
जब बिहार में लालू प्रसाद के जंगलराज की चर्चा पूरे देश में थी तब किसी पत्रकार ने उनसे इस जंगलराज के बारे में पूछा था तो लालू ने कहा था कि कोई जंगलराज नहीं है। दरअसल ये उन सवर्ण बिहारी युवाओं का प्रोपैगैडा है जो आरक्षण न मिलने की वजह से दिल्ली नोएडा की मीडिया में काम करते हैं। ये उन्ही लोगों की सामाजिक न्याय से चिढ़ है जो वो टीवी चैनलों पर अपनी भड़ास के रुप में निकाल रहे हैं।
लालू प्रसाद के इस तर्क में कितना दम था ये तो बहस का विषय हो सकता है ये भी सच है कि बिहारियों का पलायन कोई 90 के दशक से ही शुरु नहीं हुआ था इसके पहले से ही बिहार के मजदूर फिजी और मारिशस में जाकर काम करते थे। लेकिन बिहार के युवा बुद्धिजीवियों का पलायन निश्चित तौर से 90 के दशक में हुआ खास कर सवर्ण जाति के पढ़े लिखे लोगों का… ये लोग दिल्ली, गुजरात, तमिलनाडु , कर्नाटक जहाँ भी गए अपने साथ अपनी भाषा , अपना खान पान और विशेषकर अपने उस त्यौहार छठ को भी लेकर गए जो उनकी संस्कृति में बरसों बरस से बसा था। यही वजह है कि जब मीडिया में श्वेता सिंह। अंजना ओम कश्यप और मीडिया में बड़े पदों पर बैठे पब्लिक की दुनिया में गुमनाम लेकिन मीडिया में ताकतवर बिहार सवर्ण पत्रकारों को मौका मिला तो उन्होंने छठ को एक राष्ट्रीय पर्व बनाने में अपनी पूरी ताकत लगा दी।
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तीन दिनों तक चलने वाले बिहार के इस लोकपर्व को राष्ट्र का पर्व बना दिया और बिहारी जिस भी राज्य में टीवी पर अपने इस पर्व को मनते देखते वो चाहे बंगलोर हों या फिर सूरत या फिर कोलकाता…उसे अपने ही शहर के लोकप्रिय पर्व में बदलने की कोशिश करने लगे। मीडिया के ताकतवर बिहारियों खासकर सवर्ण बिहारियों ने धीरे धीरे छठ को कई राज्यों में इस प्रकार फैला दिया कि उन राज्यों की सरकारों को भी इसके लिए व्यवस्थाएं करनी पडी़। आज दिल्ली में यमुना की सफाई का भाजपाई एजेंडा दिल्ली के लोगों के लिए नहीं बल्कि बिहार के रहने वाले उन लोगों को लुभाने के लिए था जो हर साल झाग वाली यमुना में छठ पर्व मनाने के लिए अभिशप्त थे। बिहारी उन यहूदियों की तरह बिखरे हुए थे तो अपने इस्राइल के सपने को संजोये बरसो बरस अपने काल्पनिक देश के फिर से खड़े होने के इंतजार में पूरी दुनिया से अपने देश की तरफ मुंह करके रोते थे। और एक दिन उन्होंने इस्राइल को बना ही लिया।
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कोई भी कौम, कोई भी राष्ट्रीयता अपने स्वर्ण भूमि को फिर से उंचाई पर देखना चाहती है। अपने देस लौटना चाहती है। वो जहां भी रहती है अपनी संस्कृति को बचाने के लिए पूरी जान लगा देती है। बिहारी भी इसके अपवाद नहीं हैं। देश के किसी भी राज्य के निवासियों में वो चाहत नहीं दिखती जितनी बिहारियों के अंदर दिखती है। अपने राज्य के लिए तड़प…अपने राज्य वापस जाकर छठ मनाने की लिए बेकरारी, कुछ अपनी जमीन को खोने का दर्द और कुछ बिहारी सवर्ण मीडियाकर्मियों की मेहनत ने आज छठ पर्व को वो भौगौलिक व्यापकता दे दी है जो शायद ही किसी पर्व को मिली हो। ऐसा नहीं है कि कश्मीरी पंडितों ने पलायन का दर्द नहीं झेला है। ऐसा भी नहीं है कि कश्मीरी पंडित बड़े पदों पर नहीं बैठे हैं। लेकिन उनके आंसुओं को अर्घ्य देने वाला पर्व उनके पास नहीं है…न ही वो तड़प है जो हर बिहारी के अंदर है वो चाहे सवर्ण हो…या फिर पिछड़ा या फिर दलित…हर बिहारी छठ पर्व के नाम पर एक हो जाता है।
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बिहारियों ने ये कारनामा पहली बार नहीं कर दिखाया है । जब जब उन्हें पलायन के लिए विवश किया गया है। वो जिस भी जगह गए हैं अपनी संस्कृति की छाप उन्होंने गहरे रंगों से छोड़ी है। कहते हैं कि जब अंग्रेजों ने बिहारी मजदूरों को जबरन फिजी में बसाया था तो उस वक्त सिर्फ एक बिहारी के पास रामचरितमानस की एक प्रति थी। और उसी एक प्रति से उन्होंने फिजी मे सनातन धर्म को स्थापित कर दिया था। राम नाम की लहर चला कर अपनी संस्कृति और अपने धर्म की रक्षा की थी।
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जब बिहारियों को मारिशस बसाया गया तो उन्होंने वहां भी धर्म की ध्वजा स्थापित कर दी थी। फिर ये तो देश के अंदर का पलायन था। लालू प्रसाद के सामाजिक न्याय से जो सवर्णों को नरसंहार और जातिगत भेदभाव का सामना करना पड़ा था। उसी ने बिहारियों को ये मौका भी दे दिया कि वो अपने छठ को राष्ट्र का पर्व बना सकें। नब्बे के दशक से पहले बिहार और पूर्वांचल से बाहर शायद ही कोई छठ पर्व के बारे में जानता था लेकिन ये पूरे देश में फैल चुका है।
