नई दिल्ली। नई शिक्षा नीति के तहत तैयार की गई एक एनसीईआरटी किताब में प्रकाशित एक टिप्पणी को लेकर देशभर में विवाद खड़ा हो गया है। किताब में एक चित्र के संदर्भ में यह उल्लेख किया गया था कि ब्राह्मणों ने ब्रिटिश शासक ‘ब्रिटानिया’ को शास्त्र सौंपे और भारतीय संस्कृति की रक्षा के लिए अंग्रेजों को आमंत्रित किया। इस टिप्पणी को लेकर ब्राह्मण समाज के कई संगठनों और शिक्षाविदों ने कड़ी आपत्ति जताई है।
विवाद सामने आने के बाद कई सामाजिक संगठनों ने इसे एक पूरे समुदाय को गलत तरीके से प्रस्तुत करने का आरोप लगाया। उनका कहना है कि इस प्रकार की सामग्री से समाज में गलत संदेश जाता है और इससे सामाजिक सौहार्द प्रभावित हो सकता है। विरोध करने वाले संगठनों का कहना है कि बच्चों की पाठ्य पुस्तकों में इस तरह के संदर्भ शामिल करना उचित नहीं है।
ब्राह्मण समाज के प्रतिनिधियों ने कहा कि इतिहास और संस्कृति से जुड़े विषयों को पढ़ाते समय तथ्यों की सटीकता और संतुलन बनाए रखना बेहद जरूरी है। उनका कहना है कि यदि किसी समुदाय के बारे में गलत या विवादास्पद टिप्पणी शामिल की जाती है तो उससे विद्यार्थियों के मन में भ्रम पैदा हो सकता है। विवाद बढ़ने के बाद एनसीईआरटी ने संबंधित सामग्री को किताब से हटाने का फैसला किया है। संस्थान की ओर से कहा गया है कि विवाद को देखते हुए इस हिस्से की समीक्षा की जाएगी और जरूरत पड़ने पर पाठ्य सामग्री में बदलाव किया जाएगा। हालांकि इस निर्णय के बाद भी कई लोग यह सवाल उठा रहे हैं कि आखिर इस तरह की सामग्री किताब में शामिल कैसे हो गई।
शिक्षा जगत से जुड़े कई विशेषज्ञों का कहना है कि पाठ्य पुस्तकों को तैयार करते समय समीक्षा की प्रक्रिया को और अधिक मजबूत बनाया जाना चाहिए। उनका मानना है कि किसी भी सामग्री को प्रकाशित करने से पहले इतिहासकारों, शिक्षाविदों और विषय विशेषज्ञों की राय लेना आवश्यक है। कुछ शिक्षाविदों ने यह भी कहा कि शिक्षा का उद्देश्य समाज को जोड़ना और ज्ञान प्रदान करना है। इसलिए पाठ्य सामग्री में ऐसे संदर्भ शामिल नहीं होने चाहिए जो किसी समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुंचा सकते हों।
इस विवाद के बाद एनसीईआरटी की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठने लगे हैं। आलोचकों का कहना है कि यदि पाठ्य सामग्री की समीक्षा ठीक तरीके से की जाती तो ऐसी स्थिति पैदा नहीं होती।
