आतिशी का फ़्लाइंग किस और कमरिया लपालप

दयानंद पांडेय

आतिशी जब दिल्ली की घोषित खड़ाऊं मुख्य मंत्री बनी थीं तब मुख्य मंत्री कार्यालय में जिस कुर्सी पर अरविंद केजरीवाल बैठते थे तब उस पर नहीं बैठीं। क्या तो इस कुर्सी पर अरविंद जी ही बैठेंगे। दूसरी कुर्सी लगा कर बैठीं। मेज वही थी। ऐसी बात तो पतिव्रता राबड़ी यादव ने भी बिहार में नहीं किया था। लालू की कुर्सी पर ही बैठीं। इतना ही नहीं जब आतिशी मुख्य मंत्री बनीं तो कहा कि कोई मुझे माला न पहनाए। कोई जश्न नहीं। सार्वजनिक रूप से ऐसा देखा भी नहीं गया। पर अभी एक वीडियो देखा जो विधायक का चुनाव जीतने पर आतिशी के विजय जुलूस का है। गले में ख़ूब मालाएं हैं। धूम धड़ाका है। मेरा रंग दे वसंती चोला वाला गीत है। खुली कार में खड़ी , गीत-संगीत पर लहरा कर थिरकती आतिशी फ़्लाइंग किस की बरसात किए हुई हैं।

ऐसे कि जैसे मेनका!

सुंदर तो हैं ही आतिशी तिस पर लचक – लचक कर फ़्लाइंग किस ! गोया रंग दे वसंती नहीं कमरिया करे लपालप लॉलीपॉप लागेलू , बज रहा हो। गोया अरविंद केजरीवाल , मनीष सिसोदिया आदि जीत कर सरकार बनाने जा रहे हों ! जो भी हो कमरिया लपालप तो है ही आतिशी की। इस उतरती उम्र में उन की देह में लोच भी ख़ूब है। लावण्य भी। सुदर्शना भी हैं। कब कैसे , किस का दीदार देना है , ख़ूब जानती हैं। बीते दिनों में जब कभी वह बन – ठन कर अरविंद केजरीवाल के पीछे – पीछे ठुमक – ठुमक कर चलती थीं तब देखते ही बनता था।

पर अब विजय जुलूस में उन के नाचने पर अब स्वाति मालीवाल को बुरा लगे या किसी और को। आतिशी को क्या ! मीना कुमारी पर फ़िल्माया गया , मज़रूह सुल्तानपुरी का लिखा एक पुराना गाना है : अपने सैंय्या से नैना लड़इबे हमार कोई का करिहैं !

जीत तो जीत ही होती है। आतिशी ने शायद नीरज का यह गीत पढ़ या सुन रखा है ।

छिप-छिप अश्रु बहाने वालों, मोती व्यर्थ बहाने वालों
कुछ सपनों के मर जाने से, जीवन नहीं मरा करता है।

सपना क्या है, नयन सेज पर
सोया हुआ आँख का पानी
और टूटना है उसका ज्यों
जागे कच्ची नींद जवानी
गीली उमर बनाने वालों, डूबे बिना नहाने वालों
कुछ पानी के बह जाने से, सावन नहीं मरा करता है।

माला बिखर गयी तो क्या है
खुद ही हल हो गयी समस्या
आँसू गर नीलाम हुए तो
समझो पूरी हुई तपस्या
रूठे दिवस मनाने वालों, फटी कमीज़ सिलाने वालों
कुछ दीपों के बुझ जाने से, आँगन नहीं मरा करता है।

खोता कुछ भी नहीं यहाँ पर
केवल जिल्द बदलती पोथी
जैसे रात उतार चांदनी
पहने सुबह धूप की धोती
वस्त्र बदलकर आने वालों! चाल बदलकर जाने वालों!
चन्द खिलौनों के खोने से बचपन नहीं मरा करता है।

लाखों बार गगरियाँ फूटीं,
शिकन न आई पनघट पर,
लाखों बार किश्तियाँ डूबीं,
चहल-पहल वो ही है तट पर,
तम की उमर बढ़ाने वालों! लौ की आयु घटाने वालों!
लाख करे पतझर कोशिश पर उपवन नहीं मरा करता है।

लूट लिया माली ने उपवन,
लुटी न लेकिन गन्ध फूल की,
तूफानों तक ने छेड़ा पर,
खिड़की बन्द न हुई धूल की,
नफरत गले लगाने वालों! सब पर धूल उड़ाने वालों!
कुछ मुखड़ों की नाराज़ी से दर्पन नहीं मरा करता है!

इस कठिन समय में जीत की बहुत बधाई आतिशी ! उस विजय जुलूस में अगर उपस्थित होता तो लपालप कमरिया देखते हुए आप का वह फ़्लाइंग किस कम से कम मैं ने रिसीव किया होता।

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