इलाहाबाद हाई कोर्ट के न्यायाधीश यशवंत वर्मा ने राष्ट्रपति को अपना इस्तीफा सौंप दिया है। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब उनके खिलाफ कथित तौर पर घर से नकदी मिलने के मामले में जांच जारी है। इस घटनाक्रम ने न्यायपालिका और राजनीति दोनों ही क्षेत्रों में चर्चा तेज कर दी है। बताया जाता है कि जब जस्टिस वर्मा दिल्ली हाई कोर्ट में पदस्थ थे, तब उनके आवास से कथित रूप से जले हुए नोट बरामद होने का मामला सामने आया था। इस घटना के बाद मामला सुर्खियों में आ गया और उन्हें वापस इलाहाबाद हाई कोर्ट ट्रांसफर कर दिया गया। उन्होंने अप्रैल 2025 में वहां शपथ ली थी।
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इस मामले में इन-हाउस जांच प्रक्रिया पहले से ही चल रही है। इसके साथ ही संसद के स्तर पर भी उन्हें पद से हटाने की प्रक्रिया पर विचार किया जा रहा है। Om Birla ने इस मामले की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन किया है, जो आरोपों की गंभीरता और तथ्यों की जांच कर रही है। जांच समिति में उच्च न्यायालय और सुप्रीम कोर्ट से जुड़े वरिष्ठ सदस्य शामिल हैं। समिति की रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई तय की जाएगी। अगर आरोप साबित होते हैं, तो संसदीय प्रक्रिया के तहत न्यायाधीश को पद से हटाया जा सकता है।
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इस पूरे मामले में एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि जस्टिस वर्मा ने पहले इस जांच प्रक्रिया को चुनौती दी थी। उन्होंने याचिका दायर कर कहा था कि उनके खिलाफ बनाई गई संसदीय समिति वैध नहीं है। हालांकि भारत का सर्वोच्च न्यायालय ने इस याचिका को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि संसद की प्रक्रिया में हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता। पिछले एक साल से यह मामला लगातार चर्चा में बना हुआ है। राजनीतिक दलों ने भी इस पर अपनी-अपनी प्रतिक्रियाएं दी हैं। न्यायपालिका की पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर भी बहस तेज हो गई है। अब जस्टिस वर्मा के इस्तीफे के बाद यह मामला एक नए मोड़ पर पहुंच गया है। हालांकि जांच अभी भी जारी है और अंतिम निर्णय समिति की रिपोर्ट के बाद ही लिया जाएगा। यह मामला आने वाले समय में न्यायिक प्रणाली की विश्वसनीयता और प्रक्रियाओं पर भी असर डाल सकता है।
