भारतीय रेलवे ने देश के इंफ्रास्ट्रक्चर और आर्थिक विकास में अपनी भूमिका को एक बार फिर मजबूती से साबित किया है। ताजा आर्थिक सर्वे और रेलवे से जुड़े आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, मार्च 2025 तक भारत का कुल रेल नेटवर्क 69,439 किलोमीटर तक पहुंच चुका है। यह आंकड़ा न सिर्फ भारत को दुनिया के सबसे बड़े रेल नेटवर्क वाले देशों में शामिल करता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि रेलवे देश की विकास यात्रा की रीढ़ बन चुका है।
भारतीय रेलवे अब केवल यात्रियों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने का माध्यम नहीं रह गया है। यह औद्योगिक सप्लाई चेन, कृषि उत्पादों की ढुलाई, कोयला और ऊर्जा लॉजिस्टिक्स तथा निर्यात–आयात के लिए एक मजबूत आधार बन चुका है। बीते कुछ वर्षों में रेलवे के बुनियादी ढांचे में जिस तेजी से निवेश हुआ है, उसने नेटवर्क विस्तार को नई रफ्तार दी है।
इलेक्ट्रिफिकेशन में रचा गया रिकॉर्ड
रेलवे की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक इसका व्यापक विद्युतीकरण अभियान है। अक्टूबर 2025 तक देश के कुल रेल नेटवर्क का 99.1 प्रतिशत हिस्सा इलेक्ट्रिफाइड हो चुका है। इसका मतलब यह है कि भारतीय रेलवे अब लगभग पूरी तरह डीजल आधारित इंजनों से बाहर निकलने की कगार पर है। इससे न केवल पर्यावरण को बड़ा फायदा होगा, बल्कि ईंधन आयात पर निर्भरता भी कम होगी।
इलेक्ट्रिफिकेशन से ट्रेनों की गति, परिचालन क्षमता और समयबद्धता में भी सुधार हुआ है। इसके साथ ही रेलवे के परिचालन खर्च में कमी आई है, जिससे लंबी अवधि में आर्थिक बचत संभव हो पाई है।
नेटवर्क विस्तार में आई दोगुनी रफ्तार
अगर पिछले दो दशकों की तुलना की जाए तो 2014 के बाद रेलवे नेटवर्क विस्तार की गति में उल्लेखनीय बढ़ोतरी देखने को मिली है। 2004 से 2014 के बीच जहां औसतन हर साल करीब 1,499 किलोमीटर नई रेल लाइनें चालू होती थीं, वहीं 2014 से 2024 के दौरान यह आंकड़ा बढ़कर औसतन 3,118 किलोमीटर प्रति वर्ष तक पहुंच गया है।
यह तेजी सिर्फ बड़े शहरों तक सीमित नहीं रही, बल्कि दूरदराज के इलाकों, सीमावर्ती क्षेत्रों और नॉर्थ-ईस्ट जैसे क्षेत्रों में भी रेलवे कनेक्टिविटी को मजबूती मिली है।
आने वाले वर्षों का रोडमैप
वित्त वर्ष 2026 में भारतीय रेलवे ने करीब 3,500 किलोमीटर नई रेल लाइनों के विस्तार का लक्ष्य रखा है। इसके साथ ही हाई-स्पीड रेल, डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर और आधुनिक सिग्नलिंग सिस्टम पर भी तेजी से काम किया जा रहा है।
