भानु सप्तमी कल: जानें सूर्य देव की पूजा विधि और महत्व

Bhanu Saptami 2026

Bhanu Saptami 2026: भानु सप्तमी हिंदू धर्म में सूर्य देव की उपासना का एक अत्यंत पवित्र और फलदायी दिन माना जाता है। जब भी हिंदू पंचांग की सप्तमी तिथि रविवार के दिन पड़ती है, तो उस अद्भुत संयोग को ‘भानु सप्तमी’ कहा जाता है (चूंकि ‘भानु’ सूर्य देव का ही एक नाम है)। इसे ‘सूर्य सप्तमी’ या ‘व्यासवतमा सप्तमी’ के नाम से भी जाना जाता है।

पूजा विधि और नियम

ब्रह्म मुहूर्त स्नान

इस दिन सूर्योदय से पहले किसी पवित्र नदी या जलाशय में स्नान करने का बहुत महत्व है। यदि यह संभव न हो, तो घर पर ही नहाने के पानी में गंगाजल मिलाकर स्नान किया जाता है।

अर्घ्य देना

तांबे के लोटे में जल, गंगाजल, अक्षत (चावल), रोली और लाल फूल डालकर उगते हुए सूर्य नारायण को अर्घ्य दिया जाता है।

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मंत्र जाप

अर्घ्य देते समय और पूजा के दौरान ॐ सूर्याय नमः या ॐ घृणि सूर्याय आदित्याय नमः मंत्र और आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ करना विशेष फलदायी माना जाता है।

भानु सप्तमी का महत्व

हिंदू धर्म में सूर्य देव को एकमात्र ‘प्रत्यक्ष देवता’ (जिन्हें साक्षात देखा जा सकता है) माना गया है। इस दिन सूर्य देव की पूजा करने का विशेष महत्व है: आरोग्य और रोगों से मुक्ति: मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने और सूर्य देव की आराधना करने से गंभीर शारीरिक कष्टों, विशेषकर चर्म रोगों से मुक्ति मिलती है और उत्तम स्वास्थ्य (आरोग्य) की प्राप्ति होती है। सुख, समृद्धि और यश: इस दिन पूजा करने से समाज में मान-सम्मान, पद-प्रतिष्ठा, तेज और आत्मविश्वास बढ़ता है। ग्रह दोष निवारण: ज्योतिष दृष्टिकोण से, इस दिन सूर्य देव की उपासना करने से कुंडली में मौजूद सूर्य दोष का प्रभाव कम होता है।

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भानु सप्तमी पौराणिक कथा

सूर्य देव के रथ का अवतरण: पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इसी विशेष तिथि पर भगवान सूर्य देव पहली बार अपने सात घोड़ों वाले रथ पर सवार होकर पृथ्वी पर अवतरित हुए थे। उनके रथ के यह सात घोड़े सूर्य की सात किरणों (और इंद्रधनुष के सात रंगों) के प्रतीक माने जाते हैं। इसी कारण इस दिन को सूर्य देव के जन्म या उनके पहले आगमन के रूप में सम्मान दिया जाता है।

भविष्य पुराण का प्रसंग: भविष्य पुराण के अनुसार, स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने अपने पुत्र सांब को कुष्ठ रोग से मुक्ति पाने के लिए सूर्य देव की महिमा और इस व्रत के महत्व के बारे में बताया था। सांब ने सूर्य देव की कठोर तपस्या और उपासना की, जिससे वे पूरी तरह रोगमुक्त और कांतिमय हो गए।

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