रायबरेली से सुप्रीम कोर्ट तक, कांग्रेस ने दलित उत्पीड़न को बनाया बड़ा चुनावी मुद्दा

Supreme court NayaLook
  अजय कुमार

बिहार के चुनावी मौसम में इस बार हवा कुछ अलग बह रही है। जहां एक तरफ विकास, रोजगार और बुनियादी सुविधाओं की बातें जोर पकड़ रही हैं, वहीं रायबरेली में दलित युवक हरिओम वाल्मीकि की पीट-पीटकर हत्या और सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस बीआर गवई पर जूता उछालने की घटना अब बिहार विधानसभा चुनाव का बड़ा मुद्दा बनने जा रही हैं। कांग्रेस पार्टी इन घटनाओं को हाथों-हाथ लेकर दलित और पिछड़े वर्ग के वोटरों को साधने की पूरी तैयारी में जुट गई है। पार्टी के नेता कहते हैं कि ये सिर्फ दो घटनाएं नहीं, बल्कि भाजपा शासित राज्यों में दलितों पर हो रहे अत्याचारों का जीता-जागता सबूत हैं।सबसे पहले बात करते हैं रायबरेली की उस दर्दनाक घटना की, जो पूरे देश को झकझोर रही है। दो अक्टूबर 2025 को रायबरेली के ऊंचाहार इलाके में 38 साल के दलित युवक हरिओम वाल्मीकि को गांव वालों ने चोरी के शक में इतनी बेरहमी से पीटा कि उसकी जान चली गई। हरिओम अपनी ससुराल ईश्वरदासपुर आया था, लेकिन गांव वालों ने उसे ड्रोन चोर समझ लिया।

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दो घंटे तक लाठी-डंडों, बेल्ट और लात-घूंसों से पिटाई होती रही। हरिओम कराहते हुए बार-बार ‘राहुल गांधी-राहुल गांधी’ का नाम ले रहा था, मानो मदद की गुहार लगा रहा हो। हैरानी की बात यह है कि पुलिस मौके पर पहुंची, लेकिन हरिओम को अस्पताल ले जाने की बजाय गांव वालों के हवाले छोड़ दिया। हरिओम की पत्नी का कहना है कि पुलिस ने उसे मरने के लिए छोड़ दिया। किसी ने इस पूरी घटना के तीन वीडियो बना लिए, जो अब सोशल मीडिया पर वायरल हो चुके हैं। वीडियो में हरिओम की चीखें और उसकी आखिरी सांसें साफ सुनाई दे रही हैं, जो किसी भी इंसान का कलेजा चीर सकती हैं। पुलिस ने इस मामले में चार लोगों को गिरफ्तार किया है, लेकिन परिवार का आरोप है कि असली दोषी अब भी आजाद घूम रहे हैं। हरिओम के पिता गंगादीन ने बताया कि उनका बेटा मजदूरी करता था और परिवार की कमर टूट गई है। इस घटना ने एक बार फिर मॉब लिंचिंग के पुराने घावों को कुरेद दिया है, जहां दलित और कमजोर वर्ग के लोग आसानी से निशाना बन जाते हैं। कांग्रेस ने इसे समाज पर कलंक बताया और भाजपा सरकार पर सवाल उठाए कि क्या यूपी में जंगलराज चल रहा है?

वीडियो वायरल होने के बाद विपक्षी नेता राहुल गांधी ने तुरंत हरिओम के परिवार से फोन पर बात की। उन्होंने परिवार को न्याय का भरोसा दिलाया और अपने एक्स हैंडल पर एक भावुक पोस्ट शेयर किया। राहुल ने लिखा, रायबरेली में दलित युवक हरिओम वाल्मीकि की निर्मम हत्या सिर्फ एक इंसान की नहीं- इंसानियत, संविधान और न्याय की हत्या है। आज भारत में दलित, आदिवासी, मुसलमान, पिछड़े और गरीब- हर उस व्यक्ति को निशाना बनाया जा रहा है, जिसकी आवाज कमजोर है, जिसकी हिस्सेदारी छीनी जा रही है और जिसकी जिंदगी सस्ती समझी जाती है। देश में नफरत, हिंसा और भीड़तंत्र को सत्ता का संरक्षण मिला हुआ है जहां संविधान की जगह बुलडोजर ने ले ली है और इंसाफ की जगह डर ने। मैं हरिओम के परिवार के साथ खड़ा हूं- उन्हें न्याय जरूर मिलेगा।

