
त्रिभुवन की रक्षा करती।
दंडित कर आसुरी शक्तियों को
जग मे मंगल करती।।१।।
आओ कालरात्रि जगतारिणि
गौरी उमा महामाया।
महालक्ष्मी महासरस्वति
तू ही दुर्गा जग माया।।२।।
चंड मुंड ही विविध रूप धरि।
शुभ निशुंभ सभी घेरे।
रक्त बीज संग महिषासुर ये
मुझको महाजाल घेरे।।३।।
कभी रोग बन कभी शोक बन
कभी क्लेश बन युद्ध करे।
ममता मयि हे मां जगदंबे!
इन्हें मार ..सब कष्ट हरे।।४।।
काया जर्जर फिर भी सुत हूं।
मुझपर ममता आन धरो।
सुख संपत्ति भक्ति निष्ठा दो।
हे माता भव ताप हरो।।५।।
विश्व शांति मय होवे मैया
तू तो जग की तारिणि है।
ईति भीति संकट सब हर लो।
हम सेवक तुव चाकर हैं।।६।।
दुर्गति हारिणि हे जगमाता।
हाथ जोड़ तव द्वार खड़े।
सब अपराध क्षमा कर मैया- शरणागत! करुणामयि हे!!७।।
