सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला: SC/ST कब्जे का नियमितीकरण संभव

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  • लेकिन कोई सामान्य छूट नहीं

लखनऊ। सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि कुछ विशिष्ट परिस्थितियों में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) समुदाय के लोगों द्वारा निजी भूमि पर किया गया कब्जा कानून के तहत नियमित किया जा सकता है। हालांकि अदालत ने यह भी साफ कर दिया कि इसे किसी सामान्य नियम के रूप में नहीं देखा जा सकता और हर मामले का निर्णय उसके तथ्यों तथा लागू कानून के आधार पर ही होगा।

यह मामला उत्तर प्रदेश जमींदारी विनाश एवं भूमि व्यवस्था अधिनियम, 1950 (UP ZA & LR Act) की धारा 123 की व्याख्या से जुड़ा था। अदालत ने कहा कि इस धारा में निहित “लीगल फिक्शन” (कानूनी कल्पना) के आधार पर, यदि कब्जा निर्धारित कट-ऑफ तारीख से पहले का है और कानून की शर्तों को पूरा करता है, तो उसे वैध माना जा सकता है। विवाद यूपी के मुजफ्फरनगर जिले (शामली क्षेत्र) की एक भूमि से जुड़ा था। मूल भूमि स्वामी खजान सिंह थे। वर्ष 1976-77 के आसपास SC/ST समुदाय के कुछ लोगों ने कथित रूप से उस भूमि पर कब्जा कर आवास बना लिए। बाद में 1984 में भूमि स्वामी के वारिसों ने जमीन अन्य खरीदारों को बेच दी और खरीदारों ने भूमि की प्रकृति कृषि से आवासीय करवा ली।

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वर्ष 1989 में उप-जिलाधिकारी ने आदेश पारित करते हुए कहा कि चूंकि कब्जाधारियों ने 30 जून 1985 से पहले उस भूमि पर मकान बना लिए थे, इसलिए उनके नाम राजस्व अभिलेखों में दर्ज किए जाएं। खरीदारों ने इस आदेश को पहले उच्च न्यायालय और फिर सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने अपील खारिज करते हुए माना कि कब्जाधारियों का कब्जा कट-ऑफ तारीख से पहले का था और धारा 123(2) के तहत लागू “लीगल फिक्शन” के कारण उनके पक्ष में नियमितीकरण संभव है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि बाद में भूमि की प्रकृति में किया गया परिवर्तन इस कानूनी स्थिति को प्रभावित नहीं करता।

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फैसले के बाद कुछ स्थानों पर यह भ्रम फैल गया कि SC/ST समुदाय द्वारा किया गया कोई भी अवैध कब्जा अब वैध माना जाएगा। कानूनी रूप से यह धारणा सही नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने कोई व्यापक या सामान्य सिद्धांत स्थापित नहीं किया है। यह फैसला भूमि विवादों में “लीगल फिक्शन” की अवधारणा की भूमिका को स्पष्ट करता है। अदालत ने संकेत दिया कि जहां कानून सामाजिक न्याय के उद्देश्य से विशेष प्रावधान करता है, वहां तकनीकी आपत्तियों के आधार पर वैधता को नकारा नहीं जा सकता।साथ ही यह भी रेखांकित किया गया कि निजी भूमि स्वामियों के अधिकार स्वतः समाप्त नहीं होते। हर मामला अपने तथ्यों और कानूनी कसौटी पर परखा जाएगा। यह निर्णय सामाजिक न्याय और संपत्ति अधिकारों के बीच संतुलन की न्यायिक कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।

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