जीवन का कड़वा सच देखना है तो एक बार देख लीजिए जनरल डिब्बा

  • जनरल मतलब बिना रिजर्वेशन वाला डिब्बा

डॉ धनंजय मणि त्रिपाठी

नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर ट्रेन का इंतजार करते हुए एक आदमी ने पूछा -“गरीब रथ में जनरल डिब्बा किधर लगता है?” जनरल मतलब बिना रिजर्वेशन वाला डिब्बा। हमने बताया -“गरीब रथ में जनरल डिब्बा नहीं लगता।” फिर हमने बिना मांगे सलाह दी -“टीटी से पूछकर बैठ जाइए। टिकट बनवा लिजिएगा।” उसने कहा -“नहीं सर। ऐसी ट्रेन से जायेंगे जिसमें जनरल डिब्बा लगता हो। बाद में देर तक सोचता रहा कि पहले लगभग सब ट्रेनों में जनरल डिब्बे लगते थे। मैं अब कुछ ही बर्षों से एसी / रिजर्वेशन वाले डिब्बे में यात्रा करने लगा हूं, वरना हमेशा जनरल डिब्बा में ही यात्रा करता आया हूं। जनरल डिब्बा अब धीरे-धीरे कम होते-होते लगभग सभी ट्रेनों से गायब हो रहे हैं। यदि समय पूर्व आपका रिजर्वेशन नहीं है तो आप ट्रेन से सुरक्षित सुकून दायक यात्रा नहीं कर सकते। ट्रेनों के किराए भी धीरे-धीरे बढ़ते ही जा रहे हैं। लंबी दूरी की यात्राओं के लिए रिजर्वेशन मिलना मुश्किल हो गया। आम आदमी के लिए यात्रा मुश्किल हो गई है। मुश्किल तो पहले भी होता था लेकिन पहले जनरल डिब्बे होते थे। कुछ नहीं हुआ तो कष्ट सहकर, एक गोड़ पर खड़ा होकर भी चले ही जाएँगे। अब कष्टप्रद यात्रा का विकल्प भी सीमित हो रहा है।

(रेलवे की जानकारी के अनुसार जनरल डिब्बों की संख्या लगभग स्थिर है।)

नई दिल्ली से आगे गाजियाबाद में एक बुजुर्ग दंपति चढ़े। उनके पास छोटे-छोटे कई बैग थे। चढ़ाने में दिक्कत देखकर हमने उनका सामान चढ़वा लिया। रखवा दिया। गोरखपुर में उतरते समय भी सहायता कर दी। बुजुर्ग घर जाने के लिए ऑटो खोजने निकले तो मिला नहीं। टहलकर वापस आ गए बुजुर्ग। खड़े होकर कहने लगे -“यहाँ तो इतने ऑटो मिलते थे। आज पता नहीं क्यों नहीं मिल रहे हैं। संयोग से हम वहीं रुके थे। ऑटो मिलने में परेशानी के चलते हमने उनका पता पूछकर अपने मोबाइल से ओला एप उनके लिए ऑटो बुक कर दिया। उनको ताज्जुब हुआ कि मोबाइल से ऑटो कैसे आ गया। मैंने बताया आनलाइन बुक हो जाते हैं। उन्होंने कहा -“हम भी इसे लगायेंगे अपने मोबाइल में। ऑटो आने तक बातचीत के दौरान पता चला कि बुजुर्ग 2021 में उद्योग विभाग में एडिशनल कमिश्नर पद से रिटायर हुए हैं। बेटा एमबीबीएस करके एन एस डी (नेशनल स्कूल आफ ड्रामा) की तैयारी कर रहा है। मानता नहीं है। कहता है एक्टर ही बनना है।

उद्योग विभाग में एडिशनल कमिश्नर पद के पद से रिटायर होने के बाद भी उनको कैब बुकिंग के एप की जानकारी नहीं थी। ऐसा शायद इसलिए होगा कि वे नियमित यात्राएँ नहीं करते होंगे। पहले जरूरत नहीं पड़ती होगी। बाद में ऑटो मिल जाते होंगे। वे जब ऑटो से बैठकर चले गए तो हम भी घर की तरफ़ चल दिये। रास्ते में कई बार सोचा कि अपने मोबाइल से उनके लिए ऑटो बुक करके कहीं गड़बड़ तो नहीं किया। बार-बार यह ख्याल आता रहा कि कहीं कुछ लफड़ा हो गया तो बिना मतलब के फँस जाऊंगा। यह ख्याल बेबुनियाद था। लेकिन मन मे बार-बार रहा था । इतने लफड़े होते रहते हैं मोबाइल से बुकिंग, पैसे ट्रांसफर और तमाम कामों में। समाज में होने वाले नए-नए तरह के फ्राड और अपराध लोगों के आपसी विश्वास को कितना कम कर रहे हैं यह एहसास हुआ। लोग किसी की सहायता करने से पहले हजार बार सोचते हैं कि कहीं कोई लफड़ा न हो जाये। घर आकर मोबाइल में देखा कि अभी तक वे अपने घर नहीं पहुंचे हैं। ऑटो ड्राइवर को फ़ोन किया। उसने बताया कि जाम में फँसे होने के कारण ऑटो धीरे-धीरे चल रहा है। बुजुर्ग से भी बात की। उन्होंने अपना नंबर बताया और मिस्ड कॉल करने को कहा ताकि वे बाद में बात कर सकें। हमने मिस्ड कॉल कर दी। लेकिन अभी तक फ़ोन आया नहीं।

जनरल डिब्बे में
पहली सीढ़ी पर जगह बनाना है सिर्फ
फिर यात्रियों का सैलाब
खुद ही बहा ले जाता है भीतर तक
यहाँ जगह का मिलना
उतना ही काल्पनिक है
जितना बहुत से गरीबो को
भरपेट खाना मिलना
इन डिब्बों में सफर करती महिलाएँ
पानी की तरह अपनी जगह बना लेती हैं
सीट न सही फर्श तो है
जहाँ बैठ दूध पिलाती हैं बच्चे को
जीवन की तरह
काटती है यात्रा सफर की

जनरल डिब्बों के इन बच्चों के लिए
कोई अजनबी नहीं होता
हैरत भरी आंखों से दूसरों को देखते
इन बच्चों को हंसाने दूसरा यात्री
बच्चों-सी हरकतें करता है
हंसती है हवा तब खिडकियों पर

उतरने लगते हैं इनकी आंखों में
खिड़की पार के खेत और सूखी नदी
ऊँची बिल्डिंग और बाजू की झोपड़ी भी
विचारों में सुख दुख की पटरी
दूर कहीं एक हो रही है
पर होती है वह हमेशा अलग-अलग ही

कोई भी स्टेशन हो
छोटा शहर या महानगर
जनरल डिब्बे का दृश्य एक ही होता है
तारीखें बदलती है
लोग बदलते हैं
पर कभी नहीं बदलता यह दृश्य

रोज देश की आधी दुनिया
इसी तरह अपने छोटे-छोटे सपने बचाती
निकल पड़ती है जिंदगी की जद्दोजहद में
क्योंकि परिवार की जिम्मेदारी
साथ रखी मोटरी में बंधी है
जिसे समेट हर रोज निकलना है
रेल की इन अंतिम बोगियों का सच
देश की आधी दुनिया का सच है।।

 

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