शाह ने मौर्य को ‘मेरे मित्र’ पुकारा तो छिड़ गई सियासी चर्चा

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लखनऊ :में आयोजित नियुक्ति पत्र वितरण समारोह ने जहां हजारों युवाओं के जीवन में एक नई शुरुआत की उम्मीद जगाई, वहीं राजनीति के गलियारों में इस कार्यक्रम ने जबरदस्त हलचल भी पैदा कर दी। वजह केवल यह नहीं थी कि राज्य सरकार द्वारा इतनी बड़ी संख्या में पारदर्शी तरीके से नौकरियों का वितरण हुआ, बल्कि इस मंच से केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह द्वारा बोले गए कुछ शब्द ऐसे थे, जिनका राजनीतिक अर्थ निकालने में नेता से लेकर विश्लेषक तक जुट गए हैं। उत्तर प्रदेश की राजनीति में कौन कितना भारी और किसकी स्थिति कितनी मजबूत है, इसका पैमाना अब केवल चुनावी आंकड़ों से नहीं बल्कि मंच पर बोले गए संबोधनों और दी गई उपाधियों से भी तय होने लगा है। यही कारण है कि अमित शाह द्वारा उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य को ‘मेरे मित्र’ कहकर पुकारना इतना बड़ा मुद्दा बन गया है।

लखनऊ में आयोजित इस नियुक्ति पत्र वितरण समारोह में अमित शाह के साथ मंच पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य मौजूद थे। मंच की व्यवस्था भी प्रतीकात्मक थी अमित शाह बीच में, उनके दाएं योगी और बाएं मौर्य। कार्यक्रम की शुरुआत में अमित शाह ने अपने संबोधन में कहा, “इस ऐतिहासिक अवसर पर मेरे साथ उत्तर प्रदेश के लोकप्रिय और सफल मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी तथा मेरे मित्र और उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य जी मंच पर उपस्थित हैं।” यह छोटा सा वाक्य ही पूरे उत्तर प्रदेश की राजनीति को झकझोरने के लिए काफी था। एक तरफ यह योगी आदित्यनाथ को ‘लोकप्रिय और सफल’ कहकर मुख्यमंत्री पद पर उनके अधिकार को पुष्ट करता है, तो दूसरी तरफ केशव प्रसाद मौर्य को ‘मित्र’ कहकर पार्टी के भीतर उनके महत्व को एक तरह से सार्वजनिक समर्थन प्रदान करता है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस एक शब्द में कई संदेश छिपे हैं। सबसे पहले तो यह स्पष्ट होता है कि दिल्ली के शीर्ष नेतृत्व की नजरें अभी भी योगी आदित्यनाथ पर पूरी तरह टिकी हैं और उनके नेतृत्व पर सवाल उठाने वालों को यह समझाने की कोशिश की गई है कि मुख्यमंत्री का चेहरा फिलहाल बदले जाने की कोई योजना नहीं है। लोकसभा चुनाव 2024 में यूपी से अपेक्षित परिणाम न मिलने पर जब कुछ नेताओं ने योगी आदित्यनाथ पर अप्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदारी डालने की कोशिश की थी, तब भी खुद अमित शाह ने सार्वजनिक रूप से योगी की भूमिका की सराहना की थी। अब जबकि विधानसभा चुनाव 2027 की दिशा में भाजपा अपनी तैयारी तेज कर रही है, ऐसे में पार्टी के भीतर किसी प्रकार के भ्रम या टकराव की संभावना खत्म करने की कोशिश हो रही है।

वहीं दूसरी ओर, अमित शाह द्वारा केशव प्रसाद मौर्य को मित्र कहना केवल औपचारिक संबोधन नहीं था। यह उस वर्ग विशेष के लिए एक सधा हुआ राजनीतिक संदेश था, जिसे मौर्य प्रतिनिधित्व करते हैं। ओबीसी वर्ग, खासकर कुशवाहा और मौर्य समुदाय में केशव प्रसाद मौर्य की पकड़ मजबूत मानी जाती है। 2017 में जब बीजेपी ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की थी, तब मौर्य प्रदेश अध्यक्ष थे और उनकी रणनीति से भाजपा ने पिछड़े वर्गों में गहरी पैठ बनाई थी। हालांकि 2022 के विधानसभा चुनाव में सिराथू से उनकी हार के बाद उनके प्रभाव को लेकर सवाल उठने लगे थे, परंतु संगठन में उनका महत्व बना रहा। अमित शाह द्वारा उन्हें मित्र कहे जाने से यह स्पष्ट संकेत दिया गया है कि भले ही वह चुनाव हार गए हों, परंतु पार्टी में उनका राजनीतिक महत्व कम नहीं हुआ है।