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भारत का भविष्य समानता और मानवता पर टिका है और यह देश चलेगा संविधान से, भीड़ की सनक से नहीं। राहुल की यह पोस्ट लाखों लोगों तक पहुंच चुकी है और दलित समुदाय में काफी सराही जा रही है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, जो खुद दलित समुदाय से हैं, ने भी इस घटना की कड़ी निंदा की। उन्होंने कहा कि मॉब लिंचिंग और बुलडोजर अन्याय आज की भयावह हकीकत बन गए हैं। खरगे और राहुल ने संयुक्त बयान में इसे संविधान के खिलाफ अपराध बताया। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अजय राय ने पीड़ित परिवार से मिलकर सरकार से नौकरी और मुआवजे की मांग की। कांग्रेस सांसद तनुज पुनिया और राजेंद्र गौतम जैसे नेता भी परिवार से मिले और बोले कि भाजपा में दलितों का उत्पीड़न हो रहा है। यह घटना फतेहपुर के दलित समाज में आक्रोश पैदा कर रही है, जहां हरिओम को राहुल का नाम लेने पर और पीटा गया।

इस घटना के ठीक बाद, छह अक्टूबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट में एक और चौंकाने वाली वारदात हुई। चीफ जस्टिस बीआर गवई, जो खुद दलित समुदाय से आते हैं, पर 71 साल के वकील राकेश किशोर ने जूता उछाल दिया। राकेश बरेली का रहने वाला है और खुद को सनातन धर्म का रक्षक बताता है। वह कहता है कि सीजेआई की एक पुरानी टिप्पणी से आहत था। दरअसल, 16 सितंबर को एक याचिका पर सुनवाई के दौरान जस्टिस गवई ने मध्य प्रदेश के खजुराहो मंदिर में भगवान विष्णु की सिर कटी मूर्ति को लेकर याचिकाकर्ता से मजाक में कहा था कि मूर्ति से प्रार्थना करो, शायद वह अपना सिर वापस लगा ले। राकेश ने इसे सनातन धर्म का अपमान माना और कोर्ट में ही जूता फेंक दिया। हालांकि, सुरक्षाकर्मियों ने उसे तुरंत पकड़ लिया। राकेश ने बाद में कहा, मुझे कोई अफसोस नहीं, ये सब ऊपर वाले ने कराया। मैं सनातन का अपमान सहन नहीं कर सकता। हैरानी की बात यह है कि राकेश पर कोई केस दर्ज नहीं हुआ। चीफ जस्टिस गवई ने खुद इसे अनदेखा करने को कहा और बोले, इसे अनदेखा कर दीजिए, मैं इससे विचलित नहीं होने वाला। लेकिन सोशल मीडिया पर इस घटना ने तूफान मचा दिया। कुछ लोग इसे दलितों के खिलाफ नफरत का प्रतीक बता रहे हैं, तो कुछ इसे न्यायपालिका पर हमला। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जस्टिस गवई से फोन पर बात की और घटना पर चिंता जताई। सोनिया गांधी ने भी निंदा की। विपक्षी नेता जैसे अखिलेश यादव और संजय राउत ने इसे भाजपा की साजिश बताया और कहा कि यह संविधान पर हमला है। राकेश का बयान कि दूसरे समुदाय के जज सनातन का मजाक उड़ाते हैं ने दलित समाज को और भड़का दिया है।

