
लोकसभा में उस समय राजनीतिक माहौल गरमा गया जब स्पीकर ओम बिड़ला के अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान सत्ता पक्ष और नामांकन के नेताओं के बीच अविश्वास प्रस्ताव देखने को मिला। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और बीजेपी के अल्पसंख्यक नेता रविशंकर प्रसाद के बीच हुई नोकझोंक ने सदन का माहौल और भी गर्म कर दिया।
बहस के दौरान राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि उन्हें कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर बोलने का अवसर नहीं दिया गया। उन्होंने कहा कि जब भी उन्होंने प्रधानमंत्री Narendra Modi से जुड़े संवेदनशील विषय उठाने की कोशिश की, तब उन्हें बीच में ही रोक दिया गया। राहुल गांधी ने अपने भाषण में पूर्व सेना प्रमुख Manoj Mukund Naravane की किताब का भी जिक्र करने की कोशिश की और कुछ अंतरराष्ट्रीय मुद्दों का हवाला दिया। राहुल गांधी ने कहा कि संसद में विपक्ष की आवाज को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जा रहा है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कुछ मुद्दों को उठाने से पहले ही उन्हें बोलने से रोक दिया गया। उनके इन आरोपों के बाद सदन में कुछ समय के लिए हंगामे की स्थिति बन गई।
इस पर जवाब देते हुए रविशंकर प्रसाद ने राहुल गांधी के आरोपों को पूरी तरह खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ लगाए गए आरोप निराधार हैं और बिना तथ्यों के ऐसी बातें करना संसद की गरिमा के अनुकूल नहीं है। रविशंकर प्रसाद ने यह भी कहा कि किसी भी चर्चा में नियमों का पालन करना जरूरी है। उन्होंने यह सवाल उठाया कि क्या ‘पॉइंट ऑफ ऑर्डर’ के दौरान विस्तृत बहस की अनुमति होती है। उनके अनुसार सदन की कार्यवाही निर्धारित प्रक्रिया के तहत चलती है और उसी का पालन होना चाहिए।
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भाजपा नेता ने स्पीकर के खिलाफ लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर भी सवाल उठाए। उनका कहना था कि इस प्रस्ताव का उद्देश्य स्पष्ट नहीं है और इसे राजनीतिक मुद्दा बनाकर पेश किया जा रहा है। उन्होंने विपक्ष से अपील की कि संसद की कार्यवाही को व्यक्तिगत राजनीतिक मतभेदों के लिए इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। दरअसल यह पूरा विवाद उस समय शुरू हुआ जब राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव की चर्चा के दौरान राहुल गांधी ने कुछ संदर्भों का उल्लेख किया। उस समय रक्षा मंत्री Rajnath Singh ने आपत्ति जताते हुए कहा कि किसी अप्रकाशित पुस्तक का हवाला देना उचित नहीं है, क्योंकि उसकी सत्यता की पुष्टि नहीं की जा सकती।
इसके बाद विपक्ष की ओर से स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया, जिस पर कई विपक्षी सांसदों ने समर्थन जताया। इस प्रस्ताव पर सदन में लंबी चर्चा तय की गई। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह दिखाया कि संसद में राजनीतिक मतभेद कितने तीखे हो सकते हैं। हालांकि लोकतांत्रिक व्यवस्था में ऐसे विचारों का टकराव भी बहस और निर्णय प्रक्रिया का अहम हिस्सा माना जाता है।


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