यह भी समझना जरूरी है कि अमित शाह जैसे रणनीतिकार कोई भी शब्द यूं ही मंच से नहीं बोलते। ‘मित्र’ शब्द आमतौर पर तब प्रयोग किया जाता है जब निजी संबंधों को दर्शाना हो और सार्वजनिक रूप से किसी के प्रति सम्मान जताना हो। इस लिहाज से यह बयान कई मायनों में मौर्य के लिए सम्मानसूचक था और उन तमाम चर्चाओं को खारिज करने की कोशिश थी जिनमें कहा जा रहा था कि पार्टी में अब मौर्य की स्थिति कमजोर हो रही है। यह भी एक प्रकार का संतुलन बैठाने की कोशिश कही जा सकती है एक तरफ योगी को पूरी ताकत से समर्थन देना और दूसरी ओर मौर्य को भी सम्मानपूर्वक साथ रखना।

लेकिन इस राजनीतिक संदेश का असर केवल भाजपा तक सीमित नहीं रहा। विपक्ष, खासकर समाजवादी पार्टी ने इसे तुरंत भांप लिया और इस पर तंज भी कसा। सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया पर लिखा, “इन्होंने इश्तहार में न लगाया उनका चित्र, उन्होंने किसी और को कह दिया ‘मित्र’!” अखिलेश का यह तंज जितना अमित शाह पर था, उतना ही भाजपा के आंतरिक समीकरणों पर भी। लेकिन भाजपा के नेताओं ने भी तुरंत पलटवार किया और कहा कि विपक्ष को न समझ में आता है न स्वीकार होता है कि भाजपा के नेताओं में आपसी सहयोग और सम्मान का रिश्ता है।

राजनीतिक तौर पर देखा जाए तो अमित शाह का यह संबोधन आगामी चुनाव की भूमिका को मजबूत करने वाला कदम है। बीजेपी अब न केवल अपनी सरकार की उपलब्धियों को गिनवा रही है, बल्कि समाजिक समीकरणों को भी सधे तरीके से साधने की कोशिश कर रही है। योगी आदित्यनाथ को जहां हिंदुत्व और कानून-व्यवस्था के प्रतीक के रूप में आगे रखा जा रहा है, वहीं मौर्य को ओबीसी वर्ग की भावनाओं और प्रतिनिधित्व का चेहरा बनाकर एक संतुलन बनाने की कवायद की जा रही है।

उत्तर प्रदेश की राजनीति जातीय समीकरणों से बहुत अधिक प्रभावित होती है। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस लगातार जाति जनगणना की मांग को लेकर भाजपा पर हमला बोलते रहे हैं। खासकर ओबीसी वर्ग के मुद्दों को लेकर विपक्ष की रणनीति काफी आक्रामक रही है। ऐसे में भाजपा की तरफ से मौर्य को मंच पर विशेष संबोधन देना यह दर्शाता है कि पार्टी अपने ओबीसी चेहरे को कमजोर नहीं दिखाना चाहती। यही वजह है कि कार्यक्रम के दौरान और बाद में अमित शाह ने मौर्य के प्रति सार्वजनिक तौर पर सकारात्मक भाव दर्शाए।

यह भी उल्लेखनीय है कि हाल ही में केशव प्रसाद मौर्य ने समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव पर तीखा हमला करते हुए कहा था कि 2027 में सपा का अंतिम अध्याय लिखा जाएगा। इसके जवाब में सपा सांसद राजीव राय ने पलटवार करते हुए कहा कि केशव मौर्य अब 2057 तक भी कोई चुनाव नहीं जीत पाएंगे। यह जुबानी जंग बताती है कि दोनों दलों के बीच मुकाबला अब व्यक्तिगत स्तर तक उतर आया है। यह भी समझा जा सकता है कि मौर्य की राजनीतिक सक्रियता केवल सांकेतिक नहीं, बल्कि आगामी चुनावों की रणनीति का हिस्सा है।

इस पूरे घटनाक्रम को देखकर एक बात तो स्पष्ट है कि भाजपा नेतृत्व अब किसी भी प्रकार की अंदरूनी असंतुलन की स्थिति को जन्म नहीं देना चाहता। पार्टी यह सुनिश्चित करना चाहती है कि चुनाव से पहले एकजुटता का प्रदर्शन हो और हर वर्ग को संतुलित प्रतिनिधित्व मिले। इसी रणनीति का हिस्सा है अमित शाह का ‘मेरे मित्र’ वाला संबोधन जिसमें सम्मान है, संदेश है और सियासी संतुलन भी।

लखनऊ का यह कार्यक्रम केवल नियुक्ति पत्र वितरण तक सीमित नहीं रहा। इस मंच से जो शब्द बोले गए, उनका असर दूर तक गया। अमित शाह ने एक ओर योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व पर फिर से भरोसा जताया, तो दूसरी ओर केशव प्रसाद मौर्य के राजनीतिक कद को गिरने से रोक लिया। सियासत में ‘दो कदम आगे और एक कदम पीछे’ की चाल के बीच यह भाषण भाजपा की रणनीतिक परिपक्वता का प्रमाण बनकर उभरा है। अब देखना होगा कि इस संतुलन का असर पार्टी के आगामी फैसलों और चुनावी रणनीतियों पर कितना गहरा पड़ता है। लेकिन इतना तो तय है कि ‘मेरे मित्र’ अब केवल एक संबोधन नहीं, बल्कि एक राजनीतिक घोषणापत्र जैसा बन गया है जो योगी और मौर्य दोनों के लिए एक नया अध्याय खोलता है।

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