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अब सवाल यह है कि ये दोनों घटनाएं बिहार चुनाव में कैसे मुद्दा बन रही हैं? बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की घोषणा हो चुकी है। दो चरणों में वोटिंग होगी- 6 नवंबर और 11 नवंबर को, जबकि नतीजे 14 नवंबर को आएंगे। यहां दलित वोटरों की संख्या करीब 16-19 प्रतिशत है, जो चुनावी नतीजों को पलट सकती है। कांग्रेस पार्टी इन घटनाओं को अपनी रणनीति का हिस्सा बना रही है। पार्टी की थीम है- दलित गरीब हो या सीजेआई, भाजपा राज में ये निशाने पर, संविधान-लोकतंत्र खतरे में। कांग्रेस ने बिहार में अपना प्रदेश अध्यक्ष दलित समुदाय से आने वाले राजेश राम को बनाया है, जो काफी पहले से तैयारी का हिस्सा है। राहुल गांधी हर सभा में दलित मुद्दों को उठा रहे हैं। वह संविधान पर हमले, आरक्षण और जाति जनगणना की बात करते हैं। हाल ही में उन्होंने नालंदा और गया में अत्यंत पिछड़ा वर्ग सम्मेलन किया, जहां सीएम नीतीश कुमार को चुनौती दी। राहुल ने सरकारी नौकरियों और ठेकों में ईबीसी आरक्षण का दांव चला, जो बिहार के पिछड़ों को लुभा रहा है। कांग्रेस महागठबंधन में 55 सीटों पर लड़ने की तैयारी में है, जहां राजद के साथ सीट बंटारे पर मुहर लग चुकी है। पार्टी सीमांचल इलाके पर फोकस कर रही है, जहां मुस्लिम और दलित वोटर ज्यादा हैं।

बिहार में दलित वोटरों का इतिहास देखें तो वे कभी एकमुश्त किसी पार्टी को नहीं जाते। रविदास और पासवान जातियां प्रमुख हैं। एनडीए में जीतन राम मांझी और चिराग पासवान खुद को दलितों का हितैषी बताते हैं, लेकिन कांग्रेस का कहना है कि भाजपा-जदयू सरकार में दलित अत्याचार बढ़े हैं। चुनाव आयोग पर भी आरोप लग रहे हैं कि वोटर लिस्ट में फर्जीवाड़ा हो रहा है। कई जगह जिंदा दलितों को मृत दिखाया गया है, जबकि मृतकों को जिंदा। कांग्रेस का दावा है कि यह गरीब-दलितों के वोट चुराने की साजिश है। राहुल की वोटर अधिकार यात्रा ने 23 जिलों में वोट चोरी को मुद्दा बनाया। विपक्षी पार्टियां जैसे राजद और सीपीआईएमएल भी दलितों पर फोकस कर रही हैं। CPIML  के दीपांकर भट्टाचार्य कहते हैं कि बिहार में दलित बस्तियों में आग लगाकर बेदखली हो रही है, मजदूरों के हाथ काटे जा रहे हैं।

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पिछले 20 साल की सरकार में बेरोजगारी और पलायन चरम पर है। प्रशांत किशोर की जनसुराज पार्टी भी नए विकल्प के रूप में उभर रही है, लेकिन राहुल और तेजस्वी का भरोसा दलितों को अपनी ओर खींच रहा है। ये मुद्दे चुनाव को नया मोड़ दे सकते हैं। जहां भाजपा विकास और मोदी-योगी की छवि पर जोर दे रही है, वहीं कांग्रेस दलितों की भावनाओं को भुनाने की कोशिश में है। रायबरेली और सीजेआई घटना ने दलितों में गुस्सा भरा है, जो बिहार में वोट बन सकता है। अगर कांग्रेस सफल हुई, तो यह न सिर्फ बिहार बल्कि पूरे देश की राजनीति को प्रभावित करेगा। अंत में, सवाल यही है- क्या संविधान और न्याय की लड़ाई चुनावी जीत दिलाएगी या विकास की बातें हावी रहेंगी? बिहार के मतदाता ही फैसला करेंगे।

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