•बलराम कुमार मणि त्रिपाठी
सावन की पूर्णिमा श्रावणी मनती।
मध्य सरोवर खड़े कमर भर जल में।।
जड़ीबूटियों से अभिमंत्रित होकर।
वेद मंत्र से ऋषिगण पर्व मनाते।।1।।
रक्षा बंधन की महिमा है न्यारी।
युगों युगों से पुण्य पर्व है भारी।।
पहले युग में राजा बलि सुविचारी।
भुज बल में त्रिभुवन थी महिमा भारी।।2।।
डरे देवता बलि का देख पराक्रम।
कहा प्रभु से स्वर्ग बचा लो भगवन्।।
तब हरि ने अवतार लिया बामन का
तीन पांव की भूमि दान मे मांगी।।3।।
सबने रोका किंतु महादानी ने।
तीन डगो मे त्रिभुवन को दे डाला।।
खुद भी हुआ तीसरे पग मे सेवक।
पाना था बैकुंठ किंतु सब हारा।।4।।
रक्षा सूत्र विप्र ने बांधा बलि को।
द्वारपाल बन दिये सुरक्षा बलि को।।
स्वयं महालक्ष्मी ने राखी बांधी।
तब राजा बलि से पाई थी पति को ।।4।।
भरी सभा के मध्य सुदर्शन धारी।
चक्र सुदर्शन से शिशुपाल संहारी।।
उंगली कटी द्रोपदी ने पट बांधा।
प्रेम सुत्र मे बंध गए थे नंदलाला।।5।।
चीरहरण मे वस्त्र बने यदुनंदन।
लाज बचाई थी प्रभु ने रक्षक बन।।
कलियुग में अबला ने राखी बांधी।
भले मुगल था बहन की लाज बचाली।।6।।
रेशम के धागों मे प्यार छिपा है।
भाई- बहनो का अधिकार छिपा है।।
बहन प्यार की शक्ति कलाई बांधे।
भाई बहनों पर सर्वस्व लुटा दे।।7।।
मातृभूमि की रक्षा में बलिदानी।
डटे हुए हैं सीमाओं पर सैनिक।।
बहनें राखी बा़ंध कलाई उनको।
प्यार भरे अधिकार हृदय का देतीं।।8।।
शत्रु दलों को जीत लौट फिर आना।
थाल आरती की संभाल हम बैठीं।।
भारत मां की लाज बचाना भैय्या।
अपनी सारी शक्ति तुम्हें हम देतीं।।9।।
