नई दिल्ली। दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था मानी जाने वाली संयुक्त राज्य अमेरिका इस समय गंभीर आर्थिक चुनौतियों से जूझ रही है। एक तरफ युद्ध का बढ़ता खर्च है, तो दूसरी ओर आसमान छूती तेल की कीमतों ने अर्थव्यवस्था पर भारी दबाव बना दिया है। जानकारों का मानना है कि अगर ईरान के साथ संघर्ष लंबा खिंचता है, तो अमेरिका गहरी मंदी की चपेट में आ सकता है।
ईंधन की कीमतों ने बढ़ाई चिंता
युद्ध से पहले अमेरिका में पेट्रोल की कीमतें 3 डॉलर प्रति गैलन से नीचे थीं, लेकिन अब यह 4 डॉलर के पार पहुंच चुकी हैं। वहीं डीजल की कीमतों में करीब 47% का उछाल आया है और यह 5.50 डॉलर प्रति गैलन से ऊपर निकल गया है। इससे ट्रांसपोर्टेशन महंगा हो गया है, जिसका सीधा असर आम लोगों की जेब और बाजार में वस्तुओं की कीमतों पर पड़ रहा है।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बना संकट का केंद्र
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के प्रभावित होने से वैश्विक सप्लाई चेन पर बड़ा असर पड़ा है। इसका असर कई सेक्टर्स में साफ दिख रहा है,
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मंदी की आहट और स्टैगफ्लेशन का खतरा
KPMG की चीफ इकोनॉमिस्ट डायने स्वोंक ने चेतावनी दी है कि अगर होर्मुज क्षेत्र में संकट 4-6 हफ्ते तक जारी रहता है, तो अमेरिका में मंदी लगभग तय है। 2026 के लिए ग्रोथ अनुमान 2.6% से घटाकर 1% कर दिया गया है। अर्थशास्त्रियों को डर है कि स्थिति 1970 के दशक जैसी ‘स्टैगफ्लेशन’ में बदल सकती है, जहां महंगाई चरम पर होती है और आर्थिक विकास ठहर जाता है।
युद्ध खत्म होने पर भी नहीं मिलेगी तुरंत राहत
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भले ही जल्द सैन्य सफलता का दावा कर रहे हों, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि हालात इतनी जल्दी सामान्य नहीं होंगे। तेल उत्पादन दोबारा शुरू करने और युद्ध से क्षतिग्रस्त ढांचे को ठीक करने में महीनों से लेकर सालों तक का समय लग सकता है।
