं पर भी फोकस किया है। कहा कि युवा पीढ़ी हमारे भविष्य की आधारशिला है। उनमें निहित देशभक्ति, ऊर्जा और नवीन चिंतन ही वह शक्ति है जो राष्ट्र को मजबूत, समृद्ध और आत्मनिर्भर बनाएगी।